AniruddhaFoundations-Shreemad-Pururshartha-Grantharajश्रीमद्‌पुरुषार्थ ग्रंथराज अर्थात क्या? –

यह सद्‌गुरु श्री अनिरुद्धजी का पुरुषार्थ ही हैं। परमपूज्य सद्‍गुरु बापूजींने अपने श्रद्धावान मित्रों के प्रेम की खातिर श्रीमद्‌पुरुषार्थ ग्रंथराज के (तीन खंड़ों की) रचना की। ये ग्रंथ श्रद्धावानों के जीवन में दीपस्तंभ के रूप में हमेशा मार्गदर्शन प्रदान करत्र रहेंगे। बापूजी कहते हैं कि, अंधकार को दूर करने का मेरा यज्ञ अर्थात ‘श्रीमद्‌पुरुषार्थ’।

श्रीमद्‌पुरुषार्थ ग्रंथराज के बारे में बापूजी कहते हैं :

यह यज्ञ मैं आज तक करते आया हूँ और निरंतर करता ही रहूँगा। मेरे नाम की तरह ही यह यज्ञ भी अनिरुद्ध ही है। और उसमें से निर्माण होनेवाला प्रकाश भी। इस मार्ग का स्वीकार करो इसका मैं आग्रह नहीं करूँगा और ना ही मेरी विनती है। क्योंकि प्रत्येक जीवों का विचार स्वातंत्र्य और कर्म स्वातंत्र्य मुझे पूर्णरूप से मान्य है। ‘श्रीमद्‌पुरुषार्थ’ के अनुसार मेरा प्रत्येक निर्णय, कृति और कार्य होता रहा हैं और होते रहेंगा।

अनेक ऋषि, मुनि, आचार्य, संत, तत्त्वज्ञानी महापुरुषें और सामान्य लोगों के चिंतन पुष्पों से उन्होंने यह शहद इकठ्ठा किया है और इसे ‘श्रीमद्‌पुरुषार्थ’ रूपी ग्रंथ नामक छत्ते में एकजीव (एकत्रित) किया है…… यह छत्ता उन्होंने खुला रखा है, जिन्हें इसका स्वाद और औषधि गुण पसंद है उन सबके लिए।

श्रीमद्‌पुरुषार्थ ग्रंथराज किसलिए लिखा गया है?

हर एक श्रद्धावान देवयान पथ पर प्रवास करते हुए अपना प्रपंच और परमार्थ एक ही साथ आनंद से कर सके इसीलिये बापूजी ने इस ग्रंथ की रचना की। बापूजी के १३ कलमों से यह एक कलम है जिस में बापूजीने इन तीनों धर्मग्रंथों की रचना की है। हर मनुष्य अपना जीवन यशस्वीरूप से, आत्मविश्वास से जी सके इसके ये तीनों ग्रंथ मार्गदर्शक गुरु ही हैं।

तीनों खंड़ों की रचना :

१)सत्यप्रवेश : आत्यंतिक निवृत्तिवाद और ऐहिक स्वार्थ से संबंधित प्रवृत्तिवाद, इन दोनों एकांतिक बातों से व्यक्ति के जीवन में और समाज में असंतुलन हो जाता है। संतुलन बनाये रखनेवाला मर्यादा मार्ग ही मानव को ऐश्वर्य प्रदान करता है। इस मर्यादा मार्ग का परिचय बापूजी ने अत्यंत सरल शब्दों में आसान उदाहरण देते हुए समझाया है।

२)प्रेमप्रवास : मानवों का पवित्र प्रवास आनंदमय बनाने के लिए आवश्यकता है, संपूर्ण प्रवास भर उस एकमेव सत्य, अनादि अनंत ईश्वर की खोज करने की। और इसी सत्य की खोज अर्थात परमेश्वर की खोज अर्थात आनंद की प्राप्ति। किन्तु जब तक यह प्रवास प्रेममय स्वतंत्र नहीं होता तब तक आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती। समर्थ और तृप्त जीवन प्रवास का एकमेव मार्ग अर्थात ‘प्रेमप्रवास’ है। और प्रेम प्रवास अर्थात ‘मर्यादापुरुषार्थ’ श्रीमद्‍पुरुषार्थ का यह द्वितीय खंड तीन विभागों में विकसित होता है। १)पूर्वरंग, २)श्रीरंग-पुरुषार्थ पराक्रम और ३)मधुफल वाटिका।

३)आनंदसाधना : ‘आनंदसाधना’ अर्थात मर्यादा मार्ग पर चलते हुए परमेश्वर पर अपार प्रेम करते हुए राह के हर मोड़ , प्रत्येक दौर, पर हर जगह पनपनेवाले आनंद को प्राप्त करने के विविध उपाय। प्रत्येक जीवात्मा को अपने-आप को अधिकाधिक सुंदर और समर्थ करने के लिए सत्यप्रवेश और प्रेमप्रवास हमारा हाथ पकड़कर मार्गदर्शन करते हैं, तो वहीं आनंदसाधना जीवात्मा के इस परिश्रम को परमेश्वरी सहायता प्रदान करती है। साधना अर्थात कोई उग्र या कठोर उपक्रम न होकर, साधना अर्थात नवविधा निर्धार स्वयं के जीवन में यशस्वी रूप लाने के लिए परमेश्वर के अष्टबीज ऐश्वर्य और परमात्मा के नव-अकुंर-ऐश्वर्य से सहज रूप से जुड़ने का प्रयास है।

श्रीमद्‍पुरुषार्थ ग्रंथराज के कार्य :

‘सत्यप्रवेश’, ‘प्रेमप्रवास’, ‘आनंदसाधना’ ये तीनों मार्ग हैं, इनका ध्यान से अध्ययन करने पर ये तीनों ग्रंथ अलग-अलग न रहकर एकरूप हो जाते हैं और मानवीय जीवन को परिपूर्ण बनाते हैं, तो फिर चाहे वह सामान्य गृहस्थ जीवन की आवश्यकता हो या फिर पूर्ण आध्यात्मिक स्तर की आवश्यकता हो।

श्रीमद्‌पुरुषार्थ ग्रंथराज का श्रीहरिगुरुग्राम में आगमन :

प्रत्येक गुरुवार को श्रीमद्‍पुरुषार्थ ग्रंथराज के  मूल प्रति का आगमन श्रीहरिगुरुग्राम में होता है। दिंडी और चँवर डुलाते हुए इस ग्रंथ को स्टेज पर लाया जाता है। २५ रामनाम बहीयाँ लिखकर पूरा करनेवाले श्रद्धावान को श्रीमद्‌पुरुषार्थ ग्रंथराज की पालकी को उठाकर ले जाने की और ५० रामनाम बहीयाँ लिखकर पूरा करनेवाले श्रद्धावान को श्रीमद्‌पुरुषार्थ ग्रंथराज को चँवर डुलाने की सेवा मिलती है। हर एक श्रद्धावान श्रीमद्‌पुरुषार्थ ग्रंथराज के आगे सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करता है।

श्रीमद्‌पुरुषार्थ ग्रंथराज ग्रंथ कहाँ प्राप्त होंगे? :

ये तीनों ग्रंथ श्रीहरिगुरुग्राम में और ऑन लाईन पर उपलब्ध हैं।