मातृवात्सल्यविन्दानम् ग्रंथ क्या है?

मातृवात्सल्यविन्दानम्‌ अर्थात आदिमाता के तीनों स्तर के स्वरूप का आख्यान। गायत्रीमाता, महिषासुरमर्दिनी और अनसूयामाता के चरित्र। बापूजी कहते हैं कि, ‘‘यह एक ग्रंथ है, यह गुणसंकीर्तन भी है, यह ज्ञानगंगा है, यह भक्तिभागीरथी भी है और आदिमाता का आख्यान तो है ही, किन्तु इन सबके परे यह मेरे आदिमाता का शुभंकरा और अशुभनाशिनी स्वरूप है, उनका वात्सल्य है और वरदान भी है।’’

आदिमाता द्वारा दी गई आज्ञा के अनुसार श्रीपरशुरामजी ने श्रीगुरुदत्तात्रेयजी से श्रवण किया और स्वयं अनुभूत चण्डिका के आख्यान को नित्य स्मरण करते रहे और उन्होंने उन्हीं की (माता) आज्ञानुसार ऋषि सुमेधस, ऋषि हरितायन और मृकंड पुत्र मार्कण्डेय इन अपने तीन सत्‌ शिष्यों को इसका उपदेश दिया। इस आख्यान का कुछ पाठ मार्कण्डेय पुराण, कलिका पुराण और सप्तशती आख्यान में किया गया है।

मातृवात्सल्यविन्दानम्‌ ग्रंथ की रचना कैसे हुई?

भारत में गुरु-शिष्य परंपरा को अनन्य महत्त्व है। ये परंपरा भारत के नैतिक मूल्यों को दृढ़ करती है। ‘श्रीगुरु दत्तात्रेय’ और उनके शिष्य ‘श्रीपरशुराम’ ये एक आदर्श गुरु-शिष्य की जोड़ी है। श्रीगुरु दत्तात्रेयजी ने श्रीपरशुराम जी को आदिमाता के सारे अवतारों के बारे में ज्ञान दिया। इस गुरु-शिष्य के संवाद द्वारा ही आदिमाता के अवतार कार्य प्रकट हुए। और इसी संवाद को शब्दबद्ध किया गया है। सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापूजी के इसी शब्दबद्ध किए गए ग्रंथ को ‘मातृवात्सल्यविन्दानम्‌’ अर्थात ‘मातरैश्वर्यवेद:’ ऐसा कहा गया है। इस ग्रंथ में गुरु-शिष्य के संवाद द्वारा आदिमाता के गायत्री, महिषासुरमर्दिनी और अनसूया रूप का आख्यान हमारे सामने आता है। आदिमाता चण्डिका के रूप, कार्य, गुण इनकी जानकारी हमें इस ग्रंथ में मिलती है।

मातृवात्सल्यविन्दानम्‌ ग्रंथ की विशेषता :

इस ग्रंथ के तीन भाग हैं। इन तीनों भागों के अन्तर्गत १)आदिमाता गायत्री २)आदिमाता महिषासुरमर्दिनी और ३)आदिमाता अनसूया इनके चरित्र के बारे में बताया गया है। मूल चण्डिका के ये तीनों रूप एक दूसरे से अलग नहीं हैं। मनुष्य के स्थूल, सूक्ष्म व तरल इन तीनों स्तरों पर क्रमानुसार माता अनसूया, माता महिषासुरमर्दिनी और माता गायत्री कार्य करती हैं।

आई ती आई बहु मायाळू। लेकरालागी अतिकनवाळू। परि लेकरेच निघता टवाळू। कैसा सांभाळू करी ती॥

 

(माँ तो माँ ही होती है बहुत दयालु। अपने बच्चों के लिए वात्सलमयी। किंतु यदि बच्चे ही निकम्मे हो जाएँ। तो वह कैसे उन्हें सँभालेगी।)यह श्रीसाईनाथजी का प्रत्यक्ष उद्‌गार है अर्थात इस ग्रंथ की फलश्रुती। हमारा यह आलसपन छूटने के लिए और यह ‘मातृवात्सल्यविन्दानम्‌’ हमारे जीवन में प्रत्यक्ष प्रकट होने के लिए हमें इस ग्रंथ का पल्लू पकड़कर रखना ही होगा।

मातृवात्सल्यविन्दानम्‌ ग्रंथ कहाँ मिलेगा?

यह ग्रंथ श्रीहरिगुरुग्राम में, संस्था के विविध उपासना केन्द्रों में, संस्था के सर्व तीर्थक्षेत्रों में विक्री के लिए उपलब्ध है। उसी प्रकार यह ग्रंथ हम ऑनलाईन से ‘आंजनेय ई शॉप’ इस संस्था के वेबसाईट से भी खरीद सकते हैं