प्रस्तावना :

“संपूर्ण विश्व को सुखमय बनाकर, आनंद भर दूँगा तीनोंही लोक में।” यह ब्रीदवाक्य लेकर ग्रामीण विभाग के पिछले हुए ज़रूरतमंद लोगों को आधार एवं दिलासा देने के कार्य को श्रीअनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन ने अपना लिया है। फाऊंडेशन के अनेक कार्यों में से एक अद्वितीय एवं विस्तृत प्रोजेक्ट अर्थात कोल्हापूर एवं आरोग्य शिविर।

(बैनर / लोगो)

२००४ से शुरु हुये इस शिविर का लाभ लेनेवाले गाँवों का, पाठशालाओं का अब तो कायापलट ही हो चुका है। पहले फटेपुराने कपड़े, त्वचा रोगों से त्रस्त, कुपोषित बच्चे एवं अत्यन्त अस्वच्छ लगनेवाले गरजू लोगों में आमूलाग्र बदलाव होता हुआ दिखाई देता है। स्वच्छता एवं ठीक-ठाक से रहने की वृत्ति इसके साथ अच्छी आदतें, शारीरिक, शैक्षणिक एवं अध्यात्मिक उन्नति यही इस शिविर के सफलता का प्रमाण है।

कोल्हापूर वैद्यकीय एवं आरोग्य शिविर आयोजन:

श्रीअनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन, दिलासा मेडिकल ट्रस्ट आणि रिहॅबिलिटेशन सेन्टर, श्रीगुरु उपासना फाऊंडेशन, श्रीअनिरुद्ध आदेश पथक, अनिरुद्ध हाऊस ऑफ फ्रेन्डस्‌. एक साथ मिलकर इस शिविर का आयोजन करते हैं। साधारणत: प्रतिवर्ष जनवरी, फरवरी महीने में इस दो दिवसीय शिविर का आयोजन किया जाता है। आरंभिक काल में इस शिविर का आयोजन करंजफेन नामक इस गाँव में किया गया। इसके पश्चात्‌ मात्र २००५ से इस शिविर का अयोजन शाहुवाड़ी तहसील के पेंडाखले नामक गाँव में किया गया।

कोल्हापूर के ही बिलकुल कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर बसे हुए गाँवों की परिस्थिती अति बिकट थी। बारीकी से सर्वेक्षण, संशोधन एवं निरीक्षण करने के पश्चात्‌ ही यह बात संस्था के ध्यान में आई और कोल्हापूर के आस-पास के गाँवों में इस शिविर का आयोजन किया जाना तय हुआ।

कोल्हापूर वैद्यकीय एवं आरोग्य शिविर पूर्व तैयारी :

लगभग १० एकड़ खेतीहारी जमीन पर इस कैंप का आयोजन किया जाता है। जिसमें से मंडप का विभाग यह लगभग ८० हजार स्क्वेअर फीट का होता हैं। पेंडाखले गाँव के ग्रामवासी एक साथ मिलकर हर साल यह शेत जमीन उपलब्ध करके देते हैं। इसके लिए जमीन की साफ-सफाई करके उसे समतल बनाकर वे स्वयं ही इस जमीन को तैयार रखते हैं। इस जमीन को स्वच्छ एवं सामान्य बनाने के लिए साधारणत: ८०० ग्रामवासी इस सेवा कार्य के लिए उपस्थित रहते हैं। कैंपसाईट की पूर्व तैयारी वैसे तो कैंप के कुछ दिन पहले से ही शुरु हो जाती है। वैसे यदि देखा जाए तो इस कैंप की पूर्व तैयारी वर्षभर चलती ही रहती है। एक कैंप के समाप्त होते ही आनेवाले दूसरे साल की तैयारी वहाँ पर पुन: शुरु हो जाती है। उसमें पहलेवाले कैम्पस का लेख-जोखा, कुछ नये सुधार, फॉलोअप्स से सर्वेक्षण इन सभी बातों का समावेश होता है।

शिविर की यशोगाथा :

इस शिविर का आयोजन करते समय भी लाभार्थी ग्रामवासियों के अच्छे आरोग्य के साथ ही साफ़सफ़ाई की आदतें कैसे बदलेंगी इसकी और भी विशेष ध्यान दिया गया। इसके लिए बिलकुल स्नान करनेवाले साबुन से लेकर सिर के बालों में पड़नेवाले जूँओं की औषधि तक हर एक आवश्यक चीजों को उन्हें दिया गया। जैसे-जैसे ग्रामवासियों को स्वच्छ एवं ठीक-ठाक रहने की आदत पड़ने लगी, वैसे-वैसे ही उन गाँवों की कायापलट होती गयी।

इस शिविर के सकारात्मक परिणाम अग्रीम प्रकार से है :

१) ग्रामवासियों की आरोग्य से संबंधित शिकायतें काफी हद तक कम हो गई हैं।

२) ग्रामवासियों को शारीरिक एवं पर्यावरण संबंधित स्वच्छता का महत्त्व पता चल गया है। और उन्होंने स्वच्छता बनाये रखने की आदतों को भी आत्मसात कर लिया है।

३) लेप्रसी के रुग्णों की संख्या भी विशेषतौर पर कम हो चुकी है।

४) संसर्गजन्य रोगों का प्रमाण भी कम हो चुका है।
५) दूषित जल से होनेवाली बीमारियाँ भी पूर्णत: नष्ट हो चुकी हैं।

६) प्रतिवर्ष इस शिविर का लाभ लेनेवाले गाँवों की एवं पाठशालाओं की संख्या बढ़ चुकी है।

७) शिविर का लाभ उठानेवाली पाठशालाओं में विद्यार्थियों की संख्या भी बढ़ चुकी है इतना ही नही तो पाठशालाओं का रिज़ल्ट भी काफ़ी अच्छा निकल रहा है।

८) परिवार नियोजन इस संबंध में भी ग्रामवासियों को अच्छी जानकारी है। उनमें होनेवाली जागरूकता के प्रति गायनोकोलॉजीस्ट समाधान व्यक्त करते हैं।

कोल्हापूर वैद्यकीय एवं आरोग्य शिविर की रूपरेखा :

यह शिविर दो दिवसीय होता है। इस शिविर के लिए आज लगभग ४००० सेवेकरी सज्ज रहते हैं। उनमें से लगभग १००० सेवेकरी मुंबई और पुणे से जाते हैं। इसके साथ ही डॉक्टर्स, पॅरामेडीकल स्टाफ भी होता है।

शिविर के पहले दिन सुबह के समय वस्तुओं को बाँटने का कार्य आरंभ हो जाता है। अर्थात सर्वेक्षण किए गए गाँवों में टेंपो भरकर वस्तुओं की गठरियाँ सेवेकरी ले जाते हैं। गाँव के हर एक परिवार के नाम से एक-एक गठरी बनायी गई होती है। २०१७ साल में ९२ गाँवों में ८७६६ परिवारों को उनके जरूरत की चीजें बाँटी गईं। दिनभर की मेहनत के पश्चात्‌ सेवा करनेवाले पुन: शिविर में लौटते हैं तब वहाँ पर सत्संग का आयोजन किया जाता है।

दूसरे दिन वैद्यकीय शिविर का आरंभ होता है। प्रात:काल से ही ग्रामवासी एवं स्कूली बच्चे आदि पेंडाखले गाँव में आने लगते हैं। भोजन के समय अन्नपूर्णा महाप्रसादम्‌ शुरु होता है। ठीक शाम ७ बजे तक वैद्यकीय शिविर का सेवाकार्य लगातार चलता रहता है। तदनंतर सभी कार्यकर्ता अपने-अपने गाँवों में लौट जाते हैं। इन कार्यकर्ताओं के पास भी निकलते समय एक विशेष प्रकार की गठरी होती है विलक्षण अनुभवों एवं समाधान की।

कोल्हापूर वैद्यकीय एवं आरोग्य शिविर का पहलू :

वैद्यकीय पहलू :

इस शिविर में आस-पास के गाँवों के अनेक ग्रामवासी आते हैं। साधारणत: दस से बारह हजार रूग्णों के नाम हर साल दर्ज किए जाते हैं। इनमें सामान्य जाँच से लेकर एक्स-रे की भी सुविधा की गई होती है। ज़रूरतमंद लोगों के आँखों की जाँच करके उन्हें चश्मा भी मुफ्त में दिया जाता है। ई सी जी का भी समावेश इस वैद्यकीय विभाग में किया गया होता है। इसके साथ ही दंतचिकित्सा सेवा भी उपलब्ध रहती है। २०१७ में लगभग १५ हजार से अधिक रूग्णों की जाँच नि:शुल्क की गई। वहीं १३३ पाठशालाओं के कुल मिलाकर ९३४८ विद्यार्थियों की वैद्यकीय जाँच की गई।

इस शिविर के आरंभ से ही वैद्यकीय पहलू का संपूर्ण लेखा-जोखा आगे दिए गए इन्फोग्राफीक में देखा जा सकता है।

(इन्फोग्राफ)

आरोग्य पहलू :

इस शिविर के आरंभ में किए गए सर्वेक्षण से इस बात का पता चलता है कि अस्वच्छ पानी, खुली जगहों पर शौच, पर्यावरण में ही अस्वच्छता नहीं बल्कि शरीर भी अस्वच्छ इन्हीं कारणों से बीमारियों को खुले आम आमंत्रित किया जाता था। इसी कारण गाँवों-गाँवों में जीविकापयोगी हर एक वस्तु को हर एक परिवार में बाँटा जाता है। इनमें दंतमंजन, साबुन, पानी शुद्ध करने की औषधि, जूँओं को मारने की औषधि, गुदड़ियाँ, बरतन इस प्रकार की वस्तुएँ दी जाती है। ये वस्तुएँ हर एक परिवार की ज़रूरत के अनुसार ही उन्हें दी जाती है। लड़कियों के बालों में लट न पड़ने पाये इसके लिए कंघी का समावेश भी विशेष तौर पर किया जाता है। इसी के साथ उन्हें स्वच्छता के संबंध में भी मार्गदर्शन किया जाता है। इन सभी प्रयासों के कारण आज अनेक गाँवों में सुधार दिखाई देता है। बीमारियों का प्रमाण भी काफी हद तक कम हो गया है।

शैक्षणिक पहलू :

इस शिविर के अन्तर्गत कोल्हापूर की सौं से भी अधिक पाठशालाओं का समावेश होता है। पाठशालाएँ अर्थात उसमें पढ़नेवाले विद्यार्थी अपने शिक्षकों के साथ आते है। इन विद्यार्थियों को मुफ्त में चपलों, टोपियों आदि को भी बाँटा जाता है। इन पाठशालाओं एवं उसमें से आनेवाले विद्यार्थियों का नाम दर्ज किया जाता है और उन विद्यार्थियों की मुफ्त में वैद्यकिय जाँच की जाती है। इन विद्यार्थियों को आवश्यकतानुसार विटामिन की औषधियाँ भी मुफ्त में दी जाती हैं।

माता-पिता की परिस्थिती भी इतनी अच्छी नहीं होती कि वे उन्हें नये गणवेश खरीदकर दे। कई बार बच्चों को बगैर जूते-चप्पलों के ही पाठशाला जाना पड़ता। गाँवों में बिजली की योग्य सुविधा न होने के कारण अँधेरा होने पर बच्चे पढ़ नहीं पाते हैं इन सभी बातों को मथ्ये नज़र रखते हुए बच्चों के लिए आवश्यक चीजों का इंतजाम करके उनमें बाँटा जाता हैं। जैसे बच्चों के लिए सूखे मेवो की पाकीट तैयार की जाती है ताकि उनकों योग्य पोषक तत्त्व प्राप्त हो सके। इसके साथ ही मोमबत्ती, माचिस की डिबिया ये सभी चीज़ें ‘श्रीअनिरुद्ध विद्याप्रकाश योजना’ के अन्तर्गत बाँटी जाती है।

विद्यार्थियों को मुफ्त में गणवेश दिए जाते हैं। इनके गणवेशों को तैयार करने के लिए श्रीअनिरुद्धजी के श्रद्धावान मित्र ‘चरखा योजना’ अन्तर्गत चरखा चलाकर लड़ियाँ बनाकर देते हैं। इन लड़ियों से कपड़ा तैयार किया जाता है और उन्हीं कपड़ों से गणवेश तैयार करके इन विद्यार्थियों में मुफ्त में बाँटा जाता है।

इतना ही नहीं बल्कि उनकी पाठशालाओं को भी खिलौनों का सेट दिया जाता है। जैसे – कूदनेवाली रस्सी, रिंग्स, फुटबॉल, फ्रीसबीज, क्रिकेट का सेट आदि। इस ग्रामीण भारतीय पीढ़ी की प्रगति हो, बच्चे पढ़लिखकर सक्षम एवं सुदृढ़ बन सके इसीलिए इस शिविर का यह शैक्षणिक पहलू काफ़ी अधिक महत्त्वपूर्ण साबित होता है। इस शिविर के लाभार्थी दो बच्चे अपनी वैद्यकीय शिक्षा ले रहे है यह उदाहरण ही इस शिविर की सफ़लता को उजागर करने के लिए काफ़ी है।

शैक्षणिक पहलू का लेखा-जोखा दर्शानेवाला इन्फ़ोग्राफीक आगे दिया गया है।

(इन्फोग्राफ)

अन्नपूर्णा महाप्रसादम् :

शिविर में आनेवाले हर एक लाभार्थी को अन्नपूर्णा महाप्रसादम्‌ के अन्तर्गत नि:शुल्क भोजन दिया जाता है। धूप-ताप में दूर से इस शिविर में आनेवाले समस्त लाभार्थियों के लिए अन्नपूर्णा महाप्रसादम्‌ मानो किसी पर्व के समान ही होता है। जी भर के, पेटभर भोजन करनेवाले इन ग्रामवासियों एवं विद्यार्थियों को देखकर मन तृप्त हो उठता है। इस शिविर में लगभग पचास हजार के करीब लोग भोजन करते हैं। इन्हें प्रेमपूर्वक आग्रह के साथ भोजन करवाया जाता है।

अध्यात्मिक पहलू :

अध्यात्म अर्थात सीधी-साधी शुद्ध पवित्र भक्ति। भगवान के प्रति होनेवाला प्रेम दिखाई देता है। इसके साथ ही इन ग्रामवासियों के जीवन का नंदनवन बना देनेवाले डॉ. अनिरुद्ध मात्र इन ग्रामवासियों के लिए एक अजीब रसायन बन गए हैं। बापूजी को प्रत्यक्ष रूप में न देखने के बावजूद भी उन्हीं के प्रेम में खुशी से ओत-प्रोत होकर प्रवाहित होनेवाला प्रेम इस शिविर में दिखाई देता है।