परमपूज्य सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी ने अर्थात ‘बापू’ ने कई बार ‘शिवं ज्ञानोपदेष्टारं’, इस सिद्धांत को अपने प्रवचनोंद्वारा उजागर किया है। ‘शिवजी’ ‘ज्ञानोपदेष्टा’ हैं अर्थात, ज्ञान का उपदेश करतें हैं, अज्ञान का नाश करतें हैं। उसी तरह, इस विश्व पर जिसका राज है, उस ‘जगदंबा’ की शक्तिरूप में साधना न करते हुए उसकी मातृरूप में भक्ति करना ही उचित है, ये भी बापू हमें अनेक बार अपने लेखों एवं प्रवचनों द्वारा बताते हैं। ऐसे इस विश्व के जनक-जननीके अर्थात् मंगेश-शान्तादुर्गा के पवित्र श्रीक्षेत्र की रसयात्रा सद्गुरु के साथ करने के लिए सभी श्रद्धावान भक्त उत्सुक थे।

श्री क्षेत्र मंगेशी एवम् शांतादुर्गा गोवा रसयात्रा आरंभ –

शिर्डी, अक्कलकोट तथा देहू-आलंदी रसयात्रा के पश्चात्‌ सन १९९९ में, श्रीअनिरुद्धजी के साथ, श्रद्धावान, ‘श्री क्षेत्र मंगेशी एवम् शांतादुर्गा गोवा रसयात्रा’ इस चौथी रसयात्रा में शामिल हुए। १६ मई १९९९ के दिन इस यात्रा का आरंभ हुआ। रसयात्रा के पहले ही दिन, तपती गर्मी के बीच ही रिमझिम बारिश के होते ही, सभी के सुखद यात्रा की शुरुवात हुई। प्रातः समय ०३:०० बजे से ही श्रद्धावान, कवलेगांव में, भगवान रामनाथीजी के मंदिर में आने लगे थे। कई श्रद्धावानों ने सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी के छत्रछाया में इस रसयात्रा का लाभ उठाया।

श्री क्षेत्र मंगेशी एवम् शांतादुर्गा गोवा रसयात्रा – दिन पहला –

सोमवार, दिनांक १७ मई को सुबह १०:०० बजेसे ‘भगवान रामनाथी’ के दर्शन पर्व की शुरुवात हुई। उस समय, भगवान रामनाथी को महाभोग अर्पण किया गया। दर्शन के समय श्रद्धावान सामूहिक रूप से ‘शिवपाठ’ का पठण कर रहे थे। श्रद्धावान उस भक्तिमय वातावरण में तल्लीन होकर शिवपाठ में मगन हो गए थे, वे शिवजी का नाम लेते हुए नृत्य कर रहे थे। इसके पश्चात्‌ ‘श्री विष्णुपाद’ और ‘भगवान श्रीकृष्णजी’ की सवारी चली। यह पालकी समारोह तीन से साढ़े तीन घंटे तक चलता रहा।

सभी श्रद्धावान भोजन के बाद थोड़ा विश्राम कर के, शाम ०४:०० बजे ‘अमृतमंथन’ उपासना के लिए उपस्थित हुए। सद्गुरु श्री अनिरुद्धजी ने सभी श्रद्धावानों को इस उपासना का महत्व समझाते हुए उपासना का आरंभ किया। उपासना के दौरान हर एक श्रद्धावान ने गीली मिट्टी के गोले से शिवजी का लिंग बनाया और उसपर अर्चनद्रव्य अर्पण करते हुए अभिषेक तथा पूजन किया।

उस समय श्रीसच्चिदानंद नवनीत पादुका पूजन इस मंत्र से संपन्न हुआ –

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ 

इसके पश्चात्‌ शिवलिंग पूजन शिवगायत्री जप का पठण करते हुए संपन्न हुआ। यह मंत्र इस प्रकार है –

शिवगायत्री मंत्र :

ॐ भू र्भूव: स्वः। ॐ तत्पुरुषाय विद्महे। महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयत्॥

इसके पश्चात्, श्री मंगेश-गायत्री मंत्र का जप किया गया था ।

श्री मंगेश-गायत्री मंत्र :

ॐ नीलग्रीवाय विद्महे। गौरीनाथाय धीमहि। तन्नो मांगिरीश: प्रचोदयात्॥

 तत्पश्चात, सभी ने एक साथ श्री शांतादुर्गा गायत्री जप का पाठण किया ।

शांतादुर्गा गायत्री मंत्र :

ॐ शिवप्रियाय विद्महे। सर्वशक्त्यै च धीमहि। तन्नो शांतादुर्गा प्रचोदयात्॥

एकसाथ मिलकर निम्नलिखित आराधना गाते हुए यह उपासना समाप्त हुई :-

मंगेशा तू भक्ति दे रे, शांतादुर्गे शक्ति । भक्ति करूनि मिळवू देवा, पापापासून मुक्ति ॥

(भगवान मंगेशजी आप भक्ति दें, माँ शांतदुर्गा आप शक्ति । भक्ति करके हम पाएँ हमारे पापोंसे मुक्ति ॥)

उपासना के बाद, सभी ने सत्संग का आनंद लूटा।

श्रीक्षेत्र मंगेशी एवम् शांतादुर्गा गोवा रसयात्रा – दिन दूसरा –

मंगलवार, दिनांक १८ की सुबह नाश्ता करके, सभी श्रद्धावान श्री शांतादुर्गा उपासना के लिए आ पहुँचे। उपासना के बाद, महाभोग अर्पण करके, सभी श्रद्धावानोंने शांतादुर्गा माँ का दर्शन पाने हेतु मंदिर की ओर प्रस्थान किया।

शाम के ०६:०० बजे, श्री अमृतमंथन विधि शुरू हुई। यह एक विलक्षण उपासना थी। यह उपासना करते वक्त हर कोई यही प्रार्थना कर रहा था कि, इस अमृतमंथन उपासनाद्वारा हमारे मन की गहराई में छिपा हुआ अनुचित प्रवृत्तिस्वरूप विष बाहर निकले तथा शिवजी के कृपा से उसका नाश हो और शिवजी के कृपामृत का लाभ हमें हो साथ ही हमारे नवजीवन की शुरुवात हो। अमृतमंथन उपासना के दौरान, हर श्रद्धावन मंथन के लिए डोर खींचते वक्त भक्तिगान करते हुए आराधना कर रहे थे :-

जय शिवशंकर संकटहारी । सागरमंथन विषनिवारी । जय हरिमोहिनी संकटहारी । जीवनमंथन अमृतदायी ॥

इसके पश्‍चात्‌, सद्गुरु श्री अनिरुद्धजी ने अमृतमंथन कथा का मूलार्थ प्रकट करनेवाला मंत्र श्रद्धावानों को समझाया। यह अमृतमंथन उपासना होम हवन के साथ समाप्त हुई। ‘श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी। हे नाथ, नारायण, वासुदेव।।’ इस भजन को गाते हुए सभी ने पवित्र यज्ञाग्नि में समिधाएँ अर्पण की। रात ११: ०० बजे सभी सत्संग में सहभागी हुए।

श्री क्षेत्र मंगेशी एवम् शांतादुर्गा गोवा रसयात्रा – दिन तीसरा –

दिनांक १९ की सुबह सभी श्रद्धावान, ‘श्रीक्षेत्र साखली’ यहाँ पर दत्तामंदिर में दर्शन करने गए। वहाँ से लौटनेपर, दोपहर के भोजन और विश्राम के पश्चात्‌, शाम के ४:३० बजे, भगवान श्री मंगेशजी की उपासना शुरू हुई‍। सभी मंच के पास इकट्ठा हुए और उपासना करके, वहाँ से महाभोग का लाभ उठाकर, भगवान श्री मंगेशजी के दर्शन के लिए गए।

रात को सभी ने मिलकर सत्संग किया और सत्संग के अंत में, श्री मंगेश- माँ शांतदुर्गा का ‘गोंधल’ किया गया। गोवा में, पहले माँ शांतदुर्गा का ‘गोंधल’ हुआ करता था । इस ‘गोंधल’ को देखते हुए पुराने भक्तोंने बताया कि उन्हें उस वक्त इससे पहले अनुभव किये हुए ‘गोंधल’ का स्मरण हो रहा था ।

श्री क्षेत्र मंगेशी एवम् शांतादुर्गा गोवा रसयात्रा समाप्ति –

२० मई १९९९ के दिन समापन समारोह आयोजित किया गया था । सद्गुरु के साथ रसयात्रा करके भक्तिरस के चैतन्यसे भरे हुए अंतःकरण से श्रद्धावान भक्त वापसी यात्रा पर निकल पड़े ।