बारामास खेती चारा योजना की आवश्यकता :

किसानों की आत्महत्या बहुत ही दुखदाई और संवेदनशील विषय है। कृषिप्रधान भारत के किसानों की स्थिति बहुत ही दर्दनाक है। कर्ज के पहा़ड़, पानी की कमी, सृष्टि का प्रकोप, खेती के गलत तरीके और अन्य कई कारणों की वजह से आज का किसान बड़ा ही बेहाल है। किसान जमीनें, मवेशियों को बेचकर कर्जों से छुटकारा पाना चाहते हैं, मगर उनका अंत आत्महत्या जैसे गलत तरीकों से हो रहा है। मेहनत आदि से किसान पुन: अपना जीवन संवार सकते हैं मगर सूखे के रहते वे बेबस हो जाते हैं। सूखा पड़ता है तो पशु चारे के दाम में बिकते हैं, और चारा सोने के दाम में खरीदना पडता है। यह हमारे ग्रामीण भारत की सत्यस्थिति है। संपूर्णरूप से बारिश पर निर्भर रहनेवाली हमारी खेती बारिश के अभाव में दीन-हीन हो जाती है। ऐसे में जीवन निर्वाह के लिए किसानों पर अपने पशु बेचने की नौबत आ जाती है। सूखे में पशु भी टिक नहीं पाते, तब किसान उन्हें बेचकर पैसे कमाने का रास्ता चुनते हैं। मगर उसके बाद? क्या पशु उनकी सम्पत्ति नहीं है? पशुओं को बेचने के बाद उनके पास क्या बचता है? इसलिए डॉ. अनिरुद्ध जोशी (सदगुरु श्री अनिरुद्ध बापू) ने इस बारामास खेती चारा योजना की शुरुआत की ताकि, कम से कम सूखाग्रस्त इलाकों के किसान अपने पशुओं को पाल सके, उन्हें संभाल सके।

 

बारामास खेती चारा योजना संकल्पना :

भारतीय अर्थव्यवस्था के इस एक स्तंभ बलीराजा की इस असह्यता की जिम्मेदारी किसकी है? केवल सरकार की या कृषि संघटनाओं की। यह जिम्मेदारी प्रत्येक भारतीय की है, उस प्रत्येक नागरिक की है जिसके पास बडी मात्रा में पानी उपलब्ध है, इस समाज में वह कम से कम दो वक्त का भरपेट भोजन कर सकता है, एक आम आदमी जीवन जी सकता है, उन सभी की ये जिम्मेदारी बनती है कि शहर में रहकर भी हम इन किसानों की सहायता कर सकें ताकि हम उनका पशुधन बचा सकें।

हर किसी का दिल करता है कि वह अपने घर के आसपास एक बगीचा बनाए। और कुछ नहीं तो अपनी गैलरी में कम से कम तुलसी या फिर शोभा का एक पौधा तो होता ही है। इसी के साथ छोटे से गमले में यदि मकई या गन्ना बोएं तो इस उपज का किसानों के पशुओं के लिए चारे के रूप में उपयोग हो सकता है। इसके लिए जरुरत होती है केवल अपनी जिम्मेदारी के अहसास की। पहले से ही पेट भर चारा खायी हुई गायों को १० रुपयों का चारा खिलाने से कही बेहतर है किसानों के मरणप्राय पशुओं के लिए इन्हीं १० रुपयों से भरपूर उगनेवाला चारा प्रदान करना।

 

 

 

बारामास खेती चारा योजना कार्य पद्धति :

१. जिस जिसके लिए सम्भव है वे अपने आंगन में, गैलरी में अथवा छतों पर गमलों में मकई, गन्नें उगा सकते हैं। मकई एवं गन्ना ४५ दिनों में अच्छी तरह से बढ़ जाता है। यह दो-ढाई फुट बढा़ हुआ चारा काटकर पशुओं के लिए भेजा जाता है।

२. इस कार्य में श्रद्धावान भाग लेते हैं और नित्यनेम से चारा श्री हरिगुरुग्राम में या अपने उपासना केंद्र में जमा करते हैं।

३. कुछ उपासना केंद्र उपलब्ध जगह में बडे पैमाने पर चारा उगाते हैं और बड़ी मात्रा में उत्पादन करके श्री अनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन में जमा करते हैं।

४. श्री अनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन में प्राप्त किया गया चारा किसानों तक पहुंचाया जाता है। यह मुफ्त में दिया जाता है।

५. किसानों के पशुओं को चारा मिले तो उनके गोबर से किसान अन्य जोड़-कारोबार कर सकते हैं। इनमें बकरियाँ, गायें या भैंसें हों तो उनके दूध पर भी किसानों का पोषण हो सकता है। इसलिए उनके पास यह पशुधन संभालने हेतु हर स्तर पर प्रयासों की आवश्यकता है।

एआयजीवी का संशोधन – अनिरुद्धाज्‌ इन्स्टीट्युट ऑफ ग्रामीण विकास (एआयजीवी) यह चारा उगाने पर बड़े पैमाने पर संशोधन कर रही है। शहर के लोग इस योजना में बडे़ पैमाने पर शामिल हो पाएं इसलिए हायड्रोपोनिक्स खेती (मिट्टी बगैर खेती) के विभिन्न प्रयोग गोविद्यापिठम, कर्जत में किए जा रहे हैं।

तात्पर्य :

किसानों की स्थिति में सुधार हेतु अनेक मार्गों में से यह एक मार्ग है जोकि किसानों के पशुधन को बचाने हेतु बनाया गया है। इस योजना में भाग लेने का मतलब है किसान और उनके पशुधन की मेहनत का आदर करना। यह उनके प्रति व्यक्त की गई कृतज्ञता है। इसी तरह किसानों की समस्याओं पर उपाय हेतु डॉ. अनिरुद्ध के मार्गदर्शन अनुसार अनिरुद्धाज इन्स्टीट्युट ऑफ ग्रामीण विकास संशोधन व कार्य कर रही है। क्योंकि, रामराज की यात्रा ग्रामविकास के स्टेशन से शुरु होती है, और ग्रामराज ही ग्रामविकास है।