तन ढकने के लिए अपर्याप्त कपडों के कारण भारतीय मेहनतकश समाज के लिए सर्दियों का मौसम बडा कष्टदायी होता है। ठंड से बचने के लिए उनके पास स्वेटर भी उपलब्ध नहीं होते और ना ही उनमें खरीदने का सामर्थ्य होता है। शीत लहर के कारण मृत्यु की घटनाएं, खबरें हम पढते रहते हैं। मरनेवालों में अधिकांश छोटे बच्चे और बुजुर्गों का समावेश होता है। ऐसे लोगों को ’वत्सलता की द्रवणशीलता’ (वात्सल्याची ऊब) सेवा के अंतरगत बुने हुए स्वेटर दिए जाते हैं।

सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी के मार्गदर्शन अनुसार ‘अहिल्या संघ’ द्वारा ‘वत्सलता की द्रवणशीलता’ (वात्सल्याची ऊब) नामक उपक्रम कार्यरत है। इस उपक्रम में श्रद्धावान ऊन बुनने की सेवा करते हैं। दो सुईयों और ऊन के इस्तेमाल से स्वेटर बुने जाते हैं। नवजात शिषु, दस साल तक के बच्चे तथा बुजुर्गों के लिए यह स्वेटर बुने जाते हैं। स्वेटरों के अलावा कान टोपियां, नन्हें बच्चों के लिए टोपियां, मोजे और मफलर भी बुने जाते हैं। अब तक (सन २०१८) श्री अनिरुद्ध उपासना ट्रस्ट और संलग्न संस्थाओं द्वारा तकरिबन २२,००० स्वेटर वितरीत किये गए हैं ।

जिन महिला श्रद्धावानों को स्वेटर बुनने की इच्छा होती है उन्हें अहिल्या संघ द्वारा बुनाई का प्रशिक्षण नि:शुल्क दिया जाता है। यह प्रशिक्षण, हफ्ते में दो बार दिया जाता है। प्रशिक्षण की अवधि लगभग छे महीनों की होती है।

लगभग पचास वर्ष की आयु के बाद कई गृहिणियाँ अपने पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाती हैं। उनके पास खाली समय होता है। यह खाली समय वे स्वेटर बुनाई के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं। कई श्रद्धावान महिलाएं इस सेवा का लाभ उठाती हैं। प्रेम और निरपेक्ष भावना से बुने गए स्वेटर्स में सिर्फ ऊन की गरमाहट नहीं होती बल्कि, उनमें वत्सलता की द्रवणशीलता (वात्सल्याची ऊब) भी होती है। कई श्रध्दावान महिलाएं भगवंत और सद्गुरु का नाम स्मरन करते हुए यह सेवा करतीं हैं, इसकी वजह से इस सेवा में भक्ति भी जुड जाती है। ऐसी सेवा से निर्माण होनेवाली द्रवण्शीलता इनसान को जीने की हिम्मत देती है।