जब शरीर के लिए आवश्यक एक बार का भोजन भी उपलब्ध नहीं होता, तब चिकित्सा उपचार लेने के बारे में सोचना भी विलासिता कहनी पड़ेगी। गरीबी के कारण शिक्षा से अनजान रहने से (नहीं मिलती, इसलिए) स्वच्छता जैसी महत्वपूर्ण चीजों को अनदेखा किया जाता है। पर्याप्त भोजन न मिलने की वजह से कुपोषण होता है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं जटिल होती जाती हैं। भारत में  सबसे अधिक कुपोषण की समस्या है, ऐसा इन रिपोट का मानना हैं। भले ही तेजी से विकास हो रहा है, शहर और गांव नजदीक आ रहे हैं, लेकिन हालात में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। ग्रामीण और दुर्गम इलाकों में छोटे बच्चे और महिलाओं में कुपोषण, कमजोरी, रक्ताल्पता जैसी समस्याएँ अभी भी बड़े पैमाने पर कायम हैं। इस बात से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता है कि, इन समस्याओं से जुड़ी स्वास्थ्य विषयक समस्याओं की सूचि बढ़ती जा रही है।

हालांकि, सही दिशा में और वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ, प्रयास करेंगे तो, ऐसी समस्याओं की स्थिति वाले इलाकों की परिस्थिति को बदला जा सकता है और यह डॉ. अनिरुद्ध धैर्यधर जोशी अर्थात सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी ने (बापुंनी) कर दिखाया है।

सन २००४ से कोल्हापुर शहर से ३० किलोमीटर की दूरी पर स्थित पेंडाखले इस छोटे से गाँव से स्वास्थ्य शिविर आयोजित करने की शुरुआत सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी की प्रेरणा से हुई।

आजचौदह सालों बाद, पेंडाखले और आसपास के गांवों में परिस्थिति पूरी तरह से बदल गई है। श्रीअनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन, दिलासा मेडिकल ट्रस्ट ऍण्ड रिहॅब्लिटेशन सेंटर, श्रीअनिरुद्ध आदेशपथक, अनिरुद्धाज हाऊस ऑफ फ्रेंडस व संलग्न संस्थाएं एक होकर व्यापक प्रमाण में इस ‘कोल्हापुर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य शिविर’ का आयोजन करते हैं।

‘’कोल्हापुर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य शिविर’’ की व्यापकता, इसके लिए संस्था के श्रद्धावान कार्यकर्ताओं ने किया हुआ सर्वेक्षण, अभ्यास, रचना और नियोजन यह सब चीजें देखकर हम चकित हो जाते हैं। देश में कई जगहों पर विविध संस्थाएं स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन करती हैं। लेकिन ‘’कोल्हापुर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य शिविर’’ का उद्देश्य केवल स्वास्थ्य जांच और मुफ्त औषधियाँ बाँटना यहाँ तक ही सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य विषयक समस्याओं की जड़ को उखाड़ना है। बीमारी होने के बाद इलाज करने से अच्छा है, बीमारी को प्रतिबंधित करने वाले इलाज करना, इस मूलमंत्र का इस शिविर में जतन किया गया है। इसके लिए शिविर का आयोजन करने से पहले शास्त्रशुद्ध अभ्यास किया जाता है, साथ ही साल भर तक फॉलो अप लिया जाता है। सभी समस्याओं का सर्वंकष विचार किया जाता है।

स्वास्थ्य शिविरके लिए पेंडाखले गांव को ही क्यों चुना गया? यह सवाल उठ सकता है। कोल्हापुर शहर से सिर्फ तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित पेंडाखले और आस-पास के गांवों में कुपोषण और स्वास्थ्य की समस्या भयंकर थी। अधिकांश गांववाले आर्थिक समस्याओं से पीड़ित थे। यहाँ के नागरिकों का रहन सहन शिविर आयोजित के लिए आवश्यक मानदंडों में बैठता था। इसके अलावा, कोल्हापुर और आसपास के क्षेत्रों में संगठन की बड़ी संख्या में संस्था के अनुशासित कार्यकर्ता थे, इसलिए इस क्षेत्र का चयन किया गया था। यह शिविर सन २००४ को पहली बार पेंडाखले के पास स्थित करंजफेण गांव में आयोजित किया गया थाऔर सन 2005 से इस शिविर का आयोजन पेंडाखले गाँव में किया जाने लगा।

सद्गुरु श्री अनिरुद्ध अर्थात डॉ. अनिरुद्ध धैर्यधर जोशी स्वयं एम. डी. (मेडिसिन) हैं। सन 1985 से दिलासा मेडिकल ट्रस्ट के माध्यम से अपने सामाजिक कार्यों का शुभारंभ करने वाले बापू ने संस्था के माध्यम से विविध सामाजिक उपक्रमों को शुरू किया है। इसमें चिकित्सा शिविर महत्वपूर्ण उपक्रम है।

कोल्हापुर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य शिविर से पहले धुले जिले के आदिवासीबहुल इलाके वाले ‘मेथी’ में संस्था की तरफ से चिकित्सा एवं स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया जाता था। इस वजह से यहाँ के आसपास के आदिवासियों की बस्तियों में स्वास्थ्य स्थिति में सुधार आया। यह गाँव स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सजग हो गया। गांववालों में एक अलग तरह का आत्मविश्वास निर्माण हो गया है। इसके बाद ‘कोल्हापुर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य शिविर’ शुरू किया गया। ‘मेथी’ में कुछ सालों से आयोजित किए जा रहे चिकित्सा शिविर का अनुभव तो साथ था ही। इन्हीं अनुभवों के बलबूते पर ही शास्त्रशुद्ध तरीके से सर्वेक्षण करके ‘कोल्हापुर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य शिविर’ का आयोजन किया जाने लगा।

यह शिविर दो दिनों का रहता है। लेकिन पूर्व व्यवस्था पूरे साल भर चलती है। इस शिविर के लिए लगभग 4,000श्रद्धावान तैयार रहते हैं, उनमें से लगभग 1000 मुंबई से आते हैं। इसमें प्रवीण डॉक्टर्स, पैरामेडिकल स्टाफ भी रहता है।

अस्वास्थ्य की स्थिति बीमारी को आमंत्रित करती है और वह निर्माण होती है गलत आदतों की वजह से। इस शिविर के शुरुआत में किए गए सर्वेक्षण से यह सामने आया है कि अस्वच्छ पानी, खुलेपर शौच, सिर्फ परिसर की ही नहीं बल्कि स्वयं के शरीर की भी अस्वच्छता इस वजह से बीमारी को सहज निमंत्रण मिल रहा था। उसमें भी गलतपहमियां, उस वजह से आने वाला अस्वास्थ्य इन सभी चीजों को ध्यान में रखकर सिर्फ चिकित्सा सुविधाएं ही नहीं, बल्कि जरुरतमंदों को दवाइयों का और नित्य उपयोगी चीजों का, छात्रों को यूनिफार्म और क्रीड़ा सामग्री आदि का बंटवारा किया जाता है।गाँव के परिवारों की संख्या, किस इलाके में इस तरह की चीजों को आपूर्ति की आवश्यकता है, इसका उचित सर्वेक्षण किया जाता है। उसके बाद शिविर की तैयारी शुरू की जाती है। यह काम सालभर तक चलता है और दो दिनों के शिविर में बहुत ही नियोजनबद्ध और अनुशासन बद्ध तरीके से, बगैर किसी गड़बड़ी के पूरा आयोजन होता है।

गांववालों को दंतमंजन, साबुन, जल शुद्धिकरण की दवाई, जुओं की औषधि, चद्दर, कपडे, बर्तन जैसी चीजें बांटी जाती हैं।लड़कियों के बालों में जटाँए न हो इसके लिए कंघी का भी प्रमुख रूपसे समावेश किया जाता है। साथ ही उनको स्वच्छता के बारे में मार्गदर्शन भी किया जाता है।महिलाओं के लिए साड़ियाँ (नौ वार और छः वार), कंगन और बिंदियों का भी वितरण किया जाता है।

यह वितरण शिविर के पहले दिन होता है। सुबह जल्दी वितरण की शुरुआत होती है। सर्वेक्षण किए गांवों में टेंपो में सामान भरके श्रद्धावान कार्यकर्ता जाते हैं। गांवके हर एक परिवार के नाम से बोरी बनाई जाती है। सन २०१७ में ९२ गावों के ८७६६ परिवार वालों में वितरण किया गया था। उसीके साथ ही अन्य कई आवश्यक वस्तुओं का भी वितरण किया जाता है। दिनभर की मेहनत के बाद जब श्रद्धावान वापस शिविर में आते हैं, तब उनको श्रमपरिहार के तौर पर सत्संग का आयोजन किया जाता है।

दूसरे दिन चिकित्सा शिविर की शुरुआत होती है। सुबह से ही गांववाले और स्कूल के छात्र पेंडाखले को आने लगते हैं। इस शिविर में कोल्हापुर के बहुत से स्कूलों के छात्र आते हैं।छात्र अपने शिक्षकों के साथ आते हैं। छात्रों को मुफ्त में यूनिफार्म दिए जाते हैं। यह यूनिफार्म बनाने के लिए सद्‌गुरुश्रीअनिरुद्ध के श्रद्धावान मित्र चरखा योजना के अंतर्गत चरखा चलाकर लड़ियाँ बनाकर देते हैं। इन लड़ियों का कपड़ा तैयार होता है और उससे यूनिफार्म बनाकर छात्रों को मुफ्त में बांटा जाता है। श्रमदान से निर्माण होने वाले ये यूनिफार्म इन छात्रों के भविष्य में अद्‍भुत परिवर्तन ला सकते हैं, इसका अनुभव ‘’कोल्हापुर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य शिविर’’ में बार-बार आता है। छात्रों को मुफ्त में चप्पलें भी दी जाती हैं।शिविर का इस इलाके में आयोजन होने से पहले ये गाँववाले नंगे पाँव घूमते थे। छोटे बच्चों ने कभी भी पैरों में स्लिपर्स नहीं पहने थे। इसी वजह से पहली बार पैरों में पहनने के लिए उन्हें नई चप्पलें मिली।तब कई बच्चों के चेहरे पर ख़ुशी और प्रेम दिखाई दे रहा था।

शिविर में छात्र-छात्राओं को मुफ्त में टोपियाँ भी बांटी जाती हैं। इन स्कूलों की और स्कूलों से आने वाले हर बच्चों का नाम दर्ज किया जाता है और उनकी मुफ्त में चिकित्सा जाँच आदि की जाती है। साथ ही बच्चों को सुखा मेवो की पाकिटे दी जाता है, ताकि उनको उचित पोषक तत्व मिल सकें। इसके बाद बच्चों को मोमबत्तियाँ और माचिसें बाँटीं जातीं हैं, जिस वजह से रात होने के बाद बिजली जाने पर भी ये छात्र अभ्यास कर सकें। ये माचिसें और मोमबत्तियाँ सद्गुरुश्रीअनिरुद्ध की १३ कलमी योजना के ‘विद्याप्रकाश’ इस योजना के अंतर्गत बांटी जाती हैं।

इसीके साथ ही उनके स्कूलों में खिलौनों का एक सेट भी दिया जाता है। जैसे कूदने की रस्सियाँ, रिंग्स, फ्रिसबीज,क्रिकेट सेट इत्यादि। ताकि बच्चे स्कूल जाकर अपनी शिक्षा प्राप्त करें और आनेवाली भारतीय पीढ़ी अधिक सक्षम और मजबूत बन सके इस लिए शिबिर का यह शैक्षणिक पहलू बहुत महत्वपूर्ण है। इस शिविर के लाभार्थि दो बच्चों ने आज अपनी वैद्यकीय शिक्षा पूरी की है। यही बात इस शिविर की सफलता को बताने के लिए पर्याप्त है।

इन सभी वस्तुओं को बाँटने का निर्णय लेने से पहले बहुत सोच-विचार किया गया है। यहां एक उदाहरण देखा जा सकता है, जूँ की दवाइयां और कंघी का वितरण। बालों में कंघी का उपयोग न करनेके कारण बालों में जटाएँ बनने का खतरा बना रहता है। अगर छोटी लड़कियों के सिर में ऐसी जटाएँ निर्माण हुई तो, उनकी प्रथानुसार वहाँ देवदासी बनाने की पुरानी परंपरा थी। लेकिन बालों में जटाएँ होती हैं बालों को स्वच्छ न रखने की वजह से, अच्छी तरह से कंघी न करने की वजह से। जुओं की दवाई और कंघियों का वितरण करने की वजह से कई लड़कियाँ इस पुरानी परंपरा का शिकार होने से बच गईं हैं। इससे, इस साधारण चीज़ो के बाँटे जाने का महत्व भी उजागर होता है।

आसपास के गांवों के कई गांववाले इस शिविर में आते हैं। आम तौर पर, हर साल 10 से 12 हजार रोगी पंजीकृत होते हैं। चिकित्सा विभाग में, रोगियों की मुफ्त में चिकित्सा की जाती है। उनका औषधि से इलाज किया जाता है। इसमें सामान्य जाँच से लेकर एक्स-रे तक की भी सुविधा प्रदान की जाती है। ज़रूरतमंदों की आँखें जांचकर चश्मे मुफ्त में दिए जाते हैं। इस चिकित्सा विभाग में ईसीजी भी शामिल है। उसीके साथ ही दंत चिकित्सा सेवा भी दी जाती है। वर्ष 2017 में, 15 हजार से अधिक रोगियों की मुफ्त में जाँच की गई थी। 133 स्कूलों के कुल 9,348 छात्रों की जांच की गई।

शिविर में आने वाले प्रत्येक लाभार्थी को अन्नपूर्णा महाप्रसादम के तहत मुफ्त भोजन मुहैया कराया जाता है। शिविर के लिए सुबह जल्दी उठकर अपने गाँव से निकलकर भूखे पेट धूप में, दूरसे आए लाभार्थियों को अन्नपूर्णा प्रसादम जैसे एक कार्यक्रम होता है। मनमुराद पेटभर खाना खाने वाले गांववालों और छात्रों को देखने के बाद मन तृप्त हो जाता है। शिविर में लगभग ५०००० से अधिक गांववाले खाना खाते हैं। इनको प्यार और आग्रह से खाना परोसा जाता है। उतने ही प्रेम से बड़े बड़े बर्तनों में यह खाना बनाया जाता है। सैंकड़ों स्वयंसेवक इस सेवा के लिए श्रमदान करते हैं।

इस शिविर के कारण, इस क्षेत्र की तस्वीर बदल गई है। नागरिक स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में जागृत हुए हैं। उन्हें स्वच्छता का महत्व समझमें आया है। ग्रामीणों की स्वास्थ्य समस्याओं में काफी कमी आई है। गांववालों ने शरीर और परिसर की सफाई का महत्व समझकर स्वच्छता की आदत अपनाई है। कुष्ठ रोगियों की संख्या में काफी कमी आई है। संक्रामक रोगों की संख्या में कमी आई है। दूषित पानी से होने वाली बीमारियां पूरी तरह से नष्ट हो गई हैं। हर साल इस शिविर का लाभ लेने वाले गांव और स्कूलों की संख्या बढ़ गई है।

शिविर में शामिल हुए स्कूलों में छात्रों की संख्या बढ़ गई है। इतना ही नहीं, स्कूलों के परिणाम भी अच्छे आ रहे हैं। ग्रामीणों के पास परिवार नियोजन का अच्छा ज्ञान है। स्त्री रोग विशेषज्ञ भी इनकी जागरूकता से संतुष्ट हैं। ऐसे कई मुद्दों का उल्लेख किया जा सकता है।

बापू अर्थात सद्गुरु श्री अनिरुद्ध की सामाजिक कार्य की नींव, हमेशा भक्ति और आध्यात्मिकता है। बापू कहते हैं कि निःस्वार्थ सेवा भक्ति के आधार पर खड़ी हो सकती है। ‘कोल्हापुर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य शिविर’ भक्ति और सेवा इन दो पैरों पर पर खड़ा है। इस रास्ते का इस्तेमाल करके जीवन की तरफ सकारात्मक दृष्टि से देखना सीखे बहुत से गांववाले इस शिविर में शामिल होते हैं, उस समय बापू की सीख की ताकत समझमें आती है।सद्गुरु बापू की अर्थात श्रीअनिरुद्धजी की सामान्य जन और गरीबों के प्रति चिंता भी उनके द्वारा शुरू किए गए उप्रकमों से पता चलती है।