मुद्राओं का महत्त्व क्या है?

संपूर्ण विश्व पंचमहाभूतों से बना हुआ है। (समूचे विश्व की निर्मिती पंचमहाभूतों से हुई है) विश्व के इन पाँच तत्त्वों का प्रतिनिधित्व हमारे हाथों की उंगलियाँ करती रहती हैं। अग्नितत्त्व का प्रतिनिधित्व अंगुष्ठा, वायुतत्त्व का प्रतिनिधित्व तर्जनी, आकाशतत्त्व का मध्यमा, पृथ्वीतत्त्व का अनामिका और कनिष्ठा जलतत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है। विश्व में जैसे ये पंचतत्त्व हैं बिलकुल वैसे ही हमारे शरीर में भी ये पंचतत्त्व हैं और उनका सुयोग्य नियमन हम इस योग मुद्रा के आधार पर बनाये रख सकते हैं। शरीर में उत्पन्न होनेवाले विकारों के अन्तर्गत कफ, पित्त, तथा वात (गैस/बादी) इनका संतुलन एवं अनेक आधि-व्याधियों पर विकल्पात्मक उपचार हेतु इन योग मुद्राओं को अनन्य साधारण महत्त्व है।

सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध बापूजी कहते हैं – शरीर में बीमारियों की उत्पत्ति पंचमहाभूतों में असमतोल आ जाने के कारण ही होती रहती है। हमारे हाथों की उंगलियाँ इन पंचमहाभूतों का प्रतिनिधित्व करने के कारण इन पाँच उंगलियों की सहायता से विभिन्न मुद्रायें बनती हैं इसी से हमारे शरीर में समतोल तैयार होते रहता है। इसीलिए इन मुद्राओं की सहायता से हम अपने शरीर एवं मन का निरोगीकरण कर सकते हैं। बापूजी ने हमें इन सात मुद्राओं के बारे में जानकारी दी थी।

सप्तमुद्रा :

१)मुलाधारचक्र से संबंधित स्वस्तिमुद्रा

२)स्वाधिष्ठानचक्र से संबंधित रसमुद्रा

३)मणिपुरचक्र से संबंधित त्रिविक्रममुद्रा

४)अनाहतचक्र से संबंधित शिवलिंगमुद्रा

५)विशुद्धचक्र से संबंधित आंजनेयमुद्रा

६)आज्ञाचक्र से संबंधित अंबामुद्रा

७)सहस्त्रारचक्र से संबंधित अवधूत मुद्रा है।

मुद्राप्रशिक्षण :

बापू की आज्ञानुसार महाधर्मवर्मन डॉ.योगिन्दसिंह जोशी ने इस प्रशिक्षण का भार सँभालते हुए दो दिन मुफ्त प्रशिक्षण शुरु कर दिया। इस प्रशिक्षण हेतु सर्वप्रथम प्रशिक्षक तैयार किए गए और इसके पश्चात्‌ ही  सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन  के विविध केन्द्रों में मुफ्त प्रशिक्षण दिया गया। असंख्य श्रद्धावानोंने इस मुद्रा प्रशिक्षण का लाभ उठाया। जिन्हें यह प्रशिक्षण लेना है उन्हें अपनी नजदीकी उपासना केन्द्र के साथ संपर्क करना आवश्यक है।

श्रीहरिगुरुग्राम  में भी दो गुरुवार मुद्रा प्रशिक्षण प्रदान किया गया। उस वक्त हजारों श्रद्धावानों ने इस मुद्रा प्रशिक्षण का लाभ उठाया।