bal vidyaबलविद्या का इतिहास :

आदिकाल के समय भारत में ६४ प्रकार की विविध कलाएँ एवं ६५ प्रकार की विविध विद्याएँ अस्तित्व में थीं। हर एक प्रकार की कलाएँ आज पूर्णत्व प्राप्त कर चुकी थीं इन सब का अध्ययन करने से हर एक व्यक्ति का व्यक्तिगत विकास पूर्णरूप से हो चुका था। इस प्रकार के व्यक्ति अकसर राष्ट्रीय, सामाजिक एवं पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूर्ण करने में सफलता प्राप्त करते थे। इस प्रकार के विविध कौशल्य एवं ज्ञान का घनावृक्ष इन सब को एकत्रित रूप में ‘बलविद्या’ कहा जाता है और इससे ही मानसिक, शारिरिक एवं बौद्धिक शक्ति की वृद्धि होती। इसके साथ ही मन एवं बुद्धि का एकत्रित रूप में काम करने की शक्ति भी प्राप्त होती है।

हर किसी को मानसिक तौर पर, शारीरिक तौर एवं बौद्धिक तौर पर अत्याधिक सक्षम होना ही चाहिए।’ लड़ाई केवल शक्ति के बल पर ही जीती जाती है ऐसा बिलकुल भी नहीं है। मन और बुद्धि भी हमारे शरीर की बराबरी में ताकतवर (सक्षम) होने चाहिए। कारण युद्ध केवल शारिरिक सामर्थ्य का उपयोग करके ही नहीं किया जाता है। बल्कि वह हमारे मानसिक एवं बौद्धिक स्तर पर भी शुरु रहता है।

स्वयं श्रीअनिरुद्ध बापू मुदगलविद्या, अश्वविद्या, सूर्यभेदन विद्या, यशवंती मल्लविद्या आदि सभी भारतीय प्राच्यविद्याओं में निपुण हैं। इसीलिए इस बलविद्या को पुनरुज्जीवित करने का संकल्प उन्होंने किया है। श्रीहेमाडपंत स्मरणार्थ प्राच्यविद्या संशोधन प्रशाला केन्द्र, जुईनगर, नवीमुंबई में सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धजी ने बलविद्या प्रशिक्षण की शुरुआत की।

बलविद्या के अध्यापन के विषय –

इस प्रशिक्षण के अन्तर्गत मुद्‌गलविद्या, वज्रमुष्ठी, सूर्यभेदन, यशवंती मल्लविद्याओं के प्रकार हैं, साथ ही लाठी, काठी, फरी – गदगा, डोरखंड, दांडपट्टा आदि का समावेश होता है। यह प्रशिक्षण पुरुष एवं स्त्रियाँ दोनों को ही दिया जाता है।

२४ अक्तूबर २०१२ विजयादशमी के दिन बलविद्या के शस्त्रों की गतिविधियों का अध्ययन सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करनेवाली ‘भारतीय प्राचीन बलविद्या’ नामक पुस्तक प्रकाशित की गई। विशेषज्ञों एवं मार्गदर्शकों से प्रशिक्षण लेने के पश्चात्‌ही अभ्यास हेतु इस पुस्तक का आधार लेने पर अचूक रूप में जलदगति के साथ प्रगति की जाती है। बलविद्या में निपुणता एवं अचूकता लाने हेतु इस पुस्तक में सुस्पष्ट रूप में रेखाचित्रों का भी उपयोग किया गया है। इसीलिए प्रशिक्षणार्थियों को ज़रूर फायदा होगा।

आज के जानलेवा प्रतियोगितात्मक युग एवं अनियमित जीवनशैली के कारण तनावग्रस्त युवावर्ग आरोग्य की ओर ध्यान नहीं दे पा रहा है। ऐसे में बलविद्या का प्रशिक्षण लेने पर शारिरिक आरोग्य तो उत्तम होगा ही साथ मन एवं बुद्धि को भी चालना मिल जाने से वे जिस क्षेत्र में कार्यरत होंगे उस क्षेत्र में भी उचित यश प्राप्त करना सहज ही संभव हो जायेगा।