स्थापना

सदगुरु श्री अनिरूध्द की कृपा से और मार्गदर्शन के अनुसार ४ अक्तूबर १९९८ के दिन गुरुकुल के भूमिपूजन समारोह संपन्न हुआ।

स्थान महात्म्य

बैसाख पूर्णिमा १९९९ इस बहुत ही पावन दिन पर- २८ और २९ अप्रैल १९९९ इन दिनों सद्गुरु श्रीअनिरूध्दने इस तीर्थक्षेत्र में महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती और साथ ही में श्रीमंगेश व श्रीशांतादुर्गा इन देवताओं की मूर्तियों की स्थापना की। इस दो दिनों के समारोह में बहुत ही पावन शुध्द मंत्रपठण अखंड शुरु था। देवताओं की मूर्तियां गंडकी नदी के पावन शिलाओं से शिल्पकला से बनायी गयी थी। परमपूज्य अनिरुद्ध बापू ने मंदिर में गोमुख आकार के गर्भगृह में इन मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा की थी। हर दिन प्रात: समय में गर्भगृहदालन खोलने के पहले इन तीनों मूर्तियों का षोडश उपचारों से पूजन करने के पश्चात उनका शृंगार किया जाता है ।इन मूर्तियों में ’महाकाली’ यह “काम” पुरुषार्थ की प्रतीक हैं यानि इच्छाशक्ति का प्रतीक। असुरों को डरानेवाली और श्रद्धावानों का रक्षण करनेवाली देवता ’महालक्ष्मी’ यह “अर्थ” पुरुषार्थ की प्रतीक हैं, जो सभी विघ्नों का नाश करनेवाली देवता है। ’महासरस्वती’ यह “धर्म” इस पुरुषार्थ की प्रतीक है, जो सभी रोगों का नाश करनेवाली, रोगों को दूर करनेवाली देवता है।

इन देवताओं के सामने पंचधातुओं से बने दो शेर देवीयों / देवी के सामने मुंह किए हुए खडे दिखाई देतें हैं। वैज्ञानिक और आध्यात्मिक निकषों के आधार पर जांचकर ही उन्हें बनाया गया हैं। उन शेरों के नाम हैं – १) आल्हाद और २) संतोष

श्री शांतादुर्गा की प्राणप्रतिष्ठा की है। इस चार भुजाओंवाली -चतुर्भुज मूर्ति के आगे के दो ह्स्त आशिर्वाद देनेवाले हैं तो पिछे के दो हाथों में दो सर्प हैं। इस मूर्ति के चरणों के पास शालिग्राम हैं, जिसपर इस मूर्ति की पूजा की विधि कीये जाती है।

महायोगपीठ स्वरुपाध्यास

श्रीशांतादुर्गा के सामने दाहिने ओर के स्तंभ के अंदर एक कलश है, जिस में संपूर्ण भारत के ३० तीर्थक्षेत्रों के शक्तिपीठों और धर्मपीठों की मृत्तिका रखी गयी है। इन सब चीजों से यह गुरुकुल एक पवित्र तीर्थक्षेत्र है।

धर्मचक्र

ऊपर वर्णन की हुई मूर्तियों के प्राणप्रतिष्ठादिन पर यानि पवित्र बैसाख पूर्णिमा के दिन श्रीअनिरूध्द के नित्यगुरु श्री मकरंद स्वामी की उपस्थिती में परमपूज्य अनिरुद्ध बापूजी ने धर्मचक्र की स्थापना की। यह धर्मचक्र धातुओं से बना है और उसमें २४ तीलियाँ (स्पोक्स्) हैं। ५२ भक्तों के घरों में “ॐ साई श्रीसाई जयजय साईराम” इस मंत्र  का जाप  (हर भक्त के घर में तीन दिन जाप )करने के पश्चात्‌ यह धर्मचक्र सिध्द किया  गया है और उसके उपरांत ही परमपूज्य अनिरूद्ध बापू ने उसकी स्थापना की है।

श्रीविद्यमकरंद गोपीनाथशास्त्री पाध्ये अध्ययन कक्ष

सदगुरु श्री अनिरूध्द बापू के मानवी सदगुरु यानि श्रीविद्यामकरंद गोपीनाथशास्त्री पाध्ये यह बापू के परनाना है। वे बहुत ही कुशाग्र बुध्दि के और सभी वेदशास्त्रों में माहिर थे। वे एक श्रेष्ठ साईभक्त और श्रेष्ठ विठ्ठल भक्त थे और इसी वजह से इस कक्ष में भक्ति को प्राधान्य दिया जाता है। इस कक्ष में स्तोत्रपठण, नामसुमिरन, ग्रंथपठण और ध्यान किया जा सकता है।

धुनी

श्रीअनिरुध्द के कृपाशीर्वाद से धुनी प्रज्वलित की गयी है। तब से यह अखंड प्रज्वलित है।

आद्यपिपा कै. परमपूज्य सुरेशचंद्र दत्तोपाध्ये रक्षा कलश समाधि स्थान

सदगुरु श्री अनिरुध्द के आज्ञा से आद्यपिपा के समाधि स्थान की स्थापना १९ अप्रैल २००७ के दिन की गयी है। सद्गुरु श्री साईनाथ ने खुद आद्यपिपा के पिताजी को दी हुई उदी के साथ आद्यपिपा का रक्षा कलश समाधिस्थान पर विराजमान है। इस समाधिस्थान के ६ चरण (पायदान) हैं। इस में से ५ चरण यह पंचपुरुषार्थ के यानि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और भक्ति के हैं और छ्ठा चरण यह मर्यादा पुरुषार्थ का है, जो पुरुषार्थ परमपूज्य बापू ने सिध्द किया है। सबसे उपर समाधि के उपर आद्यपिपा की नित्य पठण की श्रीसाईसच्चरित की पोथी है। इस जगह पर हर एक श्रध्दावान को पिपलिका मार्ग से जीवन का प्रवास करने की प्रेरणा मिलती है।

समाधि के सामने की शिला

समाधि के सामने रहनेवाली शिला के ऊपर खड़े रहकर आद्यपिपा को प्रणाम करते वक्त समाधि के पिछेवाले साईनाथ के तसबीर का दर्शन होता है। हर साल समाधिस्थापना के दिन १९ अप्रैल को यहाँ पर उत्सव मनाया जाता है। एवं हरसाल श्रावण मास के पहिले तीन शनिवार को अश्वत्थ मारूती पूजन, अश्विन मास में ललितापंचमी नवरात्र उत्सव, मार्गशिर्ष मास में वैभवलक्ष्मी उत्सव मनाये जाते हैं। अमावस्या के सिवा हर रोज दत्तयाग, व्यंकटेशयाग व गणेशयाग किए जाते है।