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परमपूज्य सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धजी के संकल्पना से गोविद्यापीठम्‌ साकार हुआ। ८ अप्रैल २००२ इस दिन बापुजी के मार्गदर्शनानुसार श्रीकृष्ण गोवर्धन गिरिधारी मुर्ति की स्थापना मंदिर में की गयी और अखंडित रूप में प्रज्वलित रहनेवाला धुनीकुंड भी प्रज्वलित किया गया। १३/०४/२००२ से १५/०५/२००२ इस कालावधि में ‘चैत्र उत्सव’ उद्‍घाटन समारोह अतिशय पवित्र एवं उत्साहपूर्ण वातावरण में मनाया गया।

यह क्षेत्र कोठिंबे, कर्जत यहाँ १६ एकड़ जमीन पर स्थित है। कर्जत रेल्वे स्टेशन यह १६ किमी दूर है।

१) गोविद्यापीठम्‌ के उद्दिष्ट :

१) गोपालन विद्या, २)गोविंदविद्या, ३)प्राचीन कला एवं संस्कृति का अभ्यास, संशोधन एवं विकास, ४)शारीरिक शिक्षा एवं प्राचीन युद्धकला उनकी शिक्षा इन चारों ही विषयों से संबंधित गहन अध्ययन करने का उद्देश्य सामने रखकर ही गोविद्यापीठम्‌ की स्थापना परमपूज्य बापूजीने की।

२) गोपालन विद्या :

भारतीय संस्कृति के अन्तर्गत गोमाता को विश्वरूप एवं परमेश्वर स्वरूप माना गया है। आधुनिक विज्ञानने भी गाय, उसका दूध, गोमुत्र, गोबर इन सभी को जीवन में एवं औषधिशास्त्र में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। कृष्णबंधू श्रीबलराम ने उस काल के दौरान गीर गायों की जो पुनरूत्पादन प्रक्रियाओं का सर्वप्रथम अवलंब किया उन प्रक्रियाओं से संबंधित संशोधन एवं अध्ययन यहाँ पर किया जाता है। नवीन तकनीकी ज्ञान का उपयोग करके संपूर्ण मानव जाति को विकास साध्य करने के लिए श्रीकृष्ण के गोपालविद्या के विविध पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।

३) श्रीगोविंदविद्या :

गोविंद अर्थात श्रीकृष्ण। भगवान श्रीकृष्ण का व्यक्तिमत्व, उनका जीवन, उनका सामर्थ्य, उनका कार्य और उनकी दार्शनिकता (तत्त्वज्ञान) इन सभी का अध्ययन करना अर्थात गोविंदविद्या सिखना।

४) प्राचीन एवं अतिप्राचीन भारतीय विद्या एवं श्रीकृष्ण के दार्शनिकता का पुनरुज्जीवन :

कालांतर में लुप्त हो चुकी गोविद्या, गोमतिविद्या, गायत्रीविद्य साथ ही पुण्य फलदायी मंत्र उदा. – गोसूक्त, गोमतिमंत्र, सुरभीमंत्र, गायत्रीमंत्र आदि का पुनरूज्जीवन करना, यह भी एक ध्येय है।

५) शारीरिक शिक्षा, व्यायाम, प्राचीन युद्धकला :

यह सब उस स्थान पर सिखाना और इसके साथ ही नैसर्गिक एवं ग्रामीण वातावरण को सुंदर स्वास्थ्यप्रद बनाये रखना यह संकल्प भी है।

६) गोविद्यापीठम्‌ के स्थान का महाम्य एवं अन्तर्गत रचना :

१) गोविद्या अभ्यासक कक्ष अर्थात श्रीकृष्ण मंदिर :

इस कक्ष में प्रवेश करते ही अपना ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती है गोवर्धन गिरधारी श्रीकृष्णमूर्ति। यहाँ के भगवान श्रीकृष्णने बाहिने हाथ के कनिष्ठ अंगुली पर उठाया हुआ गोवर्धन पर्वत आज भी हमें हमारे सुरक्षा की गवाही देती है।

इस मंदिर के अर्थात मानों गोप-गोपियों द्वारा पर्वत को उठाये रखने के लिए श्रीकृष्ण के चरणों में की हुई प्रेमपूर्वक प्रार्थना ही है। यहाँ के परिक्रमा मार्ग के हमारे बायीं ओर के खंभे की ओर से दस गुरुओं की प्रतिमाओं का दर्शन होता है और परिक्रमा मार्ग का क्रमण करते हुए श्रीकृष्णमूर्ति के बाहिने ओरवाले खंभे पर हमें श्रेष्ठ संतों की प्रतिमाओं का दर्शन होता है।

२) पुष्करिणी तीर्थकुंड :

भगवान श्रीकृष्ण के मूर्ति के समक्ष ही हो सके ऐसे अंतर के दरमियान तीर्थकुंड की निर्मिती की गई है। उसके तीर पर मंदिर की मूर्ति के समक्ष मुचकुंद एवं कदम्ब के वृक्ष हैं। गोवर्धन गिरधारी श्रीकृष्ण को अभिषेक किया जानेवाला जल उस कुंड में डाला जाता है।

३) गरुडस्तंभ अर्थात पापविमोचक स्तंभ :

पुष्करिणी तीर्थकुंड एवं गोविद्या अभ्यास कक्ष में चौकोनी चबूतरे पर गरुड स्तंभ की स्थापना की गई है। गरुडस्तंभ के शिखर पर पूर्व एवं पश्चिम की ओर मुचकुंद वृक्ष को एवं कृष्ण भगवान को नमस्कार करनेवाली गरुडमूर्ति है। स्तंभ पर स्थित गरूड एवं हनुमानजी ये दोनों ही भक्तिदेवता के प्रतीक हैं।

४) ध्यानकुटिर :

षट्‌कोनाकृति पाँच ‘ध्यानकुटिर’ यहाँ पर हैं। गोबर से लिए गए इन ध्यानकुटियों में बैठकर ध्यान, मनन, चिंतन जब श्रद्धावान करते हैं तभी वे एकाग्रचित्त हो सकते हैं। इससे उनका चित्तशुद्ध होता है। षड्‍रिपुओं का नाश होता है। तीन अप्रैल २००२ से बारह अप्रैल २००२ इन दस दिनों में तैंतीस जपकोंने मिलकर इन पाँचों कुटियों में बैठकर जप किया और इन कुटियों को सिद्ध किया।

५) धुनीमाता :

दिनांक आठ अप्रैल २००२ के दिन सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धने गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण की मूर्ति की स्थापना करने पर सायं ४ बजे धुनीमाता की स्थापना की। इसके पश्चात्‌ बापू की आज्ञा का पालन करते हुए सुचितदादाने धुनी प्रज्ज्वलित की। वह दिन है और आज का दिन तब से लेकर आज तक यह धूनी अखंड प्रज्ज्वलित है। इस धुनी की उदी श्रीगुरुक्षेत्रम्‌ खार के उदीकुंड में एकत्रित होती है। संपूर्ण जगभर में यही उदी प्रसाद रूप में श्रद्धावानों को बाँटी जाती है।

६) तुलसी-वृंदावन :

गोविद्यापीठम्‌ में प्रवेश करते ही बायीं ओर नारियल बाग में स्थापित किया गया ‘वृंदावन’ दिखाई देता है। यह तुलसी वृंदावन अर्थात पावित्र्य, मांगल्य, भक्ति एवं शक्ति का उगमस्थान ही है मानो।

७) बरगद का चौरा (चबूतरा) :

इस बरगद के चौरे के पास ‘ॐ आदिगुरु गोपालक दत्तात्रेय पाही माम!’ नामक यह जप किया जाता है। यहाँ के हरीभरी घास से भरे हुए स्थान में गोशाला के गायों को प्रतिदिन प्रात: ७.३० से ९.३० तक मुक्तरुप में चरने के लिए छोड़ दिया जाता है।

८) द्वारकामाई :

श्रीसाईनाथ १९१६ में शिरड़ी में जिस द्वारकामाई में रहते थे उस समय बाबा की जैसी द्वारकामाई थी बिलकुल वैसी की वैसी ही द्वारकामाई बापू ने इस स्थान पर स्थापित की है। यहाँ पर बापू ने उदी देनेवाले साईनाथ की मूर्ति को स्थापित किया है। इस द्वारकामाई की दीवारें भी उदी से ही बनाई गईं हैं। यहाँ पर बैठकर बाबा की मूर्ति की ओर देखते हुए ध्यान, चिंतन, अध्ययन करने पर तुम्हारे अंदर होनेवाली भक्ति को अपने-आप बल प्राप्त होने ही वाला है।

९) AIGV :

AIGV (Aniruddha’s Institute of Gramvikas) की स्थापना बापु ने गोविद्यापीठम्‌ यहाँ की है और यह project काफी बड़े पैमाने पर कार्यान्वित हुआ है।

हर शनिवार और रविवार ३ से ४ उपासना केंद्रों के श्रद्धावान बड़ी संख्या में यहाँ श्रमदान करने के लिए आते हैं और भक्ति-सेवा का लाभ लेते हैं।