साईनिवास एक ऐतिहासिक धरोहर –

श्रीसाईसच्चरित चरित्रकार श्रीहेमाडपंत अर्थात कै.गोविंदराव (अण्णासाहेब) रघुनाथ दाभोलकर का बांदरा का निवासस्थान। १९०९ में श्रीहेमाडपंत श्रीक्षेत्र शिरडी में स्थित सद्‌गुरु श्रीसाईबाबा के दर्शन हेतु आये थे। प्रथम मुलाकात में ही श्रीसाईनाथ की चरणधूल में लोटकर हमेशा के लिए वे श्रीसाईनाथ के बन गए। बांदरा के आपने निवासस्थान को भी उन्होंने ‘साईनिवास’ नाम दिया। जहाँ पर हमेशा साई वास करते हैं ऐसा स्थान। जो स्थान केवल साई का ही है वह ‘साईनिवास’ ऐसा नाम उन्होंने प्रदान किया अपने निवास स्थान को। आज उनके इस निवास स्थान को सौ वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। और आज भी सभी साईभक्तों को यह स्थान साईभक्ति की परंपरा की साक्षी देते हुए दिमाग में अपनी छबी कायम रखा है। इस स्थान का उल्लेख श्रीसाईसच्चरित ग्रंथ में तो किया ही गया है। परन्तु इसी साईनिवास में इस अपौरूषेय ग्रंथ की रचना पूर्ण हुई है।

साईनिवास के साई एवं बापू के बीच का सेतु –

इस साईनिवास में डॉ.अनिरुद्ध जोशी का अकसर आना-जाना रहता था। हेमाडपंत की तीसरी एवं चौथी पिढी़ इस साईनिवास की सारी जिम्मेदारियों को प्रेमपूर्वक पूरा कर रही है। हेमाडपंत के पोते सद्यपिपा आप्पासाहेब दाभोलकर और उनकी धर्मपत्नी मीनावैनी का डॉ. जोशी के साथ स्नेह बढ़ चुका था। २८ मई १९९६ इस दिन उन्होंने सहज बातों ही बातों में श्रीसाईबाबा ने हेमाडपंत को दी हुई तीन वस्तुएँ (जपमाल, त्रिशुल एवं शालीग्राम) वापिस माँगी। यह रहस्य केवल दाभोलकर दंपत्ति को ही पता था और इसे तीन पिढ़ियों से पिढी़ दर पिढी़ सजोटकर रखा गया था। श्रीसाईनाथ ने हेमाडपंत से कहा था कि ‘मैं ये तीन वस्तुएँ स्वयं माँगूंगा’ साथ ही किसी को भी इस बात की जानकारी न होने के कारण ये तीनों वस्तुएँ डॉ. जोशी द्वारा माँगी जाने पर आप्पासाहेब ने बगैर किसी संकोच के उनके हाथों में वे वस्तुएँ सौंप दी। उसी समय दाभोलकर दंपत्ति ने उन्हें दंडवत नमस्कार किया। नमस्कार करते समय उन्हें श्रीअनिरुद्ध में घुटनों तक कफनी पहने ८० साल के साईनाथ और घुटनों के नीचे काले रंग की पैन्ट ऐसा दर्शन हुआ। यह दिन अब बापू के प्रगटीकरण के रूप में मनाया जाता है। और यह प्रगटीकरण साईनिवास में ही हुआ है। १९२९ में जहाँ पर ‘उन्हीं के चरणों में अमितपूर्वक । लेखनी मस्तक अर्पित करता हूँ ।’ ऐसे कहते हुए श्रीसाईसच्चरित की अंतिम पंक्ति लिखते हुए हेमाडपंत ने अपना शरीर छोड़ दिया। उसी साईनिवास में १९९६ से एक नये अध्याय का आरंभ हुआ।

साईनिवास में देखने योग्य –

साईनिवास में होली पूर्णिमा के दिन आनेवाली बाबा के तस्वीर की हुबहू प्रतिकृति श्रीअनिरुद्ध जी ने १९९७ में बनवाली। यह ध्यानमूर्ति अतिशय विलोभनीय होने के कारण हर कोई इसके समक्ष बैठकर ध्यान कर सकता है। हेमाडपंत ने जिस डेस्क पर बैठकर श्रीसाईसच्चरित ग्रंथ लिखा था वह डेस्क यहाँ देखने को मिलता है। उसका दर्शन भी सुलभ किया गया है। साईनिवास में साई के अस्तित्व का भास हर पल होता रहता है। साईनिवास के अहाते के पिछले हिस्से में कै.मीनावैनी के स्मृतिप्रित्यर्थ निर्माण किया गया है। श्रीअनिरुद्ध बापू के पूर्णाकृति प्रतिमा का, पादुकाओं का दर्शन एवं तुलसीवृंदावन की प्रदक्षिणा इन सभी का लाभ आनेवाले भक्तों को प्राप्त होता है। साथ ही इस स्थान पर हम सुदीप प्रज्ज्वलित कर सकते हैं।

साईनिवास में मनाये जानेवाले उत्सव –

१) होलीपूर्णिमा :

श्रीसाईसच्चरित के चालीसवे अध्याय के कथानुसार इसीदिन साईबाबा का साईनिवास में तसबीर रूप में आगमन हुआ था। इसीलिए होलीपूर्णिमा यह साईनिवास में मनाया जानेवाला प्रमुख उत्सव है। २०१७ में इस घटना को सौ वर्ष पूर्ण हो गए। इसीलिए साईनिवास में शताब्दी पूर्ण होने के उपलक्ष में आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

२) श्रावण मास के दूसरे सप्ताह में साईसत्‌चरित्र का ११ अध्यायों का २४ घंटे, रात्रि ९ से दूसरे दिन रात्रि ९ बजेतक परायण चलता है।

३) अश्विन मास के नवरात्रि में ‘सद्‍गुरु नवरात्रि’ मनायी जाती है। इस उत्सव में हेमांडपंतजी का नित्यजप ‘साईसमर्थ’ ये बाबा की मूल तसबीर के सामने बैठकर श्रद्धावान करते हैं

४) आषाढ़ी एकादशी का कार्यक्रम साईनिवास के तुलसी वृंदावन की जगह में किया जाता है।

३) साईनिवास में प्रतिदिन सायं ७ बजे आरती होती है और आरती के पश्चात्‌ एक दिन हरिपाठ, एवं एक दिन शिवपाठ हर शनिवार को सद्‍गुरु

श्री अनिरुद्ध बापू की उपासना होती है एवं उपासना के पश्चात्‌ अनिरुद्ध पाठ लिया जाता है।

साईनिवास का पता एवं समय :

साईनिवास मुंबई में बांदरा स्टेशन से दस मील के अंतर पर है।
पता : साईनिवास सेंट मार्टिन रोड, बांदरा (पश्चिम), मुंबई – ४००५३।

दर्शन का समय :

सुबह के ८ बजे से लेकर दोपहर के १ बजे तक एवं सायं, ४ बसे रात्रि के ८ बजे तक।
गुरुवार-सुबह के ८ बजे से सायं ४ बजकर ३० मिनिट तक।