शुरुआत :

शिरडी, अक्कलकोट और देहू-आलंदी की रसयात्रा के बाद सन्‌ १९९९ में श्री अनिरुद्ध बापूजी ने चौथी श्री क्षेत्र मंगेशी और शांतादुर्गा गोवा की रसयात्रा जाहिर की। १६ मई सन्‌ १९९९ के दिन इस यात्रा का प्रारंभ हुआ। इस समय अंदाजन ५७ गाड़ियाँ गोवा की ओर निकल पड़ी। तेज़ गर्मी में भी इस समय वर्षा शुरु हो गई और सबका प्रवास सुखमय हो गया। गोवा के कवले गाँव के रामनाथी के मंदिर में प्रात: के ३.०० बजे से ही सबका आगमन शुरु हो गया। लगभग २५०० श्रद्धावान इस रसयात्रा में शामिल हुए थे। इस रसयात्रा में ४०० से ५०० कार्यकर्ता कार्यरत थे।

पहला दिन :

सोमवार दिनांक १७ मई के दिन सुबह दस बजे के बाद रामनाथी दर्शन का समारोह शुरु हुआ। उस समय श्रीरामनाथी को महाभोग लगाया गया। उस समय ‘शिवपाठ’ का पठन किया गया। इसके पश्चात्‌ श्रीविष्णुपाद और श्रीकृष्ण की पालकी निकाली गई। तत्पश्चात्‌ शाम को ४.०० बजे ’अमृतमंथ’ उपासना की गई। बापू ने इस उपासना महत्त्व बताया। इस समय सर्वप्रथम श्रीसच्चिदानंद नवनीत पादुका पूजन शुरु हुआ। इस समय प्रत्येक श्रद्धावान ने कलन मिट्टी का शिवलिंग बनाया उस पर अर्चन द्रव्य से अभिषेक एवं पूजन किया। तत्पश्चात्‌ मंगेश गायत्री मंत्र का जप किया गया। उपासना के बाद पहले दिन का सत्संग सम्पन्न हुआ।

दूसरा दिन :

सारे श्रद्धावान श्रीशांतादुर्गा की उपासना के लिए इकठ्ठा हुए। उपासना करने के बाद सभी लोग शांतादुर्गा मंदिर की ओर दर्शन लेने के लिए गए।शाम ६ बजे श्री अमृतमंथन विधि की शुरुआत हुई। सारे श्रद्धावानोंके दुष्ट प्रवृत्तियों का नाश करके नवजीवन की शुरुआत करने के लिए इस अमृतमंथन का आयोजन किया गया था। इस अमृत मंथन उपासना के अंत में एक होम आयोजित किया गया था। इस में सारे श्रद्धावानों ने ‘लाइ’ की समिधा अर्पण की। और फिर रात्रि के ११ बजे सत्संग शुरु हुआ।

तीसरा दिन :

सभी श्रद्धावान पुण्यक्षेत्र श्रीक्षेत्र-साखळी के दत्तमंदिर में दर्शन के लिए गए। शाम के समय श्री मंगेश उपासना शुरु हुई। रात में सत्संग शुरु हुआ और सत्संग के अंत में मंगेश-शांतादुर्गा का गोंधळ किया गया।