सदगुरु श्री अनिरूध्द बापूने रामराज्य के अपने प्रवचन में श्रीरणचण्डिका प्रपत्ति और श्रीमंगलचण्डिकाप्रपत्ति के बारे में जानकारी दी थी। श्रीश्वासम् के उपरांत बापूने १० मार्च २०१६ के अपने पितृवचन में महादुर्गेश्वर प्रपत्ति के बारे में जानकारी दी थी। इसके पश्चात्‌ हर श्रावण मास में पुरुषों के लिए की जानेवाली श्रीरणचण्डिका प्रपत्ति में पूर्णत: बदलाव लाकर ‘महादुर्गेश्वर प्रपत्ति’ दी गयी। उस समय बापू ने कहा था कि काल के अनुसार बदलाव लाना आवश्यक है और इसीलिए कालानुसार इस प्रपत्ति में भी यह बदलाव कर दिया गया है।

श्रीमहादुर्गेश्वर

श्री गुरुक्षेत्रम्‌ में महादुर्गेश्वर के लिंग के दर्शन का लाभ सभी लेतें हैं। महादुर्गेश्वर ही महिषासुरमर्दिनी आदीमाता चण्डिका है। वे दोनों एक ही है भी और नहीं भी। गुरुक्षेत्रम में इस महादुर्गेश्वर का हर रोज तीन प्रहरों में पूजन किया जाता है। हर मास में शिवरात्री के दिन महादुर्गेश्वर का शिवरात्री पूजन किया जाता है।

श्रीमहादुर्गेश्वर प्रपत्ति

श्रावण मास में किसी भी सोमवार को या सभी के सभी सोमवार को श्रीमहादुर्गेश्वर प्रपत्ति की जा सकती है। स्त्रियों की और पुरुषों की ग्रहण क्षमता भिन्न भिन्न होती है। यह बदलाव निसर्ग के अनुसार (प्रकृति ने) ही हुआ है।

इसीलिए पुरुषों को चार सोमवार और स्त्रियों को मकर संक्राती के एक दिन ही प्रपत्ति दी गयी है। श्रावणी सोमवार को भगवान शिवशंकर के साथ भगवान श्रीनृसिंहजी के अवतार के पूजा का भी मान होता है। बापू ने उनके रामराज्य प्रवचन में बताया था कि हर एक पुरुष को त्रिविक्रम यही नृसिंह है ऐसी श्रध्दा रखनी चाहिए। इस त्रिविक्रम की प्रतिमा का पूजन श्रीमहादुर्गेश्वर प्रपत्ति में किया जाता है।

श्रीमहादुर्गेश्वर प्रपत्ति कैसें की जाती है ?

श्रध्दावान पुरुषों को एक स्थान पर इकठ्ठा होकर सूर्यास्त बेला में इस प्रपत्ति को करना है। इस प्रपत्ति को श्रध्दावान की पोशाक/पोषाख (सफेस शर्ट, लुंगी  एवं उपरण) पहनकर करना है। ५ बार श्री गुरुक्षेत्रम मंत्र का पठण करके इस की शुरुआत की जाती है और उसके बाद में ११ (ग्यारह) बार महादुर्गेश्वर का जाप किया जाता है। इसके पश्चात महादुर्गेश्वर की बल कथा को पढ़ा जाता है, जो अति-सुंदर कथा है। यह कथा सभी प्रकार के बल को प्रदान करती है। इस के उपरांत गौरीहर की आरती की जाती है। बाद में हाथों में पूजा की थाली लेकर ‘बम बम भोलेनाथ’  इस गजर के साथ भगवान त्रिविक्रम की १२ (बारह) बार परिक्रमा (प्रदक्षिणा) की जाती है। ‘बं’ यह विकास का बीज है, बल का बीज है, अनुग्रह का बीज है और इस की शास्ता कौन है? तो बलगंगागौरी यानि शिवगंगागौरी। उस के बाद त्रिविक्र्म को सफेद और पीले फूल अर्पण करने हैं। इस प्रपत्ति के बारे में अधिक जानकारी ‘श्री महादुर्गेश्वर प्रपत्ति’ इस किताब में मिल सकती है ।

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