भारतीय स्त्रियों की स्थिति एवं आत्मबल

आज की स्त्री चाहे कितनी भी पढ़ी-लिखी क्यों न हो वह अपना आत्मबल गवां बैठती है। इसीलिए निराशाजनक अवस्था में उसे अनेकविध पारिवारिक एवं सामाजिक अड़चनों का सामना करना पड़ता है। वैदिक कालखंड में मूल ताकत ही ‘आत्मबल’ था। यह आत्मबल पुन: स्त्रियों को प्राप्त करवा कर आज की, कल की स्त्री को समक्ष बनाना अति आवश्यक है। तभी हमारा भारत देश पुन: एक बार सर्वसमर्थ बन सकेगा। कारण देश के समर्थ बनने की शुरुआत परिवार से ही होती है और यह समर्थ परिवार उस परिवार की समर्थ स्त्री बना सकती है।

आत्मबल अर्थात आंतरिक शक्ति :

‘आत्मबल’ इस नाम में ही सब कुछ है। ‘आत्मबल’ अर्थात स्त्रियों के अन्तरमन में उपजनेवाली हर एक स्त्री को इस बात का अहसास होना होता है। ऐसी शक्ति जिसे पहचानने के लिए कभी कभी स्त्री को प्रयास करना पड़ता है। ऐसी शक्ति जो उसके अंदर मन के गहराई में छिपी रहती है। और यह प्रयास शुरु हो जाने पर वह धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व का एक हिस्सा बन जाती है। और कालांतर में वही शक्ति उसका व्यक्तित्व बन जाती है। कारण आत्मबल विकास यह कभी भी किसी बाहरी उपचार की अपेक्षा अंदर से ही होता है। स्त्री को जब उसके अंदर की क्षमता का पता चल जाता है तब वह उसके अंदर जागृत होनेवाले आत्मविश्वास के साथ, उत्साह के साथ अपने जीवन की ओर देखने लगती है। मात्र अब जीवन की ओर देखने का उसका दृष्टिकोन बदल चुका होता है। इसी कारण उसकी पूरी की पूरी जिंदगी ही बदल जाती है। इससे होता यह है कि उसका पूरा जीवन ही बदल जाता है। कारण बदलाव अकसर अंदर मन से करना पड़ता है। स्त्री फिर चाहे वह बेटी हो, पत्नी हो या माँ हो इसमें से वह चाहे किसी भी भूमिका में क्यों न हो वह अपने पारिवारिक डोर को मजबूत करने में , बच्चों का व्यक्तित्व निखारने में अर्थात विकल्पात्मक रूप में एक सशक्त समाज बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मात्र इसके लिए स्वयं उसे अपने अंदर होनेवाली शक्ति का सकारात्मक भाव तथा प्रेम का लेन-देन करनेवाली शक्ति के ताकत का अहसास होना चाहिए। तात्पर्य यह है कि जो तुम्हारे पास है वह तुम्हीं दे सकते हो।

आत्मबल प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना :

सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापू एवं उनकी धर्मपत्नी सौ.नंदा अनिरुद्ध जोशी (नंदाई) इनके मार्गदर्शन के अन्तर्गत स्त्रियों के आत्मबल प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना की गई। ‘श्रीसाईसमर्थ विज्ञानप्रबोधिनी’ नामक इस संलग्न संस्था की ओर से जो भी अनेक उपक्रम किए जाते हैं। उनमें स्त्रियों के लिए किया जानेवाला यह उपक्रम अर्थात ‘आत्मबल’ विकास केंद्र। १९९८ में प्रथम आत्मबल प्रशिक्षण वर्ग की घोषणा की गई। उसमें कुल मिलाकर २८ स्त्रियाँ ही थीं। अब २०१६-१७ तक लगभग १५००-१६०० स्त्रियों ने आत्मबल वर्ग का लाभ उठाया है। औरंगाबाद, जलगांव, नंदुरबार ऐसे दूर बसे गाँवों से आकर इस प्रशिक्षण वर्ग का लाभ उठानेवाली स्त्रियाँ भी हैं। मुंबई के साथ-साथ ही पुना में भी यह वर्ग लिया जाता है।

सौ.नंदा अनिरुद्ध जोशी (नंदाई) परिचय :

पिछले कई वर्षों से डॉ.सौ. नंदा आत्मबल विकास स्त्रियों के लिए उनका आत्मविकास एवं आंतरिक शक्ति को बढ़ानेवाला उपक्रम यशस्वी रूप में संचालित करती चली आ रही हैं। उन्होंने मुंबई विद्यापीठ से बायोकेमिस्ट्री में उपाधि प्राप्त की है। इसके साथ ही आयुर्वेद एवं निसर्गोपचार (नैचरोपॅथी) इन विषयों पर उनका प्रभुत्व है। उन्होंने ब्रेलभाषा में भी प्राविण्य प्राप्त किया है। इसके साथ ही उन्होंने स्वयं तीन वर्षों तक ब्रेल भाषा भी सिखायी है। उन्हीं के मार्गदर्शन में लिया जानेवाला यह आत्मबल प्रशिक्षण वर्ग स्त्रियों की आंतरिक शक्ति एवं आत्मविश्वास का विकास करके इन दोनों गुणों को दृढ़ करती हैं। और इसी के अनुसार वे स्त्रियों को धीट, स्वावलंबी एवं स्वयंपूर्ण बनने में मदद करती हैं। वे उन्हें उनकी नयी पहचान बनाने में सहायता करती हैं। अंग्रेजी भाषा का जरा सा भी ज्ञान न होनेवाली स्त्रियों को भी दैनिक व्यवहार में उपयोग में आ सके इतनी अंग्रेजी भी स्वयं डॉ.सौ. नंदा अनिरुद्ध जोशी सिखलाती हैं।

आत्मबल की रूपरेखा :

डॉ.सौ.नंदा अनिरुद्ध जोशी ने अत्यधिक मेहनत से इस कोर्स को तैयार किया है। हर सप्ताह को एक सत्र इस तरह से यह कोर्स छह महीनों तक चलता है। किसी एक विषय से संबंधित यह एक छोटा सा विधान, चर्चासत्र, प्रोजेक्ट एवं प्रेजेंटेशन इस प्रकार के अनुसंधान इस कोर्स का मनोरंजक हिस्सा होते है; जिसका अध्ययन करते हुए एक ओर तो इस कोर्स की विद्यार्थिनियों का बाह्य जगत्‌ के साथ संपर्क साध्य होता है वहीं दूसरी ओर उनका स्वयं के साथ संवाद भी शुरु होता है। कोर्स का मूलभूत स्वरूप यदि प्रतिवर्ष वही होता है, फिर भी  थीम मात्र प्रासंगिक महत्त्व के मुद्देनुसार भिन्न-भिन्न होती है।

सुनियोजित जीवनशैली अकसर सुखदायी एवं सुसंबद्ध होने के कारण इस कोर्स में अन्य कौशल्यों के साथ ही समय का सदुपयोग करने की कला, जिसके अन्तर्गत घर एवं ऑफिस इन दोनों ही जिम्मेदारियों को संभालने में स्त्रियों की जो भाग-दौड़ होती रहती है उसमें संतुलन कैसे प्राप्त करना है, एक साथ ही हो सकनेवाले अनेक काम प्रभावी रूप में कैसे करना चाहिए (मल्टीटास्किंग) इस संबंध में विशेष मार्गदर्शन प्रदान किया जाता है।

अंग्रेजी भाषा में संभाषण करते आना यह केवल ज़रूरत ही नहीं बल्कि यह एक आवश्यक अंग माना जाता है। अंग्रेजी में बातचीत करने से इस दुनिया में अनेक लोगों के संपर्क में आने पर आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। इस बात पर गौर करते हुए इस कोर्स के अन्तर्गत अंग्रेजी संभाषण पर विशेष जोर दिया जाता है। जिन स्त्रियों को अंग्रेजी भाषा की जानकारी होती है, परन्तु अभ्यास न होने के कारण उन्हें बोलने में झिझक होती है। उन्हें उसी के अनुसार प्रशिक्षण दिया जाता है।

कोर्स समापन का समय जब नजदीक आ जाता है तब एक दिन सायं समय में संगीत एवं अन्य कार्यक्रमों को प्रस्तुत करने का आयोजन किया जाता है। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत इस कोर्स की सभी विद्यार्थिनियाँ – उम्र, व्यवसाय आदि विषय में कोई भी भेदभाव न करते हुए इसमें भाग लेती हैं। इस आयोजन का  उद्देश्य यही होता है कि जो स्त्रियाँ अपने में कुछ कमी है इस हीन भावना के कारण अपने अंदर की कला को दबाकर रखती है तथा उनमें होनेवाली कमजोरी एवं स्टेजफिअर को दूर करने के लिए ही इसका आयोजन किया जाता है।

डॉ.सौ.नंदा अनिरुद्ध जोशी स्वयं उपस्थित रहकर हर एक सत्र का संचालन करती हैं तथा हर वर्ष के कोर्स का अभ्यासक्रम तैयार करने में भी उनका सक्रिय सहभाग होता है। इतना ही नहीं बल्कि हर वर्ष के कोर्स के अंत में यह जो कार्यक्रम तैयार किया जाता है उसमें प्रस्तुत होनेवाले छोटे-छोटे मनोरंजक, कार्यक्रमों का दिग्दर्शन भी वही करती हैं।

आत्मबल महोत्सव :

आत्मबल के ऐसे तेरह बैचेस पूर्ण होने पर नंदाई ने पहले कभी भी नहीं हुआ था इस प्रकार का भव्य दिव्य ‘आत्मबल महोत्स्व’ का आयोजन किया था। सभी स्त्रियों का एकात्मिक भाव, उनका सद्‌गुरु के प्रति होनेवाला प्रेम, आदर, भक्ति आदि सभी भावनाविष्कार उनके द्वारा दिए जानेवाले मानवंदना से साकार हुआ।