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विद्याप्रकाश योजना की आवश्यकता

भारत को स्वातंत्र्य प्राप्त हुए ७० वर्ष बीत चुके हैं फिर भी आज भारत के अनेक भागों में बिजली की गम्भीर समस्या बनी हुई है। कुछ गांवों, खेड़ों अथवा शहरों के बाहर बिजली है परंतु उन्हें १० घंटों से अधिक भारनियमन पड़ रहा है। देश के प्रत्येक कोने में २४ घंटे बिजली उपलब्ध कराने हेतु सरकारी स्तर पर प्रयास जारी हैं। इस बिजली की समस्या के कारण सबसे ज्यादा नुकसान होता है स्कूली छात्रों का। वास्तव में घर से कोसों दूर स्कूल जाने-आने में ही इन छात्रों का अधिकतर समय बीत जाता है। अत: ये बच्चे सूर्यास्त के समय घर पहुंचते हैं और सूर्यास्त के बाद बिजली न हो तो वे अपना होमवर्क कब और कैसे कर पाएंगे? होमवर्क, पढ़ाई न करने से छात्र पिछड़ते जाते हैं। उनकी शिक्षात्मक प्रगति और इससे जुडी़ हुई सर्वांगीण प्रगति में रोक लग जाती है। इसलिए इन छात्रों के लिए सरल और प्रभावी मार्ग ढूंढ़ निकालना आवश्यक है। इन विचारों ने “विद्याप्रकाश” योजना को जन्म दिया।

विद्याप्रकाश योजना की संकल्पना

सदगुरु अनिरुद्ध बापू ने विद्या प्रकाश योजना यह सूत्र अपने १३ सूत्री योजनाओं में २००२ में घोषित किया। बिजली की कम उपलब्धिवाले भागों में छात्रों की पढ़ाई की समस्या सुलझाने हेतु विद्याप्रकाश योजना अंतर्गत मोमबत्तियां और माचिसों का श्रीअनिरुद्ध उपासना फांऊडेशन द्वारा वितरण किया जाता है।

विद्याप्रकाश योजना का अध्यात्मिक पहलू

इन छात्रों को पढ़ने लिखने के लिए मोमबत्तियां भेंट करने का अर्थ है प्रकाश और जीवन का मूल स्त्रोत प्रभू श्रीराम के प्रति अपना प्रेम और आदर व्यक्त करना। इन छात्रों को जीवन में विद्या का प्रकाश मिलने से श्रद्धावानों का जीवन भी प्रकाशमान हो जाता है।

विद्याप्रकाश योजना की कार्य पद्धति

श्रद्धावान और श्रद्धावान कार्यकर्ता श्री हरिगुरुग्राम अथवा उपासना केंद्रों पर मोमबत्तियां व माचिस दान करते हैं। कई लोग तो अपने जीवन के किसी विशेष दिन जैसे परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद, जन्मदिन, शादी की सालगिरह, आदि मौकों पर मोमबत्तियां व माचिस दान करते हैं। दान स्वरूप आईं हुईं ये मोमबत्तियां और माचिसें फाँऊडेशन द्वारा दुर्गम गाँवों में जरुरतमंद छात्रों में बांट दिए जाते हैं।

इस विद्याप्रकाश योजना की वजह से छात्रों को पढ़ाई हेतु बिजली पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। बिजली न होते हुए भी इन मोमबत्तियों की रोशनी में ये बच्चे पढ़ते हैं।

ये मोमबत्तियां और माचिसें धुलिया, नांदेड, आदि गांवों में बाँटी जाती थी। तथा फाँऊडेशन और संलग्न संस्थाओं द्वारा शहापूर, कोल्हापुर तथा विरार में आयोजित किए जानेवाले वैद्यकीय शिविरों में भी ये बाँटी जाती हैं। छात्रों को सालभर के लिए पर्याप्त मोमबत्तियां और माचिसें बाँटी जाती हैं।

विद्याप्रकाश योजना का फलित

विद्याप्रकाश योजना का लाभ लेने के बाद छात्रों के अनुत्तीर्ण होने का प्रमाण बड़े पैमाने पर घटा है। इसके अलावा स्कूलों में छात्रों की संख्या में वृद्धि हुई है। छात्रों की अच्छी प्रगति हुई है और भारत को साक्षर एवं सक्षम दिशा में आगे बढ़ने हेतु यह विद्याप्रकाश योजना अपना छोटासा योगदान दे रही है।