फागुन पूर्णिमा अर्थात होली पूर्णिमा। देशभर में यह त्योहार बडे उत्साह से मनाया जाता है. सूखी लकड़ी एवं गोबर को एकत्रित कर उसकी ‘होली’ बनाकर जलाई जाती है। उसके बाद होलीका माता की पूजा करके, ‘मेरे दुर्गुणों का परिमार्जन हो’ ऐसी प्रार्थना की जाती है। होली पूर्णिमा के दूसरे दिन देशभर में ‘धुलीवंदन’ मनाया जाता है। इसलिये इसे ‘रंगों का उत्सव’ भी कहा जाता है।

सारे देश में बड़े आनंद और उत्साह से मनाया जानेवाला यह होलीपर्व वांद्रा में स्थित साईनिवास में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह साईनिवास अर्थात्‌ साईबाबा पर अटल श्रद्धा और विश्वास रखनेवाले गोविंद रघुनाथ दाभोळकर अर्थात हेमाडपंतजी का निवास स्थान। इसी निवास स्थान मे हेमाडपंतजी ने श्रीसाईसच्चरित ग्रंथ लिखा। जो हर साईभक्त के जीवन के साथ बहुत करीब से जुड़ा है। यह साईसच्चरित साई बाबा के लीलाओं का और संकट में पड़े अपने भक्तों के रक्षण के लिये दौडकर जानेवाले साईनाथ का चरित्र तो है ही, उसी तरह साई बाबा पर श्रद्धा और विश्वास रखनेवाले, उनकी कृपा प्राप्त करने की इच्छा रखनेवाले नानाविध साई भक्तों का चरित्र भी है, यह सद्गुरू अनिरुद्धजी ने बहुत बार बताया है। यह महान ग्रंथ भी इसी साई निवास में लिखा गया है। इसी साईसच्चरित ग्रंथ के ४० वे अध्याय में साई निवास में होलीपूर्णिमा उत्सव कब और कैसे शुरू हुआ इसका स्पष्ट उल्लेख किया गया

श्री साई सच्चारीत मे लिखी गयी हेमाडपंतजी की कथा

सन १९१७ में, जब साईनाथ शिर्डी में प्रत्यक्ष रूप में देहधारी थे, होली पूर्णिमा के दिन सुबह सुबह हेमाडपंतजी को एक सपना आया सपने में प्रत्यक्ष साईबाबा एक संन्यासी के रूप में आये और हेमाडपंतजी को कहने लगे कि, ‘ आज मैं तुम्हारे घर भोजन करने आनेवाला हूँ’। इतना कहने के बाद हेमाडपंतजी का सपना टूट गया। किंतु जागृत अवस्था में भी उन्हें सपने में सुना हुआ हर एक शब्द याद था।

हेमाडपंतजी का बाबा के साथ सात सालों का घनिष्ठ संबंध था। बाबा के वचन पर उनका पुरा विश्वास था। बाबाने कहा है मतलब वह पक्का आयेंगे, किंबहुना भोजन के समय जो भी व्यक्ति आयेगा उसे मैं साई समान ही मानूंगा ऐसे उन्होने तय किया था। इसीलिये उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि एक और महमान भोजन पर आनेवाला है इसलिये थोड़ा खाना ज्यादा बनाने के लिये कहा।

हेमाडपंत चातक की तरह बाबा की राह देख रहे थे। दोपहर के भोजन का समय हुआ। सारी तय्यारियाँ हो गयी। पत्तल पर खाना भी परोसा गया। हेमाड पंतजी की नजर बाबा की राह देखते हुए दरवाजे की तरफ ही थी। तभी सीढ़ियों पर पैरों की आहट सुनाई दी। ‘अल्लीमहमद’ और ‘इस्मू मुजावर’ उपर आये। उनके हाथ में श्री साईकी तसबीर थी। साई की तसबीर देखते ही हेमाडपंतजी का शरीर रोमांचित हो उठा। साई बाबा की लीला देखकर वे सद्गदीत हो उठे। उसके बाद साई निवास में तसबीर स्वरूप साई बाबा के आगमन हे्तु हर साल होली उत्सव मनाया जाता है।

होली पूर्णीमा के पावन अवसर पर श्रद्धावान भक्तों के लिये श्री साई की उस तसबीर को वंदन करना बहुत ही महत्वपूर्ण होता है ऐसे सद्गुरू श्री अनिरुद्धजी ने कहा है।

सन १९९७ से सद्गुरू श्री अनिरुद्ध के मार्गदर्शन के अनुसार इस उत्सव के हेतु अनेक भक्तिमय उपक्रम साई निवासमे शुरू किये गए है।

  1. हर साल होली पूर्णिमा के दो दिन पहले श्रीसाईसत्‌चरित्र के पठण से उत्सव की शुरुआत होती है।
  2. पारायण समाप्ति के पश्चात्‌ दिक्षित, शामा, हेमाड, बायजाबाई, नाना, गणू, मेघा शाम। ह्यांची वाट पुसता पुसता मिळेल आम्हा साईराम॥ इस गजर के साथ पुरे साई निवास की परिक्रमा की जाती है।
  3. ॐ साई रामलिखा गया ध्वज हर साल होली पूर्णीमा के दिन बदल कर नये ध्वज की पूजा की जाती है।
  4. साईनाथ के मूल तसबीर की विधिवत पूजा की जाती है।
  5. होलीकामाताकी पूजा की जाती है। होली जलाने के बाद ॐ कृपासिंधू श्री साईनाथाय नमः यह जाप किया जाता है। होलीकामाता को ५ प्रकार का धान अर्पण किया जाता है और उसके बाद आरती की जाती है।
  6. उत्सव के दिन ॐ साई शिवायॐ साई कृष्णाय नमः इस जाप का अखंड पठण दाभोलकर परिवार के सभी सदस्य शुरू करते है और एक दूसरे को अबीर (बुक्का) लगाते है। उसके बाद दर्शन के लिये आये हुए सारे श्रद्धावान यह जाप करते करते एक दूसरे को अबीर (बुक्का) लगाते है। पुरे दिन यह जाप चलता रहता है। कई साल तक सद्गुरू श्री अनिरुद्ध खुद दाभोलकर सदस्यों को अबीर (बुक्का) लगाकर इस जाप की शुरुआत करते थे।
  7. साई निवास में सन १९९८ में होली पूर्णिमा के दिन तेल से भरा अखंड दीप प्रज्वलित किया गया और इसी दीप से निकले दिपशिखा के आगमन से श्री हरीगुरुग्राम में रामनवमी के उत्सव का प्रारंभ होता है और इसी दिपशिखा कि सहाय्यता से श्रीसाईराम सहस्त्रयाग को प्रज्वलित किया जाता है।
  8. साई निवास इमारत के पीछे एक तुलसी वृंदावन और चबूतरा तैय्यार किया गया है। वहाँ सारे श्रद्धावान सुदीप लगा सकते हैं।
  9. सारे श्रद्धावान प्रसाद हेतु पुरण पोली अर्पण करते हैं।

होली पूर्णिमा सन २०१७ शताब्दी महोत्सव

११ मार्च २०१७ के होली पूर्णिमा के दिन इस उत्सव का शताब्दी वर्ष था। इस शतक पूर्ति हेतू साई निवास में एक बहुत ही सुंदर कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।

अ) पूजा के दिन श्री अनिरुद्ध बापू के मार्गदर्शन मे सुबह ८ से रात्री १० बजे तक एक लाख आठ (१,००,००८) बार ॐ कृपासिंधू श्री साई नाथाय नमःका जाप किया गया।

) इस जाप के पठण के समय श्री अप्पासाहेब दाभोलकर और घर के सभी सदस्य उस मूल, पवित्र साई तसबीर पर तुलसीपत्र और बेलपत्र अर्पण कर रहे थे। सारे श्रद्धावानों को इस पठण में शामिल होने का अवसर मिला।

) श्रीसाईसच्चरित ग्रंथ के पठण(पारायण) की शुरुआत ९ मार्च २०१७ को हुई। पहले दिन श्रद्धावानों ने १ से २६ अध्याय का पठण किया। दूसरे दिन यानि १० मार्च २०१७ को २७ से ५२ अध्यायों का पठण हुआ। ११ मार्च को साईसच्चरित के आखरी यानि ५३ वे अध्याय का पठण  करके उत्सव की समाप्ति की गई।

) इस शताब्दी महोत्सव हेतु १२ फरवरी २०१७ को श्री पंचमुख हनुमन्तकवच का १०८ बार पठण किया गया।

परमेश्वर की तसबीर सिर्फ फोटो या प्रतिमा नहीं होती है, बल्कि साक्षात उनका अस्तित्व उस स्थान पर होता है। इसलिये इस पावन अवसर पर श्रद्धावानों ने के लिए तसबीर का दर्शन लेकर उसके सामने नतमस्तक होना श्रेयसकर होता है।

ऐसे माना जाता है कि जिस वास्तु को सद्गुरू के दो रूपों का अनुभव मिला है उस वास्तू में सद्गुरू नवरात्री मनाई जा सकती है। यह नवरात्री अश्विन मास के प्रतीपदा से शुरू होकर दशहरे तक मनाई जाती है। साई निवास में सद्गुरू नवरात्री श्री अनिरुद्ध बापू के मार्गदर्शन के अनुसार सन १९९७ से मनाई जा रही है।