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संकल्पना :

शहर की अपेक्षा गाँवों में हमें गरीबी, निरक्षरता अधिक प्रमाण में दिखाई देती है। इसका मुख्य कारण अर्थात घर के प्रत्येक जन जब काम करते हैं, तब कहीं जाकर उन्हें दो वक्त का ढंग का खाना नसीब होता है। और कभी-कभी तो इतना काम करने के बावाजूद भी एक समय का खाना नसीब नहीं होता है। ऐसी परिस्थिती में ढंग के कपड़े होना, ठंडी के दिनों में गर्म कपड़े होना तो बिलकुल भी असंभव है। इसके कारण उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। इन सब बातों का देश के विकास पर अवश्य परिणाम होता है। यह हुआ गाँव का चित्रण। किन्तु भारत के शहरों में परिस्थिती इसके बिलकुल विपरीत है। शहर के लोगों की परिस्थिती काफी हद तक अच्छी होती है। नौकरी और व्यवसाय के लिए अच्छे अवसर मिलते हैं। इसीलिए लोगों की आमदनी भी अच्छी होती है। इससे महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएँ तो पूर्ण होती ही हैं और साथ ही वे जो चाहे कर सकते हैं। अमीर लोगों के पास कपड़ों की कमी नहीं होती। पुराने कपड़े और कभी तो बिलकुल भी नहीं पहने हुए कपड़े भी उनके पास बहुत रहते हैं। ऐसे में, यदि यही कपड़े उन गरीबों को मिल जाए तो उनकी एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है।

इसी वजह से इस खाई को कम करने के लिए और कष्ट करने वाले गरोबों की मूल आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए   जुन ते सोनइस प्रकल्प की शुरुआत सद्‌गुरुजी श्रीअनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन ने सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापू के मार्गदर्शन में की। इस फाऊंडेशन के द्वारा मान्यता प्राप्त उपासना केन्द्रों पर, उसी प्रकार श्रीहरिगुरुग्राम (न्यू इंग्लिश स्कूल बांद्रा) में प्रत्येक गुरुवार को श्रद्धावान पुराने कपड़े जमा करते हैं। ये कपड़े देते समय श्रद्धावान कपड़ा स्वच्छ हो और फटा ना हो (वापरने योग्य हो) इसका ध्यान रखते हैं। अच्छे कपड़े ही प्रत्येक को मिले यह संस्कार बापू ने दिया है।

सेवा का व्यवस्थापन कार्यप्रणाली की पद्धति :

सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध उपासना केंद्रों पर कपड़े जमा होने पर श्रद्धावान उन कपड़ों का वयोगटानुसार वर्गीकरण करते हैं। छोटे बच्चों के कपड़े, मध्यम उम्र के स्त्री-पुरुषों के कपड़े, वृद्ध स्त्री-पुरुषों के कपड़े इस तरह से वे वर्गीकरण करते हैं। उसी प्रकार वयो गटानुसार भी वर्गीकरण किया जाता है। प्रत्येक केन्द्र के पास के श्रद्धावान अपने पास के गाँवों का सर्वेक्षण करते हैं। प्रत्येक कुटुंब, जरूरतमंद कुटुंब में कितने लोग रहते हैं, उसमें कितनी स्त्रियाँ, पुरुष और छोटे बच्चे हैं। उनकी उम्र क्या है? इन सभी बातों का सखोल अध्ययन किया जाता है। ये श्रद्धावान गाँवों में जाकर ये सर्वे करते हैं। सर्वे करके आने के बाद जमा किए गए कपड़े पूरे हैं या नहीं इसकी रूपरेखा बनाते हैं। यदि कपड़े पूरे नहीं होते तो केन्द्र में कपड़े जमा करने के लिए निवेदन किया जाता है। और जब आवश्यकतानुसार कपड़े पूरे हो जाते हैं तो फिर उन कपड़ों का वर्गीकरण किया जाता है। प्रत्येक कुटुंब के अनुसार कपड़ों की गठरी बाँधी जाती है। प्रत्येक कुटुंब के लिए बाँधी गई गठरी में उस घर के प्रत्येक सदस्य के लिए कपड़े होते हैं। उसके बाद प्रत्येक सप्ताह में हर कुटुंब को एक नंबर दिया जाता है, जिसके कारण नंबर के अनुसार कुटुंब को पहचाना जात है, या फिर उस गठरी पर कुटुंब का नाम लिखा जाता है। जिसके कारण वह गठरी किसे देनी है यह समझ में आता है। सारी गठरियों को एकत्रित बाँधकर टेम्पो या अन्य किसी गाड़ीयों में रखा जाता है, और उसे लेकर श्रद्धावान पुन: सर्वे किए गए उस गाँव में जाते हैं।

गाँव में जानेके बाद श्रद्धावान कार्यकर्ता प्रत्येक कुटुंब का नाम पुकारता है। उस कुटुंब का एक सदस्य उसके चेहरे पर आनेवाली खुशी और संतोष यह देखने लायक होता है। इतना कपड़े होने के बाद भी हम हमेशा अतृप्त ही रहते हैं और थोडे़ से कपड़े पाने पर भी उनकी तृप्ति देखकर हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। श्रद्धावान भी बड़े प्रेम से इन कपड़ों को बाँटते हैं। उसी प्रकार सिर्फ कपड़े ही नहीं तो श्रद्धावान पुराने बर्तन व खिलौने भी दे सकते हैं। गरीब परिवार को इन बर्तनों और बच्चों के खिलौनों की बहुत आवश्यकता होती है।

कोल्हापुर वैद्यकीय आरोग्य शिविर की सेवा :

सबसे बडे़ प्रमाण में यह सेवा कोल्हापुर वैद्यकीय व आरोग्य शिविर के अंतर्गत पेंडाखले गाँव में की जाती है। शिविर के काफी पहले कुछ श्रद्धावान लोग सिर्फ सर्वे करने के लिए वहाँ जाते हैं और प्रत्येक कुटुंब में कपड़े, बर्तन, खिलौनों की कितनी आवश्यकता है, उसका सर्वेक्षण करते हैं। फिर उन कुटुंब नुसार कपड़े, बर्तन, खिलौनों आदि की गठ्ठरी बनायी जाती है। फिर स्वयं परमपूज्य नंदाई के हाथों से इन गरजू लोगों को कपड़े, बर्तन, खिलौनों व आवश्यक वस्तुओं का वितरण किया जाता है। उस समय इस गाँव के लोगों के चेहरे पर होनेवाले आनंद का वर्णन नहीं किया जा सकता है।

अनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन के ‘जुनं ते सोनं’ इस परमपूज्य बापू की प्रेरणा से शुरु किए प्रकल्प के कारण अनेक कुटुंब को कपड़े और आवश्यक वस्तुओं का लाभ मिलता है। इसीप्रकार ये कुटुंब बापूजी की कृपाछत्र में सुख से रहने लगे।