श्रीसाईसच्चरित :

‘श्रीसाईसच्चरित’ एक अपौरूषेय ग्रंथ है। परन्तु हम इस ग्रंथ की ओर एक पोथी के रूप में ही देखते हैं।

सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापू कहते हैं :

“ग्रंथ पढ़कर हमारे मन में प्रश्न निर्माण होने चाहिए। इससे ही हमारी प्रगति होती रहती है।” ‘श्रीसाईसच्चरित’ का पठ़न करनेवाले श्रद्धावान को पठ़न के पश्चात्‌ यदि इनमें की पंक्तियों का अर्थ समझ में नहीं भी आया फिर भी इस ग्रंथ के पठन के कारण उसके जीवन में बदलाव जरूर आयेगा। वह अधिकाधिक भक्तिमार्ग की ओर खींचता चला जायेगा कारण ‘श्रीसाईसच्चरित’ यह ग्रंथ ही भक्तिमार्ग का है। इस ग्रंथ का नाम भले ही ‘श्री साईसच्चरित’ है फिर भी पढ़ने के बाद हमें पता चलता है कि, यह श्रीसाईनाथ के श्रद्धावानों का ही आचरण है। उन श्रद्धावानों ने श्रीसाईनाथ की भक्ति कैसे की? उन्होंने क्या सेवाएँ की? और श्रीसाईनाथ का पदन्यास उनके जीवन में आ जाने पर उनके जीवन में क्या बदलाव आया? इन सभी बातों का अध्ययन अर्थात परमपूज्य सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापूने साईसच्चरित पर आधारित ‘पंचशील परीक्षा’ नामक अभ्यासक्रम शुरु किया।

श्रीसाईसच्चरित पंचशील परीक्षा :

पंचशील परीक्षा का अभ्यासक्रम प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी एवं पंचमी इस प्रकार से पाँच परीक्षाएँ हैं। हर छह महीने के कालावधि में ये परिक्षाएँ ली जाती हैं। परमपूज्य सद्‌गुरु श्रीबापूजी ने पंचशील परीक्षा के आरंभ में ही स्पष्ट किया है कि श्रीसाईसच्चरित की परीक्षा एवं यह अभ्यासक्रम ज्ञान हासिल करने के लिए न होकर बल्कि भक्ति कैसे करनी चाहिए इसके लिए है। इस भक्तिमार्ग में अधिकाधिक प्रगति करते हुए गलत बातें एवं गलत श्रद्धा दूर कर अपने जीवन को सर्वार्थ रूप में परिपूर्ण करने के लिए ही यह पंचशील परीक्षा है। इसीलिए पंचशील परीक्षा यह मेरी स्वयं की परीक्षा है। परीक्षा कहने पर हम केवल पारायण की तरह पढ़ते ही नहीं हैं बल्कि उस अध्याय को पढ़ते समय हम भली-भाँति सोच-समझकर पढ़ते हैं। उन पंक्तियों को समझने की कोशिश करते हैं।
श्रीसाईनाथ ने किए चमत्कार के रूप में इस ग्रंथ की ओर न देखते हुए साईनाथ ने अपने श्रद्धावानों के लिए की हुई ये लीलाएँ हैं। इन लीलाओं को पढ़ते समय वे कैसे घटित हुई इसके बजाय वे किसके लिए घटित हुईं? और क्यों घटित हुई? इसे हमें समझना चाहिए। इसीलिए यह पंचशील परीक्षा ली जाती हैं।

श्रीसाईसच्चरित पंचशील परीक्षा की रूपरेखा :

प्रथमा में श्रीसाईसच्चरित के १ से १० अध्यायों का अभ्यास किया जाता है। उसी तरह द्वितीया में ११ से २०, तृतीया में २१ से ३० और चतुर्थी में ३१ से ४० इन अध्यायों पर प्रश्न पुछे जाते हैं। पंचमी के लिए मात्र संपूर्ण साईसच्चरित के अध्यायों का अभ्यास करना होता है। इसी कालावधि के अंतर्गत प्रात्यक्षिक वर्ग (Practicles) लिए जाते हैं। भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र एवं जीवशास्त्र इन वैज्ञानिक घटकों के आधार पर श्रीसाईसच्चरित का आशय समझना तथा विज्ञान यह एक शास्त्र ही है। यह विज्ञान अध्यात्म से भिन्न नहीं है, विज्ञान भी वही कहता है जो अध्यात्म कहता है और इसे समझना इस की आज के समय की नितांत आवश्यकता है।

हर एक शास्त्र में दो विभाग होते हैं –

१)सैद्धांतिक, २)प्रात्यक्षिक

सैद्धांतिक अर्थात (Theoretical) उच्चार और प्रात्यक्षिक अर्थात (Practical) कृति

सिद्धांत अर्थात मेरी बुद्धि का विचार। ‘साईसच्चरित’ पढ़ना यह मेरा उच्चार है। मेरा उच्चार यही अध्ययन की शुरुआत हैं। उनमें श्रेष्ठ श्रद्धावानों का अनुकरण करने की कोशिश यह मेरी कृति है और इनमें से आनेवाले अनुभवों के आधार पर ही (Practical) मेरी आकृति निर्माण होनेवाली है। सद्‌गुरु श्रीबापू को हर एक श्रद्धावान की एक सुंदर आकृति निर्माण करनी है। इसीलिए पंचमी के विद्यार्थियों के लिए Practical की पुस्तक भी प्रकाशित की गई है। इस परीक्षा के पेपर हर फरवरी एवं अगस्त महीने के दैनिक प्रत्यक्ष के माध्यम से जाहिर किए जाते हैं तथा इसे पूर्ण करने के लिए तीन सप्ताहों की अवधि दी जाती हैं। श्रद्धावान इस परीक्षा का पेपर घर बैठकर अपना समय निकालकर लिख सकते हैं।

अधिक जानकारी हेतु पंचशील परीक्षा ब्लॉग पर देखिए। – http://www.saicharitra.com/