भगवान श्रीगुरुदत्तात्रयजी का जन्म मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन अरुणोदय के समय हुआ । यह पावन दिन देश भर में ‘दत्तजयंती उत्सव’ के रूप में मनाया जाता है । सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी के मार्गदर्शन के अनुसार, हर साल न्यू इंग्लिश स्कूल, बांद्रा (श्रीहरिगुरुग्राम) यहाँ पर ‘दत्तजयंती उत्सव’ का आयोजन किया जाता है ।

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ‘श्रीमद्पुरुषार्थ’ ग्रंथराज के ‘प्रेमप्रवास’ इस द्वितीय खण्ड में कहा है कि, ” ‘दत्तगुरु’, यह मेरा नित्य जप है । यह मेरा अखंड नामस्मरण है और यही मेरा सर्वस्व है ।” इसी तरह, सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी द्वारा रचित‘मातृवात्सल्यविन्दानम्’ इस ग्रन्थ के इकत्तीसवें अध्याय में, भगवान श्रीगुरुदत्तात्रेयजी की महिमा कुछ इस प्रकार से वर्णित की गई है :

आदिमाता चंडिका उवाच, “हे दत्तात्रेय ! तुम श्रद्धाहीनों का नाश करनेवाले बनकर, इस परमात्मा के सदैव सहायक बने रहो । क्योंकि तुम मेरे प्रथम स्पन्द के समय, ॐकार रूप में प्रकट हुए इस प्रणवरूप परमात्मा से भी पहले, स्पन्द शुरू होते ही, प्रकटा हुआ शुभ्र और शुद्ध दिव्य प्रकाश हो, और इसीकारण इस ॐकार के संरक्षक तुम्हीं हो ।

‘मातृवात्सल्यविन्दानम्’ ग्रन्थ में सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्धजी यह भी कहतें हैं कि, ‘कलियुग में मानवों के उद्धार हेतु सिद्ध हुई गुरुभक्ति अर्थात भगवान श्रीदत्तात्रयजी की भक्ति ही, श्रीदत्तमंगलचण्डिका माता का ह्रदय है ।’ इसी कारण, श्रीगुरभक्ति करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है ‘दत्तजयंती’ । हर श्रद्धावान को इस दिन आनंद एवं समाधान की प्राप्ति होती है । 

प्रतिवर्ष, श्रीहरिगुरुग्राम में मनाये जानेवाले दत्तजयंती उत्सव का स्वरुप :

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी के मार्गदर्शन के अनुसार, मनाए जानेवाले इस दत्तजयंती उत्सव में, श्रद्धावान स्तोत्रपठण, मंत्र और गजर (जल्लोष से नाचते हुए भक्तिमय होकर महिमागान करना) का आनंद उठाते हैं ।

भगवन दत्तगुरु को आवाहन करनेवाले निम्नलिखित प्रार्थनामंत्र का ५४ बार पठण होता है:

भोः दत्तगुरु । कृपया समागच्छ । सर्वरूपाणि दर्शय । मम ह्रदये प्रविश्य । मम सहस्त्रारे प्रतिष्ठ । ॐ नमो नमः ॥

दत्तजन्म हमारे ह्रदय में हो और सहस्त्रारचक्र में उसकी प्राणप्रतिष्ठा हो इस शुद्ध हेतु को मन में धारण करते हुए, श्रद्धावान इस प्रार्थनामंत्र का पाठ प्रेमपूर्वक करते हैं |

इसके पश्चात् श्रीवासुदेवानंदसरस्वतीजीकृत ‘घोरकष्टोद्धरण’ इस स्तोत्र का पठण होता है |

‘घोरकष्टोद्धरण’ स्तोत्र पठण के बाद रंगावधूत महाराज द्वारा रचित , ‘दत्तबावनी’ इस स्त्रोत्र का पठण होता है | इसके पश्चात श्रद्धावान ‘ॐ साईं श्री साईं जय जय साईंराम’ के गजर में तल्लीन हो जाते हैं ।

 

दत्तजयंती विशेष –

– दत्तजयंती के पवित्र दिन ही ‘श्रीवर्धमान व्रताधिराज’ की शुरूआत होती है । मार्गशीर्ष पूर्णिमा से पौष पूर्णिमा, इस एक मास के कालावधि में यह व्रत किया जाता है । ‘‘श्रीवर्धमान व्रताधिराज, अर्थात मानव का जन्म प्राप्त कर यह मानव जन्म व्यर्थ न जाने पाए इस बात की गवाही ! श्रीवर्धमान व्रताधिराज, अर्थात परमात्मा के नौ अंकुर ऐश्वर्य प्राप्त करने का महामार्ग । श्रीदत्तजयन्ती के पवित्र दिन आरम्भ होनेवाला यह व्रत आधुनिक नए साल के पहले दिन (अर्थात १ जनवरी) को अपने स्वयं के गर्भ में आत्मसात कर लेता है इससे हमें अपने-आप ही नए साल के शुभ स्पंदनोंका लाभ होता है और भगवान के आशीर्वाद प्राप्त होते हैं” ऐसे सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ‘श्रीमद्पुरुषार्थ ग्रंथराज – आनन्दसाधना’ इस तृतीय खंड में प्रतिपादित करते हैं ।

सन २००५ में, सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी (डॉ. अनिरुद्ध धैर्यधर जोशी) ने दत्तजयंती के पावन अवसर पर ‘प्रत्यक्ष’ यह अराजनीतिक समाचार पत्र शुरू किया । इस दैनिक में राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय गतविधियों के साथ ही तृतीय महायुद्ध से संबधित समाचारोंका  अन्वेषण किया जाता है ।

– सन १९९६ से २००४ तक, दत्तजयंती के पावन अवसर पर, ‘सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध विशेषांक’ प्रकाशित किया जाता था ।