संपूर्ण विश्व पंचतत्वों से बना है। अपने हाथ की पाँच उंगलीयाँ, विश्व के इन पाँच तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं। अग्नितत्व का प्रतिनिधित्व अंगूठा, वायुतत्व का प्रतिनिधित्व तर्जनी, आकाशतत्व का प्रतिनिधित्व मध्यमा, पृथ्वीतत्व का प्रतिनिधित्व अनामिका और जलतत्व का प्रतिनिधित्व कनिष्ठा करती है। जैसे विश्व में यह पंचतत्व हैं, वैसे ही मानव के शरीर में भी पंचतत्व हैं और योगमुद्राओं के आधार पर, इनका उचित नियमन किया जा सकता है ।

रोजमर्रा के जीवन में हम इन मुद्राओं का उपयोग करते रहते हैं। हम, ‘बहुत सुंदर है!’ ’बहुत अच्छा है!’ यह कहते हुए सहजता से मुद्रा करते हैं। मन की भावनाएं विशिष्ट आकृतिबंधों द्वारा हाथों से व्यक्त करते हैं। हम भारतीय लोग खाना खाते समय अपने हाथ की पाँचों उँगलियाँ जोड़ते हैं। यह भी एक मुद्रा ही है। हाथ से खाना खाने के कारण, भारतियों की उँगलियाँ आसानी से मुड सकती हैं। इसकी वजह से पंचतत्वों का प्रवाह एकत्रित होता है। भोग अर्पण करते हुए, संध्या करते हुए, प्राणायाम करते हुए, तीर्थ लेते हुए, आचमन करते हुए उँगलियों के जो विशिष्ट कार्यकलाप होते हैं वे भी मुद्राएं ही है। हम दोनों हाथ जोडकर नमस्ते करते हैं, यह भी एक श्रेष्ठ मुद्रा है। हमारे शरीर में हजारों नाड़ियाँ होती हैं, जो उँगलियों के अग्र तक आती हैं, उनका संबंध सप्तचक्रों से होता है। हस्तमुद्राएं करने से, हम इस ऊर्जा को शरीर में क्रियाशील कर सकते हैं। यह हस्तमुद्राएं एक निश्चित क्रम से करनी होती हैं। इसके द्वारा मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक उर्जाप्रवाह संतुलित रूप से प्रवाहित होने की प्रक्रिया में मदद होती है।

सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापूजी ने मुद्राओं से संबंधित जो जानकारी दी थी उसका सारांश इस प्रकार है – ‘शरीर में बीमारी की उत्पत्ति पंचतत्वों में निर्माण हुए असंतुलन के कारण होती है। चूंकि हमारे हाथों की उँगलियाँ इन पंचतत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं इसलिए इन पाँच उँगलियों की सहायता से विभिन्न मुद्राएं बनती हैं, इससे शरीर में संतुलन बनता है। अत: यह मुद्राएं हमारे शरीर और मन की तंदुरुस्ती की प्रक्रिया में सहायक भूमिका निभाती हैं।’

‘श्रीश्वासम’, उत्सव से पहले बापूजी ने निम्नलिखित सात मुद्राओं की पहचान कराई थी।

सप्त मुद्रा – मुद्राएं कई तरह की हैं, परंतु बापूजी ने सप्तचक्रों से सम्बंधित सात मुद्राएं ही मुद्रा प्रशिक्षण में शामिल कीं।

वे निम्नानुसार हैं –

१. मूलाधार चक्र से संबंधित स्वस्तिमुद्रा
२. स्वाधिष्ठान चक्र से संबंधित रसमुद्रा
३. मणिपुर चक्र से संबंधित त्रिविक्रम मुद्रा
४. अनाहत चक्र से संबंधित शिवलिंग मुद्रा
५. विशुद्ध चक्र से संबंधित आंजनेय मुद्रा
६. आज्ञा चक्र से संबंधित अंबा मुद्रा
७. सहस्रार चक्र से संबंधित अवधूत मुद्रा

मुद्रा प्रशिक्षण – बापूजी की आज्ञानुसार, महाधर्मवर्मन डॉ. योगिंद्रसिंह जोशी और महाधर्मवर्मन डॉ. विशाखावीरा जोशी ने इस प्रशिक्षण का बीडा उठाया और दो दिवसीय नि:शुल्क प्रशिक्षण कार्यशाला संपन्न हुई। इस प्रशिक्षण के अगले चरण के बारे में योजना बनाकर पहले प्रशिक्षक बनाए गए, तत्पश्चात सद्गुरु श्री अनिरुद्ध उपासना फाउंडेशन के केंद्रों पर यह प्रशिक्षण नि:शुल्क दिया गया। जो कोई यह प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहता है, उसे अपने निकटतम उपासना केंद्र से संपर्क करना होता है। श्रीहरिगुरुग्राम (न्यू इंग्लिश स्कूल, बांद्रा) में भी दो गुरुवार को मुद्रा प्रशिक्षण दिया गया, और हजारों श्रद्धावनों ने इस प्रशिक्षण का लाभ उठाया।