देहु-आलंदी रसयात्रा शुरुआत :

शिरडी एवं अक्कलकोट इन पहली दो रसयात्राओं के आस्वाद के बाद सद्गुरु श्री अनिरुद्धजी ने इस देहु-आलंदी की तीसरी रसयात्रा की घोषणा की। सन 1998 में श्रीसाई समर्थ विज्ञान प्रबोधिनी की ओर से फिरसे इस रसयात्रा का उत्कृष्ट आयोजन किया गया। 1 सितम्बर 1998 को रात के 10 बजे देहु-आलंदी के लिए बसें रवाना हुईं और दूसरे दिन प्रात: पांच बजे सभी श्रद्धावान आलंदी पहुंचे। इस यात्रा में पहली यात्रा के मुकाबले चौगुनी संख्या में श्रद्धावान शामिल हुए थे।

देहु-आलंदी रसयात्रा पहला दिन :

बापूजी ने प्रथम रसयात्रा का महत्व बताया और फिर ज्ञानेश्वरी गाथा, साईसच्चरित इन पवित्र ग्रंथों का पालकी में जुलूस निकाला जाना था तथा उस दिंडी की विस्तृत तैयारी समझाई। पालकी में इन ग्रंथों के जुलूस के दौरान ‘ज्ञानोबा माऊली तुकाराम’ यह गजर (नामजाप) जारी रहा। इस दिंडी को पंढरपुर की तीर्थयात्रा का स्वरूप प्राप्त हुआ था।

शाम को सभी को दी गई चिकनी मिट्टी से शिवलिंग बनवाए गए तथा दाभोलकर आप्पाजी द्वारा बनाए गए शिवलिंग का पूजन किया गया। श्रद्धावानों ने ज्ञानेश्वरजी की पादुकाओं की अर्चन द्रव्य से पूजा की। इससे पहले बापूजी द्वारा सिद्ध किए गए ज्ञानेश्वरजी का गायत्री जप का उद्घोष किया गया। रात को सत्संग किया गया। यह कार्यक्रम सारी रात चलता रहा।

 देहु-आलंदी रसयात्रा दूसरा दिन :

दूसरे दिन संत ज्ञानेश्वर की समाधी, अजानवृक्ष, हैबती बाबा की समाधी के दर्शन किए गए। आलंदी संस्थान ने बापूजी का सम्मान किया। तब बापूजी ने बहुत ही प्राचीन यादें बताईं। निवृत्ती, ज्ञानदेव, सोपान, मुक्ताबाई इन चारों भाई-बहनों के कष्टों की और भगवद्भक्ति की कथाएं बताईं। शाम को अमृतमंथन उपासना के बाद सारे इंद्रायणी के तट पर गंगापूजन के लिए इकठ्ठा हुए। इंद्रायणी आलंदी की गंगा ही है। वहां पर गंगाजी की आरती की गई और आरती के पश्चात हरएक ने गंगा में दीप बहाए।

 

देहु-आलंदी रसयात्रा तीसरा दिन :

तीसरे दिन सुबह को बापूजी नें संत तुकाराम महाराज की महती सुनाई, तत्पश्चात वहां से सभी देहु के लिए रवाना हुए। तुकारामजी का जहां पर मंदिर, वैकुंठगमन वृक्ष, आदि के दर्शन किए गए। तीन दिन प्रेमरस का आनंद लूटकर सारे भक्तगण लौटने लगे। वहां से रवाना होने से पह्ले सभी श्रद्धावानों के कदम और अंतकरण भारी हो चुके थे। वास्तव में इस रसयात्रा में शामिल होकर सभी रसमय हो गए थे।