Avahanam Na janami_Final

आवाहनं न जानामी पुस्तक से संबंधित :

सन १९९७ की रामनवमी के पर्व पर डॉ. अनिरुद्ध धैर्यधर जोशी (सदगुरु श्री अनिरुद्ध बापू) इन्होंने लिखे हुए “आवाहनं न जानामी” इस पुस्तिकका प्रकाशन किया गया था। सरल भाषा में एक भक्त के अंतर्मन में उठनेवाले विचारों और गहरी अरज की प्रस्तुति इसके अन्तर्गत की गई है। एक सच्चे श्रद्धावान का उसके सद्गुरुसे होनेवाला संवाद इस पुस्तक में सादर किया गया है। जो हर किसी के दिल को छू लेता है। जीवन में हम जिन प्रश्नों से जूझते रहते हैं, उन सभी प्रश्नों को बापूने उपस्थित किया है। एक साधारण भक्त की भूमिका निभाते हुए बापू ने यह पुस्तक लिखी है।

आवाहन न जानामी पुस्तक के बारे में बापू कहते हैं :

यह आवाज है एक भक्त की, जो नाम सुमिरण करता है, जो पूजा अर्चा करता है , जो एकांत में रहना चाहता है , जो जनमानस में रहकर अपनी साधना करता है। यह विनती है, अपने माँ से प्यार करनेवाले एक बालक की। यह प्रार्थना है एक भक्त की बिल्कुल अंदरुनी, काफी गहरी और उस अनंत की ओर जानेवाली।

आवाहनं न जानामी… यह एक क्षमाप्रार्थना है।

ना ही मुझे कर्मकांड पता है, ना ही मैं तुम्हारी पूजा अर्चना भी कर पाता हूँ। मैं ठीक तरीके से तुम्हारा आवाहन भी नहीं कर सकता। इसलिए तुम मुझे क्षमा करना, मैं केवल तुम्हें प्यार कर सकता हूँ और मेरे इस प्यार और इन्हीं कमजोर प्रयासों को तुम प्रेमसे अपना लो। दिल से निकली मेरी अरज को सुनकर मुझे कृतकृत्य करो।

आवाहनं न जानामि न जानामि तवार्चनम।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि।।
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे।।

यह प्रार्थना यानि यह पुस्तक… कर्मकांड और सभी भौतिक क़वायतोंसे परे आर्त/ करुणा भाव यानि यह पुस्तक।

आवाहनं न जानामी पुस्तक की भाषाशैली :

यह पुस्तक बापू ने अपनी ख़ास भाषाशैली में लिखी है। जिस तरह कली से फूल बनते समय उसकी एक एक पंखुडी कोमलता से खिलती है, उसी तरह भक्त का मन, उसके मन की बेचैनी, भगवान् के प्रति उसके मन में बसा प्रेम धीरेधीरे प्रकट होता है। इसीकारण पाठक शुरु से ही इस पुस्तक में बिल्कुल डूब जाता है। बापू द्वारा लिखे हुए शब्द पढ़तेपढ़ते इस पुस्तक में लिखी हुई अरज / गुहार अनजाने में कब उस पाठक की हो जाती है इस बात का उसे पता भी नहीं चलता। इस पुस्तक के जरिए क़रीबी मित्र की भाँति बापू ने अपने सद्गुरु से संवाद किया है। इसी वजह से हम समझ पाते हैं कि, सही मायने में सद्गुरु से किस तरह से संवाद किया जाता है।

आवाहनं न जानामी पुस्तक कहाँ मिलेगी :

यह पुस्तक प्रिंट स्वरुप और ई-बुक स्वरूप में ई-शॉप आंजनेय (निम्नलिखित संकेतस्थल) पर उपलब्ध है।

https://www.e-aanjaneya.com/productDetails.faces?productSearchCode=ANJMDL
प्रकाशक : ईशा पश्यंती प्रकाशन