AniruddhaFoundation-Aadyapipa Samadhi Sthanam

श्री आद्यपिपा समाधि समारोह यह जुईनगर में १९ अप्रैल २००७ से मनाया जाता है। इस विशेष दिन श्रीआद्यपिपा की समाधि की स्थापना की गई।

आद्यपिपा अर्थात वे कौन हैं?

श्री सुरेशचंद्र दत्तोपाध्ये अर्थात पूज्य सुचितदादा एवं समीरदादा के पिताश्री। १९४० में अपनी उम्र के सातवे वर्ष शिरडी में साईबाबा के दर्शन पश्चात आद्यपिपा के पिताजी ने उन्हें उदी देकर उदी का महत्त्व समझाया और उसी समय इस उदी के कण के समान छोटा बनकर साई की भक्ति करनी है यह संकल्प साई को साक्षी मानकर उन्होंने किया।

आगे चलकर श्रीसाईसच्चरित के नित्य पठन एवं चिंतन से ही उनके अग्रीम जीवन के प्रवास का आरंभ हुआ। इसीलिए लगातार साठ वर्षों तक उन्होंने श्रीसाईसच्चरित का पारायण किया। इससे उनके अंतरंग में होनेवाला भक्ति का उपवन पुष्पित हो उठा।

श्री सुरेशचंद्र दत्तोपाध्ये इनकीपिपापदपर नियुक्ती

पिपिलिका पंथ पर चलना है तो चींटी के आकार में ही रहना चाहिए। यहाँ पर यदि आकारमान जरा सा भी बढ़ जाता है तो वह रास्ता मात्र तुम्हारे लिए कतई नहीं रह जाता है। यह आद्यपिपा का ही वाक्य उनके यशस्वी जीवन का मर्म है। एक माँ के बच्चे की तरह ही भगवान का बच्चा बनकर रहना अर्थात पिपिलिका पथ यह आद्यपिपा ने जान लिया था और आजीवन उन्होंने अपना जीवन इसी तरह व्यतीत किया। मान-पान, प्रसिद्धि और बड़प्पन इन सबसे तो वे हमेशा ही दूर रहे। १३ नवम्बर २००० के दिन सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध ने सुरेशचंद्र वैद्य की पिपिलिका पांथस्त इस पद पर नियुक्ती की।

आद्यपिपाजी की समाधी 

वे नित्यप्रति साईसच्चरित का पारायण जो करते चले आ रहे थे उसके समाप्ति के समय अर्थात गोकुल अष्टमी के दिन दिनांक २६/०८/२००५ के दिन आद्यपिपा (का निधन हो गया) ने इस दुनिया से अंतिम विदा ले ली। उनके निर्वाण के पश्चात्‌ उनकी समाधि श्रीक्षेत्र जुईनगर में १९ अप्रैल २००७ के दिन सद्‌गुरु बापू, सौ. नंदा जोशी (नंदाई) आद्यपिपा के दोनों पुत्र सुचित वैद्य एवं समीर वैद्य साथ ही आद्यपिपा की पत्नी शुभदा काकू आदि के उपस्थिती में दर्शन के लिए उपलब्ध की गई।

आद्यपिपा के पिता को साईनाथ द्वारा दी गई उदी, सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध द्वारा आद्यपिपा को दी गई उदी इस समाधि में रखी गई है। इस समाधि पर होनेवाले छह पायदान अर्थात धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, भक्ति एवं मर्यादा ये इस पुरुषार्थ मार्ग की साक्षी देते हैं। समाधि पर आद्यपिपा द्वारा पारायण किया जा रहा साईसच्चरित ग्रंथ रखा गया है। समाधि के पिछे श्रीसाईनाथ की भिक्षाटन की तसवीर लगाई गई है। साथ ही समाधि के सामने ही एक रंगशिला है। इस रंगशिला पर कान पकड़कर खड़े रहकर अपनी गलतियों की कबूली श्रीसाईनाथ के समक्ष हम दे सकते हैं।

समाधी समारोह कैसे मनाया जाता है-

आद्यपिपाजी की समाधि का वर्धापन दिवस गुरुकुल जुईनगर में प्रतिवर्ष १९ एप्रिल इस दिन संपन्न होता है। इस दिन गुरुकुल जुईनगर मेंसमाधि को मंगलस्नान करवाया जाता है। इसके पश्चात्‌ श्रीसाई सहस्त्रपूजन का आरंभ होता है। फिर समाधि पर दुधमिश्रित जल से अभिषेक किया जाता है। इस समय परमपूज्य सुचितदादा के आवाज में श्रीसाईसच्चरित के ग्यारहवे अध्याय के पठन की सी.डी. लगाई जाती है। इसके पश्चात्‌ समाधीपूजन, अत्तर चर्चन करने के बाद नैवेद्य अर्पण किया जाता है। “आरती साईबाबा” यह आरती परमपूज्य सुचितदादा के आवाज में लगाई जाती है और उसके बाद गजर आदि होता है फिर सभी श्रद्धावानों के लिए अत्तर चर्चन एवं दर्शन आरंभ होता है।

इस दिन श्री आद्यपिपाद्वारा सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध पर रचे गए अभंग गजर स्वरूप में गाए जाते हैं।