AniruddhaFoundation-Charkha

 

रोटी कपड़ा और मकान, मनुष्य की इन मौलिक आवश्यकताओं के कारण भारत में अनेक जगहों पर इन बातों ने समस्या का रूप धारण कर लिया है। आज फिर से एक बार अनेक अभागे जीवों को गरीबी के दुष्टचक्र से बाहर निकालने के लिए चरखा सुसज्ज हो गया है।

यह उपक्रम शुरु करने के पहले यह संस्था पूर्ण रूप से उस विभाग की जानकारी हासिल करती है, वहाँ के रहिवासी लोगों की आवश्यकताओं को निश्चित करती है और उसके अनुसार फिर वह उपक्रम किया जाता है। ऐसी जानकारी लेते समय पहले उस दुर्गम भाग के बच्चों की उपस्थिति शाला में बहुत कम पाई गई। जहाँ पर अन्न-वस्त्र ऐसी समस्याएँ मुख्य रूप से घेरे हुए हैं, ऐसे वर्ग के लोग ‘पढ़ने नहीं जाते’ यह कोई अनोखी बात नहीं है।

चरखा चलाते समय होनेवाले शारीरिक श्रम का रूपांतर अंत में भक्तिमय सेवा में हो जाता है। इस श्रम द्वारा तैयार किए गए सूत का रूपांतर बाद में वस्त्र बनाने में किया जाता है। कष्ट करनेवाले मजबूर, निराधार देश के बांधवों को इस वस्त्र की बहुत ही आवश्यकता है। हम चरखा चलाकर श्रमदान करते हैं और मुख से नामस्मरण करने से यह सेवा परमेश्वर की चरणों में अर्पित करते हैं।

श्री अनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन ने चरखा वितरीत करने के साथ ही घर-घर में यह घूमनेवाला चरखा नियमित रूप से चलता रहे इसके लिए चरखे की देखभाल करने के लिए प्रशिक्षिकों का गट भी तैयार किया है। मुंबई, ठाणे, पुणे, नाशिक, कोल्हापूर, औरंगाबाद, धुले, जलगाँव इत्यादि स्थानों पर श्री अनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन के थोड़े मोड़े न होकर लगभग साढ़े तीन सौ से अधिक स्वयंसेवक कार्यरत हैं। मन में यदि थोड़ी सी भी बैचेनी हो तो थोड़ी देर भी यदि चरखा चलाया जाए तो मन शांत हो जाता है ऐसा अनेक स्वयंसेवकों का कहना है। मैं जब भी चरखा चलाता हूँ, तो मुख से नामस्मरण भी करते रहता हूँ। मंत्र के साथ ही सेवा भी होते रहती है। इसके कारण मैं मेरे जीवन में जिस दुष्टचक्र में फँसा हूँ, उसमें से धीरे-धीरे मेरा छुटकारा होने लगता है और मैं अपना परमार्थ गृहस्थी में रहते हुए भी अच्छी तरह से पूरा कर सकता हूँ।

प्रत्येक वर्ष चरखेद्वारा काते हुए सूत से ४५ से ५० हजार मीटर कपड़ा बनाया जाता है। इसके बाद उनसे विविध साईज के शालेय यूनिफॉर्म सिलवाये जाते हैं। ये सारी प्रक्रियाएँ संस्था के खर्चद्वारा ही की जाती है।

आज संस्था की ओर से कोल्हापुर के पास के आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए भाग में सन्‌ २००४ वर्ष से ही वैद्यकीय और आरोग्य शिविर हर वर्ष आयोजित किया जाता है। इसमें हजारों श्रद्धावानों ने अपनी मेहनत से चरखा चलाकर तैयार किए गए युनिफॉर्मस्‌ के दो-दो सेट प्रत्येक छात्र को हर वर्ष दिया जाता है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय चरखे ने इतिहास बनाया था। और इसी चरखे के सूत ने पूरे भारतीयों को एक संघ में दृढ़ता से बाँध रखा था। आज फिर से एक बार इस चरखा योजना द्वारा भारत के नए वैभवशाली इतिहास रचने की सुवर्णसंधि हमें प्राप्त हुई है, उसे हम क्यों छोड़े?