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श्रीसाईसमर्थ विज्ञान प्रबोधिनी नामक इस संलग्न संस्था द्वारा “धांगडधिंगा” नामक यह कार्यक्रम छोटे-छोटे बच्चों के लिए आयोजित किया जाता है। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत ९ से लेकर १२ वर्ष के बच्चों को इस दस से पंद्रह दिन के शिविर में सहभागी होने की अनुमति दी जाती है।

संकल्पना :

बच्चों के सुप्तगुणों का विकास करके उनका आत्मविश्वास बढ़ाने हेतु परमपूज्य अनिरुद्ध बापू  के मार्गदर्शन के अन्तर्गत नंदाई द्वारा शुरु किया गया यह अभिनव उपक्रम है। “धांगडधिंगा” इस शब्द का अर्थ ही कुछ इसप्रकार है कि किसी भी प्रकार के रोकटोक बगैर बच्चे अपना मनोगत व्यक्त कर सकें, आनंद लूट सकें, इस प्रकार की विविध कृतियाँ, खेल आदि। नंदाई ने सन १९९८ में सर्वप्रथम “धांगडधिंगा” शिविर का आयोजन किया था। पिछले सत्रह सालों में २००० से की अपेक्षा अधिक बच्चों ने इसका लाभ उठाया है। हर साल साधारण तौरपर यह शिविर मई महिने में आयोजित किया जाता है और इस की अवधि पंद्रह दिनों की होती है।

शिविर का हेतु :

हर किसी को जन्मजात तौर पर सुप्तगुणों की देन मिली होती है और बाल्यावस्था में ही उन गुणों का विकास होना आवश्यक होता है। उनके रोजमर्रा के अंन्तर्गत स्कूल, ट्यूशनक्लासेस, तथा अन्य सिखाने वाले लोग, पढ़ाई इन सभी बातों का जोर इतना अधिक होता है कि सुप्तगुणों के प्रकट होने का कोई अवसर ही उन्हें प्राप्त नहीं हो पाता है इससे होता यह है कि उनके अंदर छिपे हुए कौशल्य को उभरने का मौका ही उन्हें नहीं मिल पाता है। बच्चों का “बचपना” खो सा चला जा रहा है। परिस्थितियों के बावजूद बच्चों का उचित विकास हो सके यही इस उपक्रम के पिछे छिपा हेतु है। इसी पृष्ठभूमिपर धांगडधिंगा शिविर बच्चों को उनका खोया हुआ बचपना पुन: उन्हें लौटाने वाला अनोखा उपक्रम है।

इस उपक्रम के अन्तर्गत होने वाली सभी गतिविधियाँ उनका आत्मविश्वास वृद्धिगत करने वाली, उनके व्यक्तित्व का विकास करने वाली होती हैं।

धांगडधिंगा के विविध उपक्रम :

शिविर में सहभागी बच्चों-बच्चियों में भक्ति की चाह इस बाल्यावस्था से ही उत्पन्न करने हेतु प्रतिदिन वर्ग शुरू होते समय एवं समाप्ति के समय उनसे प्रार्थना करवायी जाती है। इससे यह होता है कि गुरुक्षेत्रमंत्र एवं हनुमानचलिसा स्तोत्र साथ ही हनुमत्कवच मंत्र इन बच्चों के दैनंदिन जीवन का एक अंग ही बन जाता है।

इस शिविर के अन्तर्गत विविध प्रकार के खेल खिलाये जाते है। जैसे मैदानी खेल, बैठकर खेलनेवाले खेल, स्मरणशक्ति के खेल इस तरह से विविध प्रकार होते हैं। विविध कौशल्यधारी क्राफ्ट की वस्तुएँ तैयार करना उन्हें सिखाया जाता है और उनसे करवाया भी जाता है। इससे बच्चों की एकाग्रता बढ़ती है। खाने-पीने की आरोग्य वर्धक आदतें उन्हें लगने के लिए उत्तम, आरोग्यदायी, पौष्टिक अन्नपदार्थ सभी बच्चों को दिया जाता है।

साथ ही बच्चों को कागज के लग्दे से विविध प्रकार की वस्तुएँ बनाना सिखाया जाता है। बच्चे अपनी मर्जीनुसार कुछ न कुछ बनाकर इच्छानुसार रंग उसमें भरते हैं एवं आनंद का अनुभव करते हैं। वे उन वस्तुओं को सुखाते हैं, पुन: उनमें रंग भरते हैं और अंतत: अपनी ही कलाकारी देख वे फुले न समाते हैं। इस शिविर के अंतिम दिन इन वस्तुओं की प्रदर्शनी लगायी जाती है। सभी शिविरार्थियों के लिए एक दिन की पिकनिक अयोजित की जाती है। इस पिकनिक की मौज-मजा यह इन बच्चों के लिए एक खजाना ही होता है।

कुल मिलाकर एक खुशियों का खजाना, धमाचौकड़ी परंतु इस सुनियोजित धांगडधिंगा शिविर की पालक एवं बच्चें अकसर प्रतिक्षा करते रहते हैं। अकसर पालक हमारे बच्चों-बच्चियों को भी यह सुअवसर प्राप्त हो ऐसी ही विनंती भी करते रहते हैं।

पालकों का अभिप्राय :

अपने पाल्यों में दिनों-दिन होते रहनेवाली सुंदर बदलाव पालकों की आश्चर्यचकित कर देता है। और फिर वे पत्रों द्वारा, इ-मेल द्वारा, प्रत्यक्ष मिलकर बच्चों मे होने वाले इन बदलावों तथा गुणवर्णन आदि करने के लिए उनके पास तो मानों शब्द ही नहीं होता है। वे अपने बच्चों में होने वाले इस सुंदर बदलाव को देख निश्चिंत हो जाते है और सदैव “अंबज्ञ” रहते हैं।

सच! नंदाई के इस शिविर से, इस स्तुत्य उपक्रम से बच्चों में अपने आप ही शिष्टाचार आ जाता है। नंदाई के प्रेम में नहाकर निकलने वाले ये आज के बच्चे कल के राष्ट्र के सच्चे एवं मजबूत आधार स्तंभ हैं और इन्हीं बच्चों से हमारे राष्ट्र को प्रतिमा उज्ज्वल होगी।
विल्यम बर्डस्वर्थ के अनुसार- “Child is the father of man” इनके इस वाक्यको ये बच्चे जरूर साकार करेंगे।