AniruddhaFoundation-Shree Aniruddha Pournima

सद्‍गुरू अनिरुद्धजी का जन्मदिन – अनिरुद्ध पूर्णिमा यानि त्रिपुरारी पूर्णिमा ! भक्तों के सखा, प्रेम स्वरूप सद्‌गुरू श्री अनिरुद्ध बापू जी का जन्म १८ नवंबर १९५६ को हुआ। इस दिन त्रिपुरारी पूर्णिमा थी। परमपूज्य श्री अनिरुद्ध जी का जन्म सुबह ४ बजकर ३५ मिनिट पर मुंबई के में हुआ।

श्रद्धावानों की शुभकामनाएँ – हर एक श्रद्धावान चाहता है कि वह अपने सद्‌गुरू का जन्मदिन हर साल मनाए। सद्‌गुरू जी का जन्मदिन हर एक भक्तों के लिए आनंद – उत्साह तथा अभिमान का दिन होता है। सालभर में कितनी ही बार उनका दर्शन हुआ होता है, फिर भी उनके जनमदिन के दिन उनका दर्शन लेने की इच्छा हर एक भक्त के मन में उमड़ पड़ती है। उनंके जन्मदिन के अवसर पर उनको शुभकामनाएँ देना प्रसन्नता के साथ अपने दोनों ही नयनों की ज्योति से उनकी आरती उतारना, भक्ति के अन्य उपक्रम मनाना तथा इस मंगलमय वातावरण में अधिक से अधिक तर समय बापू के सानिध्य में बिताना यही हर भक्त की कामना होती है।

इसदिन का महत्त्व- सद्‌गुरु अनिरुद्ध जी की श्रेष्ठ श्रद्धावान सौ. मीनावहिनी दाभोळकर ने सर्वप्रथम इस त्रिपुरारी पूर्णिमा का नामकरण अनिरुद्ध पूर्णिमा ऐसे किया। यह अत्यंत शुभ दिन है। हमारे पुराणों में भी इस दिन घटित हुए अनेक शुभ प्रसंगों का वर्णन मिलता हैं।

१) यही वह दिन है, जब परमात्मा शिवशंकर ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस को मारा था।

२) यही वह दिन है, जब परशुराम ने अपने धनुष्यबाण का इस्तमाल करके समुंदर को पीछे जाने के लिए विवश किया तथा कोंकण भूमि का निर्माण किया।

३) यही वह दिन है जब श्री हनुमान जी ने अपनी छाती चिरकर श्रीराम, जानकी तथा लक्ष्मण को उन्हीं की छवी का दर्शन अपने हृदय में करवाया था।

४) पंढरपुर के आराध्य श्री विठ्ठल भी इसी दिन से अपने परम भक्त पुंडलीक के इंतजार में एक ईंट पर खड़े उसका इंतजार कर रहे हैं।

५) २००९ साल के इसी अनिरुद्ध पूर्णिमा के दिन त्रिविक्रम के प्रकट रूप का पूजन प्रति माह आयोजित किया गया।

इस पवित्र दिन श्री अनिरुद्ध उपासना फाउंडेशन की ओर से यह कार्यक्रम अत्यंत उत्साह तथा भक्तिमय वातावरण में मनाया जाता है। इस दिन सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध बापू पूरे दिन श्रद्धावानों को दर्शन देते हैं तथा उनसे मिलते हैं।

अनिरुद्ध पूर्णिमा उत्सव में आयोजित किए जानेवाले उपक्रम :

१) सुबह ८ बजे विविध उपक्रमों की शुरुआत होती हैं। सर्वप्रथम मंच पर परम पूज्य समीर दादा के हाथों से सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध बापू की पंचधातु की मूर्ति पर जल अभिषेक किया जाता है। उसी समय अनिरुद्ध कवच स्त्रोत्र का पठन सभी श्रद्धावान करते हैं।

२) इस अभिषेक के बाद दिंडी तथा मंगलवाद्यों की ध्वनि के साथ सद्‌गुरु की मूर्ति जागर के मंच पर स्थापित की जाती है।

३) श्रद्धावान बड़े प्रेम से परंपरानुसार अपने अनिरुद्ध भगवान का जागर करते हैं। हर तरह की सेवा करने का आश्वासन देते है तथा मुसीबत के समय में हे ईश्वर तुम्हारे सिवाय मेरा कोई भी नहीं हैं, तुम मेरे साथ हमेशा रहना इस तरह की आर्त पुकार वे करते हैं।

इस आवाहन को सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध बापू हमेशा प्रतिसाद देते हैं।

४) सुदीप प्रज्ज्वलन – सद्‌गुरु अनिरुद्ध बापू के तसवीर के सामने श्रद्धावान सुदीप प्रज्ज्वलित कर सकते हैं। (सुदीप यानि मोम से बने हुए विविध रंगों तथा आकार के दीयें)

सुदीप का महत्त्व और प्रकार :

भगवान के सामने सुदीप प्रज्ज्वलित करके वह उनके चरणों में अर्पण करना अत्यंत पवित्र; उदात्त  एवं श्रेष्ठ कर्म है। हम जब सद्‌गुरु के सामने या ईश्वर के सामने सुदीप प्रज्ज्वलित करके अर्पण करते है, तब भगवान हमारे जीवन की राह पर प्रकाश निर्माण करते है, इसकी वजह से तकलीफों को पार करके जाने का मार्ग सहज हो जाता है। मुसीबतों के वक्त सुदीप अर्पण करने का जितना महत्त्व है, उतना ही महत्त्व किसी भी प्रकार की मुसीबत न होते हुए करने में है। हम जीवन सफलता के साथ बिताए तथा कभी किसी भी प्रकार की मुसीबत ना आए इसलिए सुदीप अर्पण करने में नियमितता होनी आवश्यक है।

जाने – अनजानें हुई गलतियों, प्रज्ञा अपराधों की वजह से जीवन में अनेक बाधाएँ निर्माण होती हैं, या अनेक संकटों का सामना करना पड़ता है। इसके विपरित या फिर कभी – कभी ऐसा भी होता है कि अनेक महत्त्वपूर्ण, आनंददायी, यशदायी घटनाएँ भी घटित होती हैं, इस तरह की सुख और दुख की दोनों स्थितियों में सद्गुरु को किस तरह पुकारे तथा अंबज्ञता किस तरह व्यक्त करें? उनकी कृपा दृष्टि के लिए धन्यवाद किस तरह  करें यह समझ में नहीं आता, तब सुदीप प्रज्ज्वलन सहायक होता है। यह अग्निस्वरूप एक ही है परंतु भक्तों की भावनाओं के अनुसार सुदीप के अलग – अलग प्रकार हैं।

१) इच्छापूर्ति सुदीप 

२) बाधानिवारण सुदीप

३) पीड़ानाशक सुदीप

४) दर्शन सुदीप

 ५) जन्मदिन सुदीप

६) स्वेच्छा संकल्प सुदीप

इस तरह ये सुदीप प्रज्ज्वलन निश्चित ही लाभकारक साबित होता है।

७) उद अर्पण :

सद्‌गुरु की प्रतिमा के सामने अग्निहोत्र प्रज्ज्वलित किया जाता है। वहाँ हर एक श्रद्धावान उद जला सकता है। उद जलाने के पीछे यह बात छिपी है कि हमारे अंदर की सभी दुष्ट प्रवृत्तियों एवं दुष्प्रारब्धों को जलाकर शुद्ध भाव की निर्मिती हो। पुण्य कर्म तथा भक्तिमय जीवन प्राप्त होने के लिए उद अर्पण करना महत्त्वपूर्ण है।

८) रामरक्षा पठन तथा अभिषेक :

अनिरुद्ध पूर्णिमा के दिन सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू के पूजा घर के राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की पंचधातु की मूर्ति को उत्सव के जगह पर लाकर उनपर दिन भर जलाभिषेक किया जाता है। दिन भर इस कक्ष में रामरक्षा का पठन अखंड रूम में शुरू रहता है।

९) श्री किरातरुद्र पूजन :

सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने भक्तों को सर्व प्रथम किरातरुद्र पूजन उनके लिए कितना महत्त्वपूर्ण है यह बताया तथा उसके अनुसार हर साल इस उत्सव में यह पूजन श्रद्धावानों के लिए खुला किया गया।  श्री किरातरुद्र की मूर्ति के पूजन करने के पश्चात्‌ पूजन के पदार्थ पूजा कलश में अर्पण करते हैं और किरातरूद्र का दर्शन लेते है। जो श्रद्धावान प्रत्यक्ष रूप में उपस्थित नहीं रह सकते परंतु उनकी पूजन करने की इच्छा होती है, उनके लिए श्रद्धावान सेवा रूप में पूजन की सुविधा उपलब्ध की जाती है। पूजन का प्रसाद उन्हें पहुँचाने की भी व्यवस्था की जाती है।

१०) आप्पे का प्रसाद :

अप्पम नाम का मीठा पदार्थ जो उड़द की दाल, सूजी से बना हुआ होता है। परमपूज्य बापू का यह पसंदीदा पदार्थ है। उत्सव स्थल पर लाकर बापू को अर्पण करते हैं। श्रद्धावानों द्वारा लाया हुआ यह मीठा पदार्थ संस्था की ओर से इकट्ठा करके श्री अनिरुद्ध बापू की प्रतिमा के सामने अर्पण करते है। भोग के रूपमें चढ़ाया हुआ यह प्रसाद सभी को घर वापिस लौटते समय बाँटा जाता हैं।

११) दर्शन :

इस दिन हर एक श्रद्धावान सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध बापू का दर्शन लेता हैं। महाआरती से उत्सव की समाप्ति होती है।

आशिर्वाद को ग्रहण कर अनिरुद्ध प्रकाश को लेकर हर एक भक्त तृप्त मन के साथ अपने घर लौटता है। घर लौटते वक्त हर एक श्रद्धावान का मन मीनावैनी के गीत की पंक्तियाँ गनगुनाता हुआ कहता जाता है, ‘आता कैसी अमावस्या नित्य अनिरुद्ध पोर्णिमा’

संपूर्ण जीवन को प्रकाशमान करनेवाले इस उत्सव का हर एक श्रद्धावान को जीवन में एक बार तो अनुभव लेना ही चाहिए।