AniruddhaFoundation-Gurupournima Utsav

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:।
गुरुरेव परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नम:॥

 

भारतीय संस्कृति में ‘आषाढ़ पूर्णिमा’ का दिन गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। भगवान व्यास मुनि का जन्म दिन होने के कारण इसे व्यासपूर्णिमा भी कहा जाता है।भक्ति को सेवा की जोड़ देकर संसार और परमार्थ करते हुए एक ही समय में आनंद प्राप्त करने के लिए और स्वयं का समग्र विकास करने के लिए मनुष्य को ओज की, गुरुतेज की आवश्यकता होती है और यह गुरुतेज प्रत्येक को सद्‌गुरुतत्त्व से ही प्राप्त होता है।

गुरुपूर्णिमा के दिन सद्‌गुरु के ऋणों का स्मरण ध्यान में रखते हुए उनका दर्शन लेने से भक्त अधिक से अधिक गुरुतेज सहजता से प्राप्त कर सकता है।गुरुतेज को स्वीकारने में आनेवाले अवरोध गुरुपूर्णिमा के शुभदिन अपने आप दूर हो जाते हैं, और गुरुतेज का अनिरुद्ध प्रवाह प्रवाहित होने लगता है, ऐसी गुरुपूर्णिमा की महत्त्ता है।श्रीगुरु की कृपा और गुरुभक्ति का आनंद लूटने का दिन ही गुरुपूर्णिमा है। इस दिन सद्‌गुरु के ऋणों का स्मरण करके उनके प्रेम का स्वीकार करना चाहिए।संस्था द्वारा सर्व समर्थ और सर्वज्ञ सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धजी के उपस्थिति में पहला गुरुपूर्णिमा का उत्सव सन्‌ १९९६ में दादर में बड़े ही आनंद और उत्साह के साथ मनाया गया था।

 

सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धजी का प्रमुख गुणधर्म श्रद्धावानों को प्रेम देना और उन्हें क्षमा करना ही है।गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुदक्षिणा के रूप में श्रद्धावानों से उनका ‘पाप’ माँगनेवाले श्रीअनिरुद्धजी की श्रद्धावानों के प्रति अपार प्रेम की गणना नहीं की जा सकती।गुरुपूर्णिमा के पवित्र दिन गुरुऋणों का स्मरण करके सर्वप्रथम स्वयं परमपूज्य सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापू, नंदाई व सुचितदादा तीनों मिलकर ‘श्रीनृसिंह सरस्वतीजीं’ की पादुका का पूजन करते हैं। इसके बाद इन पादुका के दर्शन का लाभ सारे श्रद्धावान भक्तों को मिलता है।

हरसाल होनेवाले गुरुपूर्णिमा के उत्सव में विश्व के गुरुतत्त्व के प्रतिक वाले श्रीत्रिविक्रम के तीन पदन्यास (कदमों/चरणों) का पूजन व महापूजन किया जाता है।

श्रीत्रिविक्रम पूजन :

परमेश्वर की शुभंकर यंत्रणा और अशुभनाशिनी यंत्रणा, ये दोनों यंत्रणाएँ बाह्य विश्व के अनुसार अंर्तविश्व में भी अर्थात मनुष्य के देह में भी कार्यरत हैं।

सद्‍गुरुतत्त्व मानव के जीवन में इन दोनों यंत्रणाओं को सक्रिय करने का कार्य करते हैं। इस सद्‌गुरुतत्त्व के प्रतिनिधि है- श्रीत्रिविक्रम! सद्‌गुरुतत्त्वरुपी श्रीत्रिविक्रम अपने तीन पदन्यास द्वारा अनन्यशरण आनेवाले श्रद्धावानों के दुष्प्रारब्ध को नष्ट करके उनके जीवन में आनंद के उपवन खिलाते हैं।

जिस क्षण हम त्रिविक्रम की शरण में जाते हैं, उसी क्षण त्रिविक्रम का ‘पदन्यास’ हमारे मन में सक्रिय हो जाता है। चाहे हमारा पाप कितना भी बड़ा क्यों न हो इस त्रिविक्रम को हमारे जीवन में प्रवेश करने से कोई भी रोक नहीं सकता ऐसी श्रद्धावान की भावना होती है।

इसीलिए श्रद्धावान गुरुपूर्णिमा के दिन सद्‌गुरुतत्त्व के प्रतिनिधी स्वरूप श्रीत्रिविक्रम दर्शन लेते हैं। उनका पूजन करते हैं, और उनकी प्रार्थना करके अपने जीवन में उन्हें आने का आमंत्रण करते हैं। हमारे जीवन में नित्य गुरुपूर्णिमा बनी रहे, अशुभों का नाश हो और सदैव शुभ ही हो इस भाव से गुरुपूर्णिमा के दिन श्रद्धावान श्रीत्रिविक्रम का पूजन करते हैं।

उसी प्रकार इस पवित्र दिन परमपूज्य बापू के ‘मूल सद्‌गुरु की पादुका’ ‘पूर्वावधूत कुंभ’ व ‘अपूर्वाधूत कुंभ’ अर्थात पहले और २४ वे अवधूत कुंभ इस स्तंभ पर रखा जाता है।

परमपूज्य सद्‌गुरु बापू, नंदाई व सुचितदादा इस स्तंभ के चारों ओर रामनाम बही के लगदि से बनी इष्टिका सिर पर रखकर प्रदक्षिणा करते हैं, जिस इष्टिका पर भगवान श्रीविठ्ठल खड़े थे वही मेरे सिर पर है, यही भाव रखकर प्रत्येक श्रद्धावान “साईराम, जय जय साईराम, दत्तगुरु सुखधामा। अनिरुद्ध बापू सद्‌गुरुराया, कृपा कर जो देना छाया।” गजर गाते हुए प्रदक्षिणा करते हैं, और इन सद्‌गुरु के चरण मेरे हृदय में कायम रूप से स्थिर हो जाए यही प्रार्थना हर श्रद्धावान करता है।
इस दिन सद्‌गुरु भक्तिगंगा की दिंडी में परमपूज्य सद्‌गुरु के बापू के पद्‌चिन्हों को लेकर घूमनेवाले पालखी में रखे पदचिन्हों पर मस्तक रखने की संधी प्रत्येक श्रद्धावान को मिलती है।गुरुपूर्णिमा के दिन अखंड प्रज्ज्वलित अग्निहोत्र में सभी श्रद्धावान उद अर्पण कर सकते हैं और अपने ओर से अन्य आप्तस्वकियों के योगक्षेम के लिए प्रार्थना कर सकते हैं।

 

इस दिन हर एक घंटे के बाद श्री अनिरुद्ध चलिसा पठण का लाभ सभी श्रद्धावान ले सकते हैं एवं इसी समय परमपूज्य बापू उदी को हस्तस्पर्श करते है और ये उदी प्रसाद श्रद्धावानों को दिया जाता हैं।
गुरुपूर्णिमा के पावन दिन परमपूज्य बापूजी के दर्शन श्रद्धावान रात के ९.०० बजे तक ले सकते हैं और इसके बाद महाआरती होती है।

गुरुपूर्णिमा के दिन या अन्य किसी भी दिन कभी भी परमपूज्य बापूजी श्रद्धावानों द्वारा दी गई किसी भी प्रकार की गुरुदक्षिणा, भेंटवस्तु, ग्रिटिंग कार्ड, फल, हार, मिठाई, पैसे इत्यादि का स्वीकार नहीं करते।