AniruddhaFoundation-Shree Tripada Gayatri Mahotsav

श्रीगायत्री पुरश्चचरण मास

गायत्री माता की कृपासेही हर एक मानव किसी भी क्षेत्र में अढलपद पा सकता है। श्री अनिरूध्द बापू के मार्गदर्शन के अनुसार १५ मई २००४ से १७ मई २००४ इस कालावधि में अंधेरी स्पोर्टस कॉम्प्लेक्स, मुंबई इस स्थान पर गायत्री महोत्सव आयोजित किया गया। इस महोत्सव में सुबह ८ बजे से रात ७ बजे तक गायत्री मंत्र का पठण होता था। हर दिन ३७,१२,४७० बार गायत्री मंत्र का पठण होता था। लाखों श्रध्दावान इस पुरश्चरण याग में सहभागी हुए थे। इस उत्सव के तीनों दिनों में सदगुरु श्रीअनिरुध्द बापू, नंदाई और सुचित दादा ने गायत्री माता की आरती की थी।

सदगुरु अनिरूध्द बापू ने मातृवात्सल्यविंदानम् ग्रंथ में लिखा है कि गायत्री माता यानि ‘मैं परमात्मा हूँ यह परमेश्वर की अनुभूति’ यही विश्व की स्पंदशक्ति और आत्मरूपी चित्कला है। वेदोंनेही इसे गायत्री  माता कहकर संबोधित किया हैं। ‘मैं परमेश्वर हूँ’ इस अनुभूति में से ही ओंकार प्रकट हुआ और उसका पहला नाद यानि परब्रम्ह।

हर एक जपक को गायत्री माता की एक मूर्ति पूजन के लिए दी गयी थी। श्री गायत्री पुरश्चचरण याग के तीनोंही दिनों में त्रिपदा गायत्री मंत्र का जाप हुआ था। यह मंत्र इस प्रकार से था –

ॐ भूर्भुवः स्वः I तत्सवितुर्वरेण्यम्‌ I भर्गो देवस्य धीमही I धियो यो न: प्रचोदयात् ॐII

अर्थ – प्रणव ओंकार से उत्पन्न हुए पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग इनके पार रहनेवाले सवितृ का हम ध्यान करतें हैं। वे हमारी बुध्दि को प्रेरित करें।

परमपूज्य बापू ने मातृवात्सल्यविंदानम् ग्रंथ में गायत्री माता की कृपा प्राप्त करने के तीन मार्ग बताये हैं।

१) श्रीगायत्रीमंत्र का ब्राम्ह मुहुर्त में १०८ बार अखंड पठण

२) श्रीगायत्री मंत्र का त्रिकाल स्नान के उपरांत हर एक वक्त २४ बार पठण

३) श्रीगायत्री माता के पुत्र की निश्चल भक्ति

भगवान परशुराम से श्रीदत्तगुरु कहतें है कि, “गायत्री माता की कृपा से ही मानव किसी भी क्षेत्र में उच्च और अढलपद पा सकता है।”