विठ्ठल भक्ति की चंद्रभागा (नदी) केवल महाराष्ट्र में ही नहीं बहती, अपितु देश-विदेश में भी विठ्ठल भक्ति का नाद गुंजता है। सिर्फ विठ्ठल नाम का उच्चार होते ही उनके अर्थात विठ्ठल के प्रेम के वशीभूत हुए इन वारकरियों (यात्रियों) का अंग-अंग रोमांचित हो जाता है और एक अलग ही उत्साह का संचार होने लगता है। विठ्ठल-विठ्ठल …., ग्यानबा तुकाराम… इस प्रकार भजन गाते हुए विठ्ठल से मिलने की चाह में तपती राह (मार्ग) पर नाचते-गाते हुए हर वर्ष आषाढ़-कार्तिक एकादशी पर जानेवाले वारकरी अर्थात श्रद्धालुयात्रीगण विठ्ठल नाम की चंद्रभागा को दूर-दूर तक पहुँचाते आए हैं। ‘जब नहीं थी गंगा-गोदा, थी तब भी चंद्रभागा’, ‘पहले रची पंढरी, फिर वैकुंठ नगरी’, इस प्रकार संत-पथिक बड़े ही आत्मविश्वास से बताते हैं। पंढ़रीनाथ, विठ्ठल, विठू, पांडुरंग ऐसे असंख्य नामों से जिस लाडले देवता को श्रद्धावान पुकारते हैं ऐसे इस विठ्ठल भगवान का निवास स्थल श्रीक्षेत्र पंढरपुर की भावयात्रा का अयोजन सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध (बापू) ने साल २००१ में किया था।

      शिर्डी, अक्कलकोट, आलंदी और मंगेश शांतादुर्गा-गोवा इन चार रसयात्राओं के पश्चात सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध ने इस भावयात्रा की घोषणा की। इस घोषणा के होते ही उपस्थित श्रद्धावानों के मन में उत्साह का संचार होने लगा। कब ये भावयात्रा शुरु होगी ऐसी उत्सुकता हर एक के मन में थी। ‘भक्ति’ सोलह ऐश्वर्य में से एक मानी जाती है, जो हमें पंढरपुर में विठ्ठल भगवान के सहवास से मिलती है। संतों को पंढरपुर अपना ‘मायका’ अर्थात ‘माँ का घर’ प्रतित होता है। ‘चंद्रभागा’ बहन और ‘पुंडलिक’ को भाई के समान वे मानते हैं। यह सोलहवां ऐश्वर्य एवं ‘मायका’ प्राप्त करने हेतु भक्तगण के कदम पंढ़री की ओर चलने लगते हैं। ऐसा श्री अनिरुद्ध बापू ने पंढ़रपुर की भावयात्रा की विशेषता बतलाते हुए कहा था। परमेश्वर व भक्त के बीच ‘भक्ति’ ही एजंट है अन्य कोई नहीं। अत्यंत प्रेमपूर्वक अपने जीवन का सोना करने के लिए सांवले विठ्ठल परब्रम्ह के नाम में खो जाने के लिए तथा आनंद का कभी ना खतम होनेवाला खजा़ना अपने साथ लाने के लिए भावयात्रा आवश्यक प्रतित होती है, इस प्रकार बापू ने भावयात्रा का महत्व बतलाया। यह भावयात्रा ५ मई २००१ से ८ मई २००१ तक ४ दिनों तक चलती रही।

पंढ़रपुर भावयात्रा पहला दिन:-

 दिनांक ५ मई २००१ के दिन संध्या के समय तक सभी श्रद्धावान पंढ़रपुर के पवित्र स्थान श्रीक्षेत्र में पहुँच गए। रात १० बजे बापू का आगमन हुआ तब सद्‍गुरु को देखते ही सभी का हृदय आनंदित हो उठा। सभी ने भोजन के उपरांत सद्‍गुरु के साथ ‘संतज्ञानेश्वर’ नामक फिल्म देखी। पांडुरंग के प्रति रहनेवाले अनन्यभाव से भरे हुए अत्याधिक सुंदर फिल्म को देखकर सभी का अंत:करण भक्तिभाव से ओतप्रोत हो गया और इस प्रकार संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्वर माऊली की चरण वंदना कर भावयात्रा की दमदार शुरुवात हुई।

दूसरा दिन (६ मई) :-

      सभी श्रद्धावान सुबह उत्सवस्थल के मंडप में उपस्थित हुए। सर्वप्रथम सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्ध के मार्गदर्शन का लाभ श्रद्धावानों को प्राप्त हुआ। ‘पूर्ण अंधकार व पूर्ण प्रकाश इन दोनों पर समानरूप से नियंत्रण करनेवाले महाविष्णु ही पांडुरंग है, क्योंकि शुभ्र वर्ण (गौरवर्ण) अर्थात्‌ पांडुरंग, किन्तु ‘सावला, काला भी है और गोरा भी है। ऐसे इस पांडुरंग के प्रति ‘वे मेरे हैं और मुझे उनका होना है’ यही भावना होनी चाहिये।’ उस समय बापू ने बताया था। बापू द्वारा किए गए मार्गदर्शनानुसार विठ्ठल के प्रेमभाव में रंगने का निर्धार हर एक ने किया। इसके पश्चात गीली मिट्टी एवं अर्चनद्रव्य सभी श्रद्धावानों को दिए गये। सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्ध ने ‘हरि ॐ’ कहकर शुरुआत करने को कहा तब से लेकर पुन: उनके ‘हरि ॐ’ कहने तक अर्थात्‌ दो हरि ॐ के बीच की अवधि में श्रद्धावानों को उस मिट्टी से शंख, चक्र, गदा और पद्‌म ये महाविष्णु के आयुध (अस्त्र-शस्त्र) तैयार करने थे। सभी ने अपने मुख से मन:पूर्वक ‘श्री हरि विठ्ठल जय हरि विठ्ठल’ का भजन करते हुए इन आयुधों को बनाया। तत्पश्चात पांडुरंग गायत्री मंत्र का १०८ बार जप शुरु होते ही अर्चनद्रव्य को श्रद्धावानों ने उन आयुधों पर अर्पण किया।

पांडुरंग गायत्री मंत्र:

ॐ पद्‍मनाभाय विदमहे। पांडुरंगाय धीमहि। तन्नो हरि: प्रचोदयात्‌॥     

 इसके पश्चात इन आयुधों पर तुलसीपत्र अर्पण किए गये। उस समय परमपूज्य बापू ने श्रद्धावानों से जो प्रार्थना बोलने के लिए कहा था, वह इस प्रकार है – ‘हे ईश्वर, मेरे जीवन में अपने इन आयुधों में से कोई भी एक आयुध को क्रियाशील कर दें ताकि मेरे प्रारब्ध का नाश हो सके। महाविष्णु के आयुधों का अनोखा पूजन बापूजी ने श्रद्धावानों से करवाया इसके पश्चात सायंकाल में ‘श्री पंढरीनाथ पद्‍मराग रथयात्रा की शुरुआत हुई। वैसे तो यह रथयात्रा दोपहर में शुरु होनी थी किन्तु श्रद्धावानों के पैर मई महीने की तेज धूप में जलने ना पायें इस कारण से बापू को श्रद्धावानों पर तरस आ गया और उन्होंने इस यात्रा की शुरुआत संध्या के समय करने का निर्णय लिया। रथ खीचंते हुए मुझे ऐसा महसूस करना चाहिए कि मैं परमेश्वर का वाहन हूँ, उसी के साथ मैं उनके चरणों का ‘पादत्रण’ अर्थात चप्पल या जूता हूँ, यह भावना हमेशा मन में रहे क्योंकि एक बार यदि उन्होंने पादत्रण पहन लिए तो भार भी वे ही उठाएगें। इस बात को सदैव ध्यान में रखने के लिए बापू ने मार्गदर्शन किया।

      इस रथयात्रा में २ टन (२००० किलो) वजन का रथ और इस पर विराजमान थी भव्य-दिव्य विठ्ठल मूर्ती जिसे देखकर सभी की इच्छा तृप्त हो रही थी। रथ के माथे पर हनुमानजी की प्रतिमा और ‘श्री पंढरीनाथ पद्‍मराग रथयात्रा’ ऐसा तख्ता लगा हुआ था। रथयात्रा का मनोहारी दृश्य श्रद्धावान उत्साह के साथ निहार रहे थे। इतने बड़े व वजनदार रथ को बड़ी व मोटी रस्सी से बांधा गया था और सभी श्रद्धावान विठ्ठल का भजन करते हुए श्रद्धा, उत्साह व आनंद से ओतप्रोत होकर रथ को रस्सी की सहायता से आगे खींचते जा रहे थे। श्रद्धावान भक्तों द्वारा सुबह बनाए गए महाविष्णु के मृत्तिका के आयुधों को इस रथ में विराजित विठ्ठल भगवान की मूर्ती के चरणों में अर्पण किया गया।

      माथे पर केशरी रंग का फेटा परिधान किए, हाथों में केशरी झंडा लिए ‘जय जय रामकृष्ण हरि’, मेरा विठू, मेरा विठू, मेरा विठू, विठू विठू’, ‘आया रे आया मेरा सांवला विठ्ठल आया’ ऐसे बहारदार गीतों व भजनों के ठेके पर नाचने वाले हजारों श्रद्धावानों से मानो पुरा आसमान ही गूंज उठा था। नंदामाता, सुचितदादा के साथ स्वयं सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्ध रथयात्रा के मार्ग पर सबके साथ चल रहे थे जिस कारण रथ खींचने वाले श्रद्धावानों का उत्साह द्विगुणित हो रहा था। स्त्रीभक्त भी नऊवारी साड़ी (महाराष्ट्रीय पेहराव), नथ वगैरे पहनकर पारंपारिक वेश-भूषा में गीत एवं भजन के ताल पर, ढोल-ताशों की ताल पर नाचते- झूमते हुए  रथ को खींच रहे थे। ऐसे इस विठु माऊली के रथ को खींचते हुए हर एक श्रद्धावान अपने-आप को  धन्य-धन्य महसूस कर रहा था और इस बात से आनंदित था कि उसका जीवन सार्थक हुआ। रात में ‘संत तुकाराम’ नामक फिल्म सभी श्रद्धावानों ने बापू के साथ बैठकर देखी। इस भावयात्रा के केन्द्रस्थान थे श्री विठ्ठल और इस विठ्ठल के बारे में एकविध भाव दृढ़ करने वाले ‘संत तुकाराम’ श्रद्धावानों को ज्ञात हो इस हेतु से श्रीअनिरुद्ध ने इस फिल्म का लाभ श्रद्धावानों को प्राप्त करवाया।

तीसरा दिन (७ मई)

    रसयात्रा के तीसरे दिन सुबह श्रद्धावानों ने श्री विठ्ठल के दर्शन किए तब सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्ध ने श्रद्धावानों से विशेष रूप से जोर देकर कहा कि ‘हमें सिर्फ तुम ही चाहिए, अन्य कुछ भी नहीं, लेकिन अपनी भक्ति अवश्य दें! यह भाव मन में रखकर श्री विठ्ठल माऊली के दर्शन करो।’ सभी श्रद्धावानों ने पहले संतनामदेव महाराज के पायदान के दर्शन लिए और इसके बाद चोखोबा महाराज की समाधि के दर्शन किए। इसके पश्चात तरट वृक्षरूपी कान्होपात्रा माऊली को मनोभाव से प्रणाम किया तत्पश्चात विठ्ठल के चरणों में माथा टिकाया। इससे पूर्व बापू ने सभी श्रद्धावानों को इन तीन महान संतों की कथा सुनाई थी।

कालिया मर्दन – मन में रहनेवाले अंहकार रूपी विषैले कालिया, मन के बुरे विचार पापों और दुष्कृत्यों का प्रतिकात्मक मर्दन करने के लिए श्रद्धावानों ने चिकनी मिट्टी (शाडूमाती) से एक प्रतिकात्मक ‘कालियानाग’ तैयार किया। हर कोई ‘मेरे पापों एवं अंहकार का नाश हो’ ऐसी प्रार्थना श्रीकृष्णरूपी विठ्ठल के चरणों में मनोमन करते हुए, मुख से जप और विशेष नामस्मरण करते-करते कालिया नाग तैयार कर रहा था और स्वयं इस नामजप की पवित्रता से उस प्रतिकात्मक कालिया का मर्दन हर एक ने किया। कालिया मर्दन से आनंदित श्रद्धावानों ने भगवान के नामजप व भजन में उत्स्फूर्तरूप से नृत्य करके आनंद प्रदर्शित किया।

दहीकाला – यह शब्द सुनते ही आँखों के सामने उत्साह और ऊर्जा से भरा उत्सव याद आने लगता है। यहाँ तो प्रत्यक्ष पंढ़री में दहीकाला होनेवाला था। ‘गोविंदा रे गोपाला’, ‘बोलो बजरंग बली की जय’ का जयघोष करते हुए, चैतन्य से भरे वातावरण में एक के ऊपर एक ऐसे तीन तह (थर) बनाकर दहीहंड़ी फोड़ी गयी। इस उपक्रम द्वरा श्रद्धावानों में अपनापन, सहकार्य, बंधुभाव इन गुणों के दर्शन तो हुए ही साथ ही सामूहिक उपासना का महत्व भी उन्हें समझ में आया।

चौथा दिन (८ मई)

      रसयात्रा के चौथे दिन सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्ध की उपस्थिती में पहले हरिपाठ हुआ। इस दिन वैसाख/ वैशाख पूर्णिमा थी। सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्धजी ने वैशाख पूर्णिमा का महत्व व उस दिन की उपासना की जानकारी दी जिससे हर एक श्रद्धावान का भाव उपासना करते समय वृद्धिगत हुआ। सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्धजी के मार्गदर्शनानुसार श्रद्धावानों ने वैशाख पूर्णिमा की सांघिक उपासना की। इस उपासना का क्रम इस प्रकार से था-

१) गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:। गुरु:साक्षात्‌ परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:॥ (१ बार)

२) सद्‍गुरु तारक मंत्र ( ॐ मन:सामर्थ्यदाता श्री अनिरुद्धाय नम:।) (१०८ बार)

३) श्रीहनुमानचलिसा ( ११ बार)

      इसके पश्चात ‘वैशाख पूर्णिमा का सर्वश्रेष्ठ प्रसाद’ माना जानेवाला कैरी का पन्ना एवं आंबेडाल (चनादाल+कैरी) तीर्थप्रसाद का सेवन किया।

      चंद्रभागा नदी के तटपर जाने से पूर्व संध्या समय ठीक ५ बजे सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्ध ने श्रद्धावानों से बातचीत की। नदीतट पर छोटा, आकर्षक मंडप के सामने व्यासपीठ पर भगवान श्रीकृष्ण का मोहक चित्र सभी का ध्यान आकर्षित कर रहा था। लाऊडस्पीकर की भी व्यवस्था की गयी थी। स्त्री व पुरूष श्रद्धावानों के लिए दांडिया/गरबा खेलने की अलग-अलग व्यवस्था की गई थी। श्रीअनिरुद्ध व नंदामाता स्वयं तथा सुचित दाऊ भी स्टेज पर उपस्थित हुए और ‘खेळमांडियेला वाळवंटी घाई, नाचती वैष्णव भाई रे’ इस भजन से शुरुआत करके सभी ने दांडिया खेलने का आनंद चन्द्रभागा के रेतीले तट पर उठाया । भक्तों के पिछे युगों से दौड़ते हुए भी, दुष्टों का संहार युगों से करते हुए भी यह खेल खिलानेवाला खेली श्रीकृष्ण जरा सा भी थकता नहीं। इस संबंध में एक आख्यायिका श्रीअनिरुद्ध ने श्रद्धावानों को सुनाई एवं दांडिया खेलते हुए भी मैं श्रीकृष्ण का गोप हूं यह भाव मन में रखते हुए खेलना चाहिए, ऐसा हमें बताया। श्रद्धावान पवित्रता, प्रेम, श्रद्धा, भक्ति व आनंद से भरे अंतकरण से उत्साह के साथ दांडियारास खेले व जीवनभर के लिए इस आनंद के पल की धरोहर को मन की गठरी में बांध लिया।

      आखरी दिन निकलने से पूर्व भावयात्रा के इस आनंदपर्व को याद कर पंढरपुर से पुन: वापस जाने के भाव से श्रद्धावानों का दिल भर आया। पंढ़रपुर को संतों का मायका कहा जाता है। विठ्ठल की पंढ़री की यह भावयात्रा समाप्त हो चुकी है इस भावना को कोई स्विकार नहीं कर पा रहा था। अंत में, ‘हे ईश्वर! तुम मेरे  हो और मुझे तुम्हारा होना है’ इस भाव से जीवन जीओ। इससे तुम्हारा हर पल आनंदायी होगा, प्रेम से भरा होगा, ऐसा बापूने पंढ़रपुर से निकलने से पहले कहा था। प्रेमल और आत्मीयता से भरे इन शब्दों को हृदय में  संजोकर हर कोई जड़ अंत:करण से आनंद की, भाव की प्रचंड राशी स्वयं के साथ लेकर वापसी के लिए निकल पड़ा।