AniruddhaFoundation-Shree Dattajayanti

मार्गशीर्ष पूर्णिमा का दिन अर्थात दत्तजयंती। समस्त श्रद्धावान भक्तों की नजर में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं पवित्र दिवस। इस दिन माता चण्डिका के प्रथम तरल पुत्र अर्थात दिगंबर दत्तात्रेय का स्थूल मानवी रूप में जन्म हुआ था। ये दिव्य, शुभ एवं शुभ प्रकाश अर्थात दिगंबर दत्तात्रेय माता अनसूया के गर्भ में प्रकट हुए एवं नौ महीना नौ दिन के पश्‍चात्‌ मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन अरुणोदय के वक्त दत्तात्रेय माता अनसूया की कोख से इस धरती पर अवतीर्ण हुए। दत्तजयंती का यह उत्सव श्रीअनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन की ओर से सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी के मार्गदर्शनानुसार बडे ही उत्साह के साथ मनाया जाता है।

मार्गशीर्ष का महत्व :

३ जनवरी २००८ के प्रवचन में सद्गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ‘मार्गशीर्ष महीने का महत्त्व बताया है। बापू के कहेनुसार शीर्ष अर्थात मस्तिष्क को मगज के, उसके मार्ग से, मस्तिष्क को उस जीव के मार्ग से जैसा चाहे उस गति से, जी चाहे उस दिशा में, जितना चाहे उतना ही दूर ले जाकर जरा सा भी थकाये बगैर, बगैर कष्ट पहुँचाये उसके प्रवास को सफल संपूर्ण करवा कर वापिस ले आनेवाला मार्ग अर्थात मार्गशीर्ष ।

आगे उन्होंने कहा, मार्गशीर्ष यह मस्तिष्क का मार्ग है। इस महीने में हर एक मनुष्य का मस्तिष्क सचमुच सहस्त्रमार्गो से, सहस्र बातों का स्वीकार करने के लिए सक्षम हो चुका होता है। परमात्मा कहते है‘‘ मासानां मार्गशीर्षोहम्‌’’ अर्थात वे परमात्मा स्वयंही मार्गशीर्ष महीना हैं। इस मार्गशीर्ष पूर्णिमा को ही श्रीदत्तात्रेय का जन्म हुआ। इसीलिए इस महीने में हर एक मनुष्य में होनेवाले सहस्त्रार चक्र  के सहस्त्रों द्वार को भगवानने अपने इस अकारण कारुण्य के कारण खोल दिए होते हैं। हमारे जीवन की निरर्थकता दूर हो जाये तथा जीवन का एक नया अर्थ प्राप्त हो; इसके लिए यह मार्गशीर्ष महीना एवं इस सहस्त्रार चक्र के मुक्त हो चुके सहस्त्र द्वारों का उपयोग हमें भली भाँति करते आना चाहिए।

दत्तजयंती का महत्त्व :

परमेश्‍वर पर श्रद्धा रखनेवाले सभी लोगों के लिए यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दिन होता है। इस दिन श्रीदत्तात्रेय का जन्म कैसे हुआ इसकी सविस्तारपूर्वक सत्य कथा बापू के द्वारा लिखे गए ‘‘मातृवात्सल्यविंदानम’’ नामक इस ग्रंथ के इकतालीसवे अध्याय में है।

इसी ग्रंथ के इकतीसवे अध्याय में कलियुग के प्रति जानकारी देते समय दत्तगुरु के बारे में भी उन्होंने जानकारी दी है।

दत्तजयंती उत्सव

सद्गुरु श्री अनिरुद्ध उपासना फाउंडेशन के लिए यह अत्यन्त पवित्र दिवस कहलाकर अत्यन्त पवित्र वातावरण में यह उत्सव मनाया जाता है। दत्तजयंती के संध्या समय श्रीहरीगुरुग्राम में उपासना होती है। इस उपासना में सर्वप्रथम दत्तगुरु का आवाहन करनेवाला ‘भो: दत्तगुरु कृपया समागच्छ। सर्व रुपाणी दर्शय। मम हृदये प्रविश्य। मम सहस्त्रारे प्रतिष्ठ। ‘ॐ नमो नम: ॥’’ यह जप चौपन बार किया जाता है। इस जप के साथ हर एक उपस्थित श्रद्धावान श्री दत्तात्रेय की मानो मानस पूजा ही करता है। दत्तजन्म हृदय में हो एवं सहस्त्रारचक्र में उनकी प्रतिष्ठापना हो यही शुद्ध हेतु मन में धारण करके हर एक व्यक्ति पठन करता है। इसके पश्‍चात्‌ श्री वासुदेवानंदसरस्वतीकृत ‘‘घोरकष्टोद्धरणस्तोत्र’’ एवं रंगावधूत महाराज द्वारा रचित ‘‘दत्तबावनी’’ का पठन किया जाता है।

इस पठन के पश्‍चात संपूर्ण वातावरण में चैतन्य फैल जाता है। श्रीगुरु भक्ति का सुगंध अणु-रेणु में फैल जाता है और फिर ‘‘ॐ साई श्री साई जय जय साई राम’’ इस घोष से (गजर) संपूर्ण वातावरण मंत्रमुग्ध हो उठता है।

दत्तजयंती एवं सुमुहुर्त:

इसी पवित्र दिन पवित्र ऐसे श्रीव्रताधिराज का आरंभ होता है। हमारे अंदर होनेवाले सत्वगुण, गुरु गुण इनका वर्धन करनेवाला यह व्रत सभी श्रद्धावान प्रेमपूर्वक करते है। श्रीवर्धमान व्रताधिराज अर्थात मानवजन्म प्राप्त करने के पश्‍चात्‌ मानवीजन्म व्यर्थ न होने पाए इस बात की गवाही ‘‘श्रीवर्धमान व्रताधिराज’’ अर्थात परमात्मा के नौ अंकुर ऐश्‍वर्यों की प्राप्ति करने का महामार्ग। यह व्रत आधुनिक नये वर्ष के प्रथम दिन को अपने स्वयं के उदर में समाविष्ट कर लेता है और अपने-आप ही नये वर्ष में इसके शुभ स्पंदनों का लाभ होता ही है। श्रीमद् पुरुषार्थ तृतीय खंड- आनंद साधना।

२००५ के दत्तजयंती का शुभमुहुर्त साध्यकर श्रीअनिरुद्धजी ने दैनिक प्रत्यक्ष नामक यह बिगर राजकीय दैनिक का आरंभ किया। जिसको अब दस वर्ष पूर्ण होकर राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय चढ़ाव उतारों का सूराख (निशाना) इसके अन्तर्गत अचूकरूप में ढूंढ निकाला जाता है। और हर साल दत्तजयंती के दिन “प्रत्यक्ष” का वर्धापन दिन होता है।