शिर्डी रसयात्रा की संकल्पना

रसराज परमेश्वर का अस्तित्व हमारे दैनिक जीवन में नित्य रूप से प्राप्त होना चाहिए। ऐसी ही रसमयता श्रद्धावानों के जीवने में लाने के लिए सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापूजी ने सर्वप्रथम “शिर्डी रसयात्रा” का अयोजन किया। ‘श्री साईसमर्थ विज्ञान प्रबोधिनी’ संस्था की ओर से पहली रसयात्रा शिर्डी में दिनांक २२ और २३ सितंबर सन १९९६ को दो दिन के लिए आयोजित की गई। कुल मिलाकर १०० श्रद्धावानों ने इस रसायात्रा के लिए अपने नाम दर्ज कराए थे।

शिरडी रसयात्रा की विशेषता

श्रीअनिरुद्ध जी के कहे अनुसार “अमृतमंथन उपासना” ही इस रसयात्रा की विशेषता है। देव और दानवों ने मिलकर अमृतमंथन का प्रारंभ किया, वह दिन अर्थात रसयात्रा का पहला दिन। देवों ने दानवों के साथ मिलकर यह अमृत मंथन किया था, इसीलिए अमृत मंथन के समय अमृत के साथ विष भी बाहर आया। उस विष को प्राशन करके उसे पचाने की ताकत सिर्फ अकेले शिवशंकर के पास ही थी। हमारे जीवन में नित्य हमारी लड़ाई हमारे प्रारब्ध से होती रहती है। इसीलिए सभी श्रद्धावानों के हृद्य मे भक्तीरस का अमृत मंथन करके अमृत पिलाने के लिए ही यह रसयात्रा थी।

शिर्डी रसयात्रा की उपासना

सर्व प्रथम शुरुवात में श्रीसाई गायत्री मंत्र की उपासना की गई। श्रीअनिरुद्ध बापूजी ने गायत्री मंत्र का महत्त्व विषद करके श्रीसाई गायत्री मंत्र की महिमा का वर्णन किया। उसके बाद चिकनी मिट्टी से बनाए गए गोले को केले के पत्ते पर रखकर सबको दिया गया। यह मिट्टी यमुना के किनारे से लाई गई थी। दिए गये मिट्टी के गोले से जैसा भी हो सके वैसा साई की पादुका बनाने के लिए सबको कहा गया। उसके बाद उस पादुका पर १०८ बार साई गायत्री मंत्र कहते हुए कस्तुरी गंध इत्यादि अर्पण किया गया। वह मंत्र था-

भू: र्भुव: स्व: साईनाथाय विद्महे। पूर्ण पुरूषाय धीमहि। तन्नो सद्गुरु: प्रचोद्यात्

इस मंत्र का सद्‍गुरु बापूजी के साथ जाप किया गया। इसके अलावा श्री साई जी की मक्खन की भी पादुका बनाई गई थी। उस पर श्री चौबळ आजोबा और चौबळ आजी ने १०८ तुसली अर्पण की। उसके बाद मक्खन की बनाई गई पादुका पर सारे भक्तों की बनाई गई पादुका व कस्तुरी अर्पण की गई। सारी पादुका दूसरे दिन गोदावरी नदी में विसर्जित की गई।

 

 

 

उसके बाद शाम को ७:०० बजे शिवगायत्री मंत्र की उपासना की गई। हमारे जीवन के हलाहल को दूर करने के लिए ही शिवगायत्री मंत्र की उपासना की गई। श्री. आप्पासाहेब और सौ. मीनाताई दाभोलकर दोनों ने मिलकर मिट्टी के शिवलिंग बनाए थे। निम्नलिखित शिव गायत्री मंत्र का बापू के साथ मिलकर १०८ बार जप किया। वह मंत्र था-

भू र्भुव: स्व: तत् पुरुषाय विद्महे। महादेवाय धीमही। तन्नो रुद्र: प्रचोद्यात्

उसके बाद आरती की गई। उसके बाद बापूजी के द्वारा बाबा के भक्ति में रममाण भक्तों के बारे में बनाया गया एक पद बापूजी के साथ सभी लोगों ने बड़े ही आनंद के साथ कहा। वह पद निम्नलिखित है-

दिक्षित, शामा, हेमाड, बायजाबाई, नाना, गणू, मेघा, श्याम।

यांची वाट पुसता पुसता मिळेल आम्हा साईराम॥

उसके कुछ समय पश्चात समापन किया गया। रात के ११.०० बजे तक श्री साईबाबा का जप संपन्न हुआ। उसके बाद रात के ११.०० बजे के बाद “ॐ कृपासिंधु श्री साईनाथाय नम:” इस मंत्र का सबने जप किया। उसके बाद फिर से बापूजीने श्रद्धावानों के साथ सत्संग का लाभ लिया।

शिर्डी रसयात्रा का दूसरा दिन

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापूजी ने दूसरे दिन श्री क्षेत्र शिर्डी में निम्नलिखीत पवित्र स्थलों पर श्रद्धावानों के साथ भेट दी और उन स्थलों के बारे में जानकारी और महत्व भी बताया।

१. द्वारका माई

२. म्हालसापति की समाधि

३. शनिमंदिर

४. मारूति मंदिर

५. नानावल्ली की समाधि

६. भाऊमहाराज कुंभार की समाधि

७. अब्दुल्ला की समाधि

८. तात्या कोते पाटेल की समाधी

९. लेंडी बाग

१०. दत्त मंदिर

११. शामसुंदर अश्व की समाधी

१२. खंडोबा का मंदिर

१३. कनिफनाथ की समाधी

शिर्डी रसयात्रा का समापन

शिर्डी की वारी होने के बाद अंत में बापूजी ने सबको अपने हाथ से खाना परोसा और प्रत्येक को अमरुद का प्रसाद दिया गया। उसके बाद ५ नारियल द्वारकामाई में अर्पण करके शिर्डी रसयात्रा का समापन किया गया।