Holi Pournima Utsav

होली पूर्णिमा का उत्सव एवं श्रीसाईनाथ :

श्रीसाईसच्चरित के चालीसवे अध्याय में कही गयी कथानुसार सन्‌ १९१७ साल की होली पूर्णिमा के दिन साईबाबा साईनिवास में तसबीर रूपमें खाना खाने (भोजन करने ) के लिये आये।

उसी होली पूर्णिमा के दिन से ही साईनिवास में प्रतिमा स्वरूप में साईनाथ के आगमन प्रित्यर्थ प्रतिवर्ष होली पूर्णिमा का उत्सव अत्यंत मंगलमय एवं पवित्र वातारण में मनाया जाता है। हेमाडपंत के परिवार में वंशानुगत यह उत्सव मनाया जाता है।

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साईनिवास में मनाया जानेवाला होलीपूर्णिमा का यह समारोह :

१. साईबाबा के काल मे बनी हुई यह मूर्ति १९९७ के होली पूर्णिमा के दिन यानि गुरुवार ८ मार्च १९१७ इस दिन इस मूर्ति के रुप में बाबा का साईनिवास में किस तरह आगमन हुआ यह कथा हेमाडपंतजी ने स्वयं श्री साईचरित्र के ४० वे अध्याय में बतायी है।

२. पहिले ये मूर्ति होलीपूर्णिमा के दिन ही रखी जाती थी। लेकिन मीनावैनी की प्रेमळ इच्छा की खातिर वह कायम स्वरूप में दर्शन के लिये रखी गयी। इस मूर्ति के सामने बैठकर ध्यान एवं जाप करने के लिये दाभोलकर परिवार के हस्ते इस मूर्ति की बड़ी प्रतिकृति सन १९९७ में श्री अनिरुद्ध बापूजीने स्थापन की।

३. दि. २८ मंई १९९६ के दिन श्री आप्पासाहेब दाभोलकर ( हेमाडपंतजी के पौत्र) एवं सौ. मीनावैनी दाभोलकर इन्हें श्रीसाईनाथ जी के दर्शन हुए।

श्रीअनिरुद्ध बापू ने इस उत्सव के निमित्त से अनेक भक्तिमय उपक्रम साईनिवास में आरंभ किये हैं।

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१) प्रतिवर्ष होलीपूर्णिमा के दो दिन पहले साईसच्चरित का पारायण करके इस उत्सव की शुरुआत होती है।

२) पारायण समाप्ति पश्चात्‌ साईनिवास के अहाते में चहुँओर दिंडी घुमायी जाती है उस वक्त लगातार गजर किया जाता है। वह इस प्रकार है –

‘दिक्षित, शामा, हेमाड, बायजाबाई, नाना, गणू, मेघश्याम । इनकी राह पुछते -पुछते मिलेंगे हमें साईराम।

३) साईनिवास के ऊपर ‘ॐ साईराम’ लिखा हुआ ध्वज होता है। प्रतिवर्ष होली पूर्णिमा के दिन उसे बदलकर नवीन ध्वज की पूजा की जाती है।

४) साईनाथ की इस मूल तस्वीर की पवित्र विधि करके उसकी पूजा की जाती है।

५) होलिका माता की भी पूजा की जाती है। होली जलायी जाने के पश्चात्‌ ‘ॐ कृपासिंधु श्रीसाईनाथाय नम:।’ इस जप का पठन किया जाता है। होलिका माता को पाँच प्रकार के धान्य अर्पण किए जाते हैं। तत्‌पश्चात्‌ आरती की जाती है।

६) इसके पश्चात् एक सुंदर भक्तिमय उपक्रम अर्थात्‌ अबीर लगाना। बापूमार्फत अबीर लगाने की शुरुआत होती है। सर्वप्रथम दाभोलकर परिवार और इसके पश्चात्‌ दर्शन के लिए आनेवाले सभी श्रद्धावान एक दूसरे के माथे पर अबीर लगाते हैं।

७) इस कार्यक्रम के दौरान ‘ॐ साई शिवाय साई रामाय साई कृष्णाय नम:।’ नामक अखंड जप का पठन आरंभ होता है जो संपूर्ण दिन चलता रहता है।

८) इस दिन पूर्ण दिवस अखंड दीप प्रज्ज्वलित किया गया रहता है।

९) साईनिवास इमारत के अहाते में पिछली ओर तुलसी वृंदावन एवं चबूतरा बनाया गया है। वहाँ पर सभी श्रद्धावान सुदीप लगाते हैं। दर्शन के लिये आनेवाले श्रद्धावान पूरणपोली का नैवेद्य अर्पण करते हैं एवं दर्शन के लिए आनेवाले सभी श्रद्धावानों को पूरणपोली का प्रसाद दिया जाता है तथा यह पूरणपोली बड़ीमात्रा में गरीबों एवं जरूरतमंदो में बाँटी जाती हैं।

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होलीपूर्णिमा २०१७ शताब्दी महोत्सव :

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ग्यारह मार्च २०१७ के दिन होलीपूर्णिमा उत्सव को १०० वर्ष पूर्ण होने के निमित्त से साईनिवास में एक सुंदर कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। उस कार्यक्रम की रूपरेखा इस प्रकार थी –

१) इस पूजा के दिन सद्‌गुरु बापू के मार्गदर्शन के अन्तर्गत सुबह ८ बजे से रात्रि के ९ बजे तक ‘ॐ कृपासिंधु श्रीसाईनाथाय नम:।’ जप का पठन एक लाख आठ हजार (१,००,००८) बार किया गया।

२) इस जप के पठन के दौरान श्रीआप्पासाहेब दाभोलकर एवं उनके परिवार के सदस्य उस मूल पवित्र साई तस्वीर पर तुलसीपत्र एवं बेलपत्र अर्पण कर रहे थे। सभी श्रद्धावानों को इस पठन में सहभागी होने का सुअवसर प्राप्त हुआ था।

३) इस उत्सव के दौरान श्रीसाईसच्चरित ग्रंथ के पारायण की शुरुआत ९ मार्च २०१७ के दिन हुई। उस दिन (पहले दिन) १ से २६ अध्याय का पठन श्रद्धावानों ने किया। दूसरे दिन अर्थात १० मार्च २०१७ के दिन २७ से ५२ अध्याय तक का पठन किया गया। ११ मार्च के दिन श्रीसाईसच्चरित के अंतिम अध्याय अर्थात ५३ वे अध्याय का पठण पूर्ण करके इस ग्रंथ का पारायण पूर्ण हुआ।

४) इस शताब्दी महोत्सव के निमित्त से १२ फरवरी के दिन ‘श्री पंचमुखहनुमंतकवच’ का पठन १०८ बार आयोजित किया गया था।

ऐसा यह होली पूर्णिमा का पवित्र दिन अर्थात जिस दिन श्रीसाईनाथ तस्वीर के रूप में साईनिवास में आए और वे वहीं पर हमेशा के लिए बस गए। ऐसा है यह अद्‌भुत दिवस!