श्रीवरदाचण्डिका प्रसन्नोत्सव संकल्पना :

“श्रीवरदाचण्डिकाप्रसन्नोत्सव” अनेक संकल्पों, अनुष्ठानों एवं आध्यात्मिक उपासनाएं परिपूर्ण होने पर घटित होने वाला अत्यंत दुर्लभ एवं परमपावन तथा महन्मंगल उपक्रम; अर्थात शांति, सक्षमता एवं तृप्ति के साथ साथ आधार एवं निर्भयता का महासंगम।

श्रीवरदाचण्डिका प्रसन्नोत्सव महत्व :

मानव को जीवन में निरंतर दिक्कतें, संकट, दु:ख एवं शत्रूता से जूझना पड़ता है। इन सब बातों की हमेशा के लिए रोकथाम करने हेतु सामर्थ्य प्राप्ति का यह उत्सव था। अंतरिक्षस्वामिनी श्रीमहिषासुरमर्दिनी का नौंवा अवतार ‘मंत्रमालिनी’ अर्थात ‘मातृवात्सल्यविन्दानम्‌’ नामक ग्रंथ में विशद किया हुआ आदिमाता का आख्यान एवं इसके द्वारा प्राप्त ज्ञान, भक्ति, आत्मविश्वास, कवच, संरक्षण यह सबकुछ नौंवा अवतार है। यह उत्सव भी इसी की फलश्रुति थी।

इस उत्सव में आदिमाता का दर्शन, स्मरण, गुणसंकीर्तन एवं महापूजन सभी कर पाए और इसी से सबको उनके सारे अपराधों, पापों, गलतियों, गुनाहों का प्रायश्चित करने, देह में स्थित सभी 108 शक्तिकेंद्रों को शुभंकर, सक्षम एवं बलशाली बनाने तथा आदिमाता चण्डिका को ‘वरदा’ बनाने का सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ था, सभी श्रद्धावानों का यही भाव था।

श्रीवरदाचण्डिका प्रसन्नोत्सव पूर्वव्यवस्था :

इस उत्सव से पहले प्रत्येक इच्छुक श्रद्धावानों को एक एक कंठकूपपाषाण अपने घर पर ले जाकर ‘श्रीदेवीपूजनम्‌’ करने का अवसर प्राप्त हुआ था। यह पूजन सर्वप्रथम सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध बापू, नंदामाता एवं सुचितदादा द्वारा श्रीहरिगुरुग्राम में किया गया। तत्पश्चात्‌ घर घर में ‍‘श्रीकंठकूपपाषाण’ पूजन बडे उत्साह से किया गया। श्रद्धावानों के मन में यह विश्वास था कि श्रीकंठकूपपाषाण का घर आना यानि देवी के आगमन, आदिमाता के कदम घर में पड़ने जैसा है। इसलिए कईयों ने अपने घर पर पुन: पुन: इन पाषाणों का पूजन किया।

श्रीवरदाचण्डिका प्रसन्नोत्सव रूपरेखा :

इस उत्सव में विभिन्न आराधनाएं, पूजा एवं पठण थे जो निम्नानुसार हैं,

१. प्रमुखदेवता पूजन :

महिषासुरमर्दिनी का ‘अखिल कामेश्वरी’, महाकाली का ‘कालनियंत्री’ और महासरस्वती का ‘आरोग्यभवानी’ इन स्वरूपों का पूजन।
उत्सव में प्रमुख मंच पर बीचोबीच महिषासुरमर्दिनी की ‘अखिल कामेश्वरी मूर्ति’ विशिष्ट मूर्ति थी। उनके बाहिनी ओर महाकाली की अर्थात ‘कालनियंत्री’ की मूर्ति थी, तो दाहिनी ओर महासरस्वती की ‘आरोग्यभवानी मूर्ति’ थी। अर्थात ‘काल, काम और स्वास्थ्य’ बहुत ही आवश्यक चीजें हैं और सर्वाधिक बाधाएं या दिक्कतें इन्हीं में उत्पन्न होती हैं। इन बाधाओं को दूर करनेवाले मां के ये तीन रूप हैं। इनका महापूजन किया गया।

२. उत्सव में नित्योपचार :

उत्सव में प्रतिदिन सुबह नित्य जप किया जाता था जो दस दिन रात तक चलता रहा। यह विशिष्ट जप तीन मंत्रों से बना था।
१. ॐ ऐं र्‍हीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।

२. नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषौ जहि॥

३. ॐ नमश्र्चण्डिकायै।

दोपहर के समय १ बजे और रात को ९ बजे महाआरती की जाती थी।
महानैवद्यम (महाभोग) वज्रमंडलपीठपूजनम्‌ अनुसार दिन में तीन बार अर्थात सुबह, दोपहर और शाम को अर्पण किया जाता था। सुबह महानैवेद्य में मधुपर्क’ दोपहर एवं रात के समय भोजन अर्पण किया जाता था। प्रतिदिन शाम के समय ‘महाभोग’ अर्पण किया जाता था।

३. महाकाली कुंड :

यह महाकाली कुंड कलयुग में मानवों के प्राणमय देह में स्थित उन अशुभंकर कलिकेंद्रों को कमजोर करने के लिए था।

४. महालक्ष्मी दीप :

इस महालक्ष्मी दीप में ५२ भक्तिपीठों के प्रतीकों की स्थापना स्वयं सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी ने की थी। यह दीप बहुत ही बडा था और इसकी ५२ बडी ज्योतियां थीं। इसमें भक्तों को ‘सुरस्नेहन द्रव्य’ अर्पण करना था।

५. महासरस्वती वापी :

शुभंकर केंद्र को सक्षम करने के लिए यह वापी (कुंआँ) थी। इस उत्सव से पहले घर-घर में पूजे गए मंत्रों से सिद्ध किए गए कंठकूप पाषाणों की सहायता से था यह वापी बनाई गई थी (इस वापी का बाँधकाम किया गया था)। श्रद्धावान इस वापी में स्वेच्छा से ‘मांगल्यद्रव्य’ अर्पण करते थे। इन कंठकूप पाषाणों से ‘प्रथम पुरुषार्थधाम’ में चण्डिका गर्भगृह की मूल बैठक बांधी गई है (का बाँधकाम किया गया है)।

६. शत्रुघ्नेश्वरी पूजन :

इस उत्सव में महिषासुरमर्दिनी के चौथे अवतार रक्तदन्तिका के ‘शत्रुघ्नेश्वरी’ रूप का पूजन किया गया। पूजनविधि के बाद जब आरती की शुरुआत होती तब साजों की धुन में वह परदा उठाया जाता था। हर किसी को बस उसी ही समय दर्शन करने का सुअवसर प्राप्त होता था। रक्तदंतिका के अवतार की कथा मातृवात्सल्यविंदानम्‌ ग्रंथ में लिखी हुई है।

७. सहस्त्रचण्डियाग :

उत्सव स्थल पर और एक अत्यंत दुर्लभ उपक्रम का आयोजन किया गया था, सहस्त्रचण्डियाग। यहां पर अन्य मंत्रोच्चार समेत नवार्ण मंत्र का भी पठण किया गया। इसके अलावा रोज दोपहर को २ बजे से रात के ८.२० तक दो बार सप्तशति पाठ किया जाता था।

८. दुर्गावरद होम :

यह यज्ञ अत्रिसंहिता के आधार पर किया गया। मातृवात्सल्यविंदानम्‌ ग्रंथ के संस्कृत संस्करण के अनुसार यह होम किया गया। यह यज्ञ नौं दिनों तक निरंतर चलता रहा और नौंवे दिन यज्ञ की पूर्णाहूति दिनभर चलती रही (की गई)।

९. जान्हवीस्थानम्‌ एवं गंगामाता की स्थापना :

वैशाख महीने में एक महत्वपूर्ण दिन है ‘गंगा सप्तमी’ अर्थात ‘गंगोत्पत्ती का दिन’। इसी दिन गंगा भागिरथी रूप में धरती पर अवरित हुई थी। सन २०११ में यह गंगा सप्तमी १० मई को थी।

जान्हवीस्थानम्‌एवं गंगामाता की स्थापना :

इस दिन गंगाजी की स्थापना की गई और जहां पर यह स्थापना की गई वह स्थान है “जान्हवीस्थानम्‌”।”।

इस जान्हवी स्थानम्‌ में मगरमच्छ पर बिराजमान गंगाजी की पंचधातु की मूर्ति पूजन के लिए स्थापित की गई थी। इस अभिषेक के लिए सप्त महासागरों (सिंधुओं) का और शतनदियां अर्थात समूचे विश्व की सौ नदियों का जल लाया गया था। उत्सव के बाद गंगामाता की स्थापना श्रीअनिरुद्ध गुरुक्षेत्रम्‌ में की गई है।

१०. अवधूतकुंभों की सिद्धता :

पंचाधातुओं के २४ कुंभों में ‘अविरत उदी’ भरी हुई थी और यह कुंभ कालातीत संहिता अनुसार दस दिनों में सिद्ध किए गए। यह २४ अवधूत कुंभ इन तीन मूर्तियों के पास एक विशिष्ट यंत्र की रचना में रखे गए थे। इनका विशिष्ट तरीके से पूजन भी किया गया।

श्रीवरदाचण्डिका प्रसन्नोत्सव एक अदभूत उत्सव :

श्रद्धावानों को इस भगवती के उत्सव में शामिल होने की क्षमता माता चण्डिका के कृपाशीर्वाद से प्राप्त हुई थी।