रामराज्य की यात्रा ग्रामराज्य की स्थापना से शुरु होती है और ग्रामराज्य ही “ग्रामविकास” है – श्रीअनिरुद्ध बापूजी ने ६ मई २०१० के दिन बताई हुई रामराज्य की संकल्पना का मूलाधार है। इसीलिए बापूजी ने कोठिंबे स्थित श्रीगोविद्यापीठम्‌ में “अनिरुद्धाज्‌ इन्स्टिट्यूट ऑफ ग्रामविकास” अर्थात AIGV की स्थापना की।

बापूजी ने हमें समझाया है कि, ग्रामीण जीवन का उत्कर्ष हुए बिना भारत में रामराज्य नहीं आ सकेगा इसलिए यह कार्य करने के लिए भक्तिमय सेवा का साथ जरुरी है। गांवों में उपेक्षित मेहनतकश समाज की सहायता करना AIGV का मुख्य उद्देश्य है तथा उत्पादन बढ़ाना महत्वपूर्ण है ही मगर उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है उत्पादन का खर्च कम करना तथा घर के निजी जरुरतों को खर्च के बिना पूरा करना। यही अपने कार्य का ब्रीदवाक्य है।

AIGV अंतर्गत गोविद्यापीठम्‌ में कई उपक्रम चलाए जाते हैं। प्रायोगिक तत्व पर आरम्भ किए गए कार्य और भक्तिमय सेवाकार्यों के आधार पर एक-एक पायदान चढ़ते चढ़ते आज गोविद्यापीठम्‌ में इसका बदला हुआ रूप दिखाई देता है।

सन २०१३ से AIGV अंतर्गत गोविद्यापीठम्‌ में अक्तूबर से मई तक इन आठ महीनों के समय में जैविक खेती एवं पशुपालन के कोर्स कराए जाते हैं। इस निवासी डिप्लोमा कोर्स में उपलब्ध साधनों से संपन्नता की ओर ले जानेवाली कम खर्च के, गैर-विषैली शाश्वत खेती के तरीके प्रयोगों समेत सिखाए जाते हैं। इस डिप्लोमा कोर्स में अब तक मुंबई, पुणे, सांगली, सातारा, कोल्हापुर, औरंगाबाद आदि स्थानों से कई श्रद्धावान शामिल हुए और अपने अपने उपासना केंद्र अंतर्गत आसपास के ग्रामीण भागों में ग्रामविकास का कार्य आगे बढा रहे हैं। इसी तरह संस्था के कार्यकर्ता ग्रामीण भागों में जाकर लोगों को परसबाग, केंचुआ खाद जैसे 1/2 दिन के Crash Course भी करवा रहे हैं।

छोटी छोटी योजनाओं के जरिए प्रगति करनी होती है तथा गांव-गांव में निरविरोधता से कार्य करना होता है। ग्रामविकास का पहला और आसान उपाय है ‘परसबाग’। परसबाग में अपने पास उपलब्ध जगह में घर की साधनसामग्री, रसोईघर के पानी का यथोचित इस्तेमाल करके रोजमर्रा के आहार में ग्रहण की जानेवाली पत्तों की सब्जियां, तरकारी, बेलों की सब्जियां आदि की ऋतु अनुसार नियोजित बुआई की जा सकती है। गांवों में पिछले आंगन में अथवा घर के सामने छोटीसी जगह में, तो शहरों में यही परसबाग रसोईघर में अर्थात kitchen garden में या छत पर अर्थात terrace garden के नाम से प्रचलित है।

AIGV में जैविक खेती पध्दति का अवलंब किया जाता है। इसकी वजह से रासायनिक एवं किटाणुनाशकों का खर्च बचता है। केंचुआ खाद, गोबर खाद, सोन खाद, कंपोस्ट खाद बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसी तरह आवश्यक नीमार्क, दशपर्णीअर्क, जीवामृत, बीजामृत बनाने के तरीके सिखाए जाते हैं। यहां पर Azolla प्रकल्प उभारा जाता है जिससे खेती के लिए खाद एवं मवेशियों के लिए चारा प्राप्त होता है।

वनरोपण में उपयुक्त पेड़ों की जानकारी दी जाती है। ये पेड़ बंजर जमीन में लगाए जाने पर सूखी जमीन को उपजाऊ जमीन में रूपांतरित करते हैं, जमीन का रूखापन दूर करते हैं तथा जमीन में पानी को पकड़े रहते हैं।

पशुपालन अंतर्गत गाय, भैंस, बकरी पालन समेत मुर्गी पालन, बटेर पालन, खरगोश पालन के प्रयोगों समेत प्रशिक्षण दिए जाते हैं। इसके अंतर्गत उनके आहार से लेकर साफ सफाई एवं स्वास्थ्य बीमा तक सारी जानकारी प्रदान की जाती है।

हाल ही में बिनामाटी खेती अर्थात Hydroponics नामक तकनीक का इस्तेमाल करके मवेशियों को सालभर ताजा एवं पौष्टिक चारा देने हेतु हरितगृह बहुत ही कम खर्च में यशस्वी तरीके से उभारा गया। जैविक खेती अंतर्गत पपया, केले, तरबूज, कद्दू, अद्रक, हल्दी, स्ट्रॉबेरी का भी उत्पादन किया जाता है।

‘करने के बाद बाताना’ इस तत्व के अनुसार AIGV का कार्य अविरत जारी है। आध्यात्म की नींव होने की वजह से कार्य आसान हो रहा है। निर्धन मेहनतकश किसानों को उनकी निजी जरुरतें पूरी करने के लिए आवश्यक जानकारी दिए जाने से तथा उनकी सहायता करने से ग्रामीण विकास अवश्य होगा जिससे किसानों की आत्महत्याएं टल जाएंगी। इस तरह से सद्‌गुरु श्रीअनिरुध्द बापू सुजलाम्‌ सुफलाम्‌ रामराज्य निश्चितरूप से स्थापन करके ही रहेंगे।