पंढरपुर भावयात्रा

5 मई 2001 की शाम को श्रद्धावान पवित्र श्रीक्षेत्र पंढरपुर जा पहुंचे और मानो प्रत्येक श्रद्धावान “बोला विठ्ठल विठ्ठल गजरी, अवघी दुमदुमली पंढरी” इस अभंग के बोल का अनुभव कर रहा था। सद्‌गुरु श्रीअनिरुध्द बापू, नंदाई एवं सुचितदादा के आगमन से सभी श्रद्धावानों की खुशी दुगुनी हो गई। तत्पश्चात सबने मिलकर “संत ज्ञानेश्वर” फिल्म देखी तो सभी का रोमरोम भक्तिभाव से खिल उठा।

दूसरा दिन – 6 मई 2001

श्रीअनिरुद्ध बापूजी ने बहुत ही अच्छा मार्गदर्शन किया, “घने काले रंग के होते हुए भी श्रीविठ्ठल का “पांडुरंग” कहलाना उनकी पहली बदमाशी है। संत उन्हें एकसाथ “ओ सांवले पांडुरंग” कहते हैं, कितना विरोधाभास है! वे एक ही समय पर काले भी हैं और गोरे भी हैं और यही वह तत्त्व है, ‘आकर्षण और विकर्षण’, ‘स्थिति और गति’, ‘पूर्ण अंधकार और पूर्ण प्रकाश’ इन दोनों पर समानता से नियंत्रण रखनेवाले ये महाविष्णु जो हैं यही उनका पंढरपुर श्रीक्षेत्र भी है। इस क्षेत्र की महत्ता केवल श्रीविठ्ठल की वजह से ही नहीं है बल्कि उनसे भी अधिक इस श्रीविठ्ठल पर प्रेम करनेवाले उनके भक्तों की वजह से है। केवल “एक वे (श्रीविठ्ठल) और एक मैं” यही रिश्ता मजबूत बने, अन्य कुछ भी नहीं चाहिए।

श्रीक्षेत्र पंढरपुर भावयात्रा उपासना

सबको चिकनी मिट्टी दी गई जिससे प्रत्येक को सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध द्वारा “हरि ॐ” कहकर शुरुआत कराने से दुबारा “हरि ॐ” बोलने तक, प्रेम से “श्रीहरि विठ्ठल जय हरि विठ्ठल” गाते हुए, प्रेम से शंख, चक्र, गदा और पद्म ये महाविष्णुज के आयुध यथा संभव बनाए गए। इसके बाद श्रद्धावानों ने उन आयुधों पर पांडुरंग गायत्री मंत्र के 108 बार जप के जारी रहते अर्चन द्रव्य अर्पण किया। वह मंत्र था –

“ॐ पद्मनाभाय विद्महे । पांडुरंगाय धीमही । तन्नो हरि: प्रचोदयात् ॥”

इसके बाद उन आयुधों पर तुलसीपत्र अर्पण किए गए। तब बापूजी ने श्रद्धावानों से कहा कि श्रीपांडुरंग से प्रार्थना करो कि, “हे भगवंत, इनमें से कोई भी एक आयुध मेरे जीवन में आए और मेरे बुरे प्रारब्ध का नाश करे।”  

इसके पश्चात श्रीअनिरुद्ध ने शाम को होनेवाली श्री पंढरीनाथ की पद्मराग रथयात्रा की योजना सबको समझाई। 2 टन के रथ में बिराजमान श्रीविठ्ठल की विशाल मूर्ति मानो इस सारे भक्तिमय वातावरण को निहार रही थी। रथ के माथे पर भक्तशिरोमणि हनुमानजी की छबी शान से बिराजमान थी और “श्री पंढरीनाथ पद्मराग रथयात्रा” नाम का फलक था। यह दृश्य देखकर श्रद्धावान तृप्त हो रहे थे। सुबह की उपासना के दौरान श्रद्धावानों ने चिकनी मिट्टी से जो महाविष्णु के आयुध बनाए थे वे भी इसी रथ में श्रीविठ्ठल के चरणों में अर्पण किए गए थे। केसरी रंग की पगड़ी पहने, हाथों में ध्वज लिए ‘जय जय रामकृष्ण हरि’, ’माझा विठू माझा विठू माझा विठू विठू विठू विठू’, ’आला रे आला माझा सावळा विठ्ठल आला’ ऐसे धुन में नाचनेवाले हजारों श्रद्धावानों से मानो वहाँ का संपूर्ण वातावरण गूंज उठा था। सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध, नंदाई और सुचितदादा समेत रथयात्रा का संपूर्ण मार्ग चलते हुए गजरों (धुनों) की ताल पर नाचते नाचते रथ खींचनेवाले श्रद्धावानों का उत्साह बढ़ गया था। अनेक श्रद्धावान पारंपारिक वेषभूषा में इस रथयात्रा में शामिल होकर गजर के ताल पर नाचते हुए रथ खींच रहे थे। दूसरे दिन श्रद्धावानों को ‘संत तुकाराम’ फिल्म दिखाई गई।

तीसरा दिन 7 मई 2001

इस दिन सुबह के समय श्रद्धावानों के लिए श्री विठ्ठल दर्शन आयोजित किया गया था। सद्‌गुरु श्रीअनिरुध्दजी ने श्रद्धावानों को विशेष तौर पर समझाया कि, “संत नामदेव का पायदान, संत चोखोबा की समाधि और संत कान्होपात्रा का दर्शन श्रीविठ्ठल के दर्शन से अधिक महत्वपूर्ण है, अत: श्रीविठ्ठल के दर्शन बाद में करना।” इसलिए भक्तवत्सल विठू मां से मिलने आए सभी श्रद्धावानों ने पहले संत नामदेव की पायदान, संत चोखोबा की समाधि के दर्शन किए तथा वृक्षरूपी स्थिर  संत कान्होपात्रा को तहेदिल से प्रणाम किया इसके पश्चात ही श्रीविठ्ठल के चरणों पर माथा टेका।

इसके बाद श्रद्धावानों को अपने मन के पाप और अहंकाररूपी जहरीले कालिया का प्रतिकात्मक मर्दन करने हेतु चिकनी मिट्टी दी गई थी। इस मिट्टी से हरएक श्रद्धावान ने अपने पापों तथा अहंकार का नाश हो जाएं ऐसे कृष्णरूपी श्रीविठ्ठल को प्रार्थना करते हुए, सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध द्वारा दिया गया जप जपते हुए एवं एक विशेष नामगजर सुनते हुए प्रतिकात्मक कालिया बनाया। फिर सभी ने खुद ही नामगजर के दौरान उसी कालिया का मर्दन किया। अपने भीतर के जहरीले कालिया के मर्दन का आनंद सभी श्रद्धावानों ने उस नामगजर के दौरान बेभान होकर नाचते हुए उठाया। गोपालकृष्ण, श्रीविठ्ठल की भक्ति में दहिकाला का अनन्यसाधारण महत्व है। दहीकाला उत्सव उत्साह एवं ऊर्जा से परिपूर्ण समारोह है। भगवान श्रीकृष्ण की ललकारी करते हुए, ‘गोविंदा रे गोपाला’, ‘बोलो बजरंगबली की जय’ यह जयघोष करते हुए उत्साह एवं चैतन्य के गूंजभरे वातावरण में एक के ऊपर एक ऐसे तीन परतें बनाकर दहीहंडी फोड़ी गईं।

चौथा दिन 8 मई 2001 –

इस दिन सद्‌गुरु श्रीअनिरुध्द की उपस्थिती में प्रथम हरिपाठ किया गया। वैशाख पूर्णिमा के पावन दिन सद्‌गुरु श्रीअनिरुध्द ने वैशाख पूर्णिमा का महत्व एवं इस दिन की जानेवाली उपासना का महत्व समझाया, जिसकी वजह से उपासना करते हुए प्रत्येक श्रद्धावान का भाव वृध्दिंगत हो चुका था। सद्‌गुरु श्रीअनिरुध्द के मार्गदर्शनानुसार सभी श्रद्धावानों ने वैशाख पूर्णिमा की सामूहिक उपासना की।

चंद्रभागा नदी के तट पर जाने से पहले शाम के 5 बजे सद्गुरु बापूजी ने श्रद्धावानों से संवाद किया। चंद्रभागा के तट पर छोटा परंतु आकर्षक मंडप बनाकर मंच पर भगवान श्रीकृष्ण की मोहक तस्वीर रखी गई थी और लाउडस्पीकरों की उत्तम व्यवस्था की गई थी। डांडिया रास खेलने के लिए श्रद्धावान महिलाओं एवं पुरुषों की अलग अलग व्यवस्था की गई थी। रास आरम्भ करने से पहले सद्‌गुरु श्रीअनिरुध्दजी ने “खेळ मांडियेला वाळवंटी ठाई नाचती वैष्णव गाती रे” इस अभंग की शुरुआत की पुन: श्रद्धावानों के साथ थोड़ा संवाद किया। युगोंयुगों से भक्तों के पीछे दौड़ने के बावजूद भी युगोंयुगों से दुष्टों का संहार करते हुए भी श्रीकृष्ण जरा सा भी नहीं थकते क्यों? इस बारे में बापूजी ने एक कथा सुनाई और श्रद्धावानों को डांडिया खेलते हुए “मैं श्रीकृष्ण का गोप हूं” इस भाव को मन में धारण किए हुए डांडिया रास खेलने को कहा।

चंद्रभागा नदी के पावन तट पर श्रीविठ्ठल के नामगजर के साथ बड़े ही सुरताल में यह डांडिया रास रंग उठा था, जिसमें छोटे-बड़े रंग चुके थे। तत्पश्चात बड़े ही सुन्दर तरीके से  आतिशबाजी की गई जिससे संपूर्ण असमंत मानो रंग उठा था। चंद्रभागा के तट पर भक्तिमय वातावरण छाया हुआ था।

पंढरपूर भावयात्रा संपन्न

पंढरपूर भावयात्रा के अंतिम दिन सद्‌गुरु श्रीअनिरुध्द ने कहा, “भगवंत तुम मेरे ही हो पर मुझे तुम्हारा बनना है” इस भाव से जियो, जिसकी वजह से आपका हर पल आनंददाई होगा, प्रेम से परिपूर्ण हो जाएगा” इन प्रेमपूर्ण आत्मीयता भरे शब्दों को हृदय में धारण किए हरएक श्रद्धावान भारी अंत:करण से प्रचंड प्रेम, आनंद, परमात्मा की भक्ति के भाव की गठरी लिए अश्रुभरे नयनों से निकल रहा था, अपने जीवन यात्रा को निरंतर आनंदयात्रा में परिवर्तित करने के लिए।