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तादात्मानं सृजाम्यहम् पुस्तक के बारे में

डॉ.अनिरुद्ध धैर्यधर जोशी, सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापूजी के द्वारा रचित यह पुस्तक ‘तदात्मानं सृजाम्यहम्‌’। सन्‌ १९९७ के रामनवमी के दिन इस पुस्तक को प्रकाशित किया गया था। इस पुस्तक में सच्चे अर्थों में एक सद्‌गुरु के अंतरंग पर प्रकाश डाला गया है। सच तो यह है कि सद्‌गुरु के मन में क्या चल रहा है इसका पता लगाना किसी के लिए भी मुमकीन नहीं है। फिर अपने भक्तों के बारे में सद्‍गुरु के मन में जो भी भावना होती है, वे सारी बातें इस पुस्तक में उन्होंने रखी है। भक्तों के सीधे-साधे और कभी-कभी तीक्ष्ण लगनेवाले प्रश्नों का उत्तर भी सद्‌गुरु ने बडे़ प्रेम से दिया है।

तादात्मानं सृजाम्यहम् पुस्तक में बापू कहते हैं

कीडे़-मकोडो़ से लेकर प्रत्येक प्राणियों में और मुझमें कोई भी अंतर नहीं है। मैं भी इसीतरह से एक सर्व साधारण जीव हूँ। इन सबकी तरह ही उस मूल चैतन्य का एक अंश हूँ। एक नीरव शांतता के महन्मंगल क्षण में मुझे एक आवाज सुनाई दी और फिर धीरे-धीरे उस आवाज का स्त्रोत अनाहत संदेश बनकर लेखनीद्वारा सहजरूप से अपने आप (स्वधर्म) प्रवाहित होने लगा। वही प्राकटय अर्थात यह लेखन और आलेखन। इसमें मेरा और मेरे स्वंय का कुछ भी नहीं है। बिलकुल भी कुछ नहीं और कभी भी न हो यही मेरी सद्‌गुरु के चरणों में प्रार्थना है।

 

तादात्मानं सृजाम्यहम् सदगुरु वाणी

‘यदा यदा ही धर्मस्य, ग्लार्निभवति भारत। अभ्युत्धानम्‌धर्मस्य, तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ||’

हे भारत जब जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म की वृद्धि होने लगती है, तब-तब मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सन्मुख प्रकट होता हूँ।

इसी अर्थ से जब जब भक्तों के मन में विचारों का महाभारत शुरु होता है, भावनाओं का कल्लोल शुरु होता है और वे अपने मूल स्थिति से दूर होने लगते हैं, तब उन भक्तों के लिए वे साकार रूप में प्रकट हो जाते हैं। पुस्तक अर्थात ‘तदात्मानं सृजाम्यहम्‌’ यह एक आवाज है सद्‌गुरु की। सिर्फ और सिर्फ उनके भक्तों के लिए।

तदात्मानं सृजाम्यहम् ……….अमृतानुभव

इस पुस्तक की भाषाशैली के बारे में कुछ भी कहना उचित नहीं होगा क्योंकि सीधे सद्‌गुरु की खोज करने का यह मार्ग स्वयं सद्‌गुरु ने ही दिखाया है। बिलकुल जीवन में प्रत्येक स्तर पर आवश्यक रहनेवाला यह मार्गदर्शन है। मेरे मन को सद्‌गुरु के चरणों से जोड़नेवाला यह  सुनहरा अवसर है। यह पुस्तक अर्थात मित्रता है, कभी भी धोखा न देनेवाले मित्र की। इस पुस्तक का वाचन करना अर्थात अमृत का अनुभव करना है।

तदात्मानं सृजाम्यहम् पुस्तक कहाँ पर मिलेगी

यह पुस्तक प्रिंट के स्वरूप में और ई-बुक के स्वरूप में ई-शॉप आंजनेय पर मिलेगी। उसकी लिंक इस प्रकार है –

https://www.e-aanjaneya.com/productDetails.faces?productSearchCode=TDMMAR

प्रकशक : ईशा पश्यंती प्रकाशन