AniruddhaFoundation-Shree Jagannath Utsav

सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्ध उपासना ट्रस्ट एवं अनिरुद्ध समर्पण पथक इनके संयुक्त तत्त्वावधान में मुंबई में ३ मे से १२ मे इस कालावधी में आयोजित किए गए श्री जगन्नाथ महोत्सव में श्रीजगन्नाथ के दर्शन एवं उपासना का लाभ हर एक भक्त को प्राप्त हुआ।

चारोंधामों की यात्रा में से एक धाम अर्थात जगन्नाथपुरी जो भक्त दर्शन हेतु आते हैं उन पर श्री जगन्नाथ प्रेम की बरसात करते हैं साथ ही उत्साह आनंद एवं शांति प्रदान करते हैं ऐसा माना जाता है।

ओरिसा में जगन्नाथपुरी में जैसे देवताओं की मूर्तियाँ हैं वैसी ही मूर्तियाँ इस अष्टतीर्थ महोत्सव में मुंबई में तैयार की गयीं थीं। विशिष्ट प्रकार की लकड़ी अर्थात ब्रह्मवृक्ष की लकड़ी जिसे दारुब्रह्म कहते हैं। इससे ही श्री जगन्नाथ, श्री बलभद्र एवं उनकी बहन सुभद्रा इन तीनों की मूर्तियाँ बनाई गईं थी। इन मूर्तियों के लिए २७ प्रकार के पारंपारिक पोषाख इस महोत्सव के साज श्रृंगार हेतु विशेष तौर पर तैयार किए गए थे।

श्रीजगन्नाथ के परमभक्त श्री गौरांग चैतन्य प्रभु ने ‘ॐ रामाया जगन्नाथाय नम:।’ यह सिद्धमंत्र हमें प्रदान किया है। सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापू ने इस मंत्र का १२ करोड़ बार पठन करवाया। यह मंत्र पठन प्रतिदिन सुबह ९ बजे से रात्रि के ९ बजे तक चलता रहता था। निश्चित किए गए समय से पूर्व ही इस मंत्र पठन की संख्या पूरी हो चुकी थी कारण पठन के लिए अभूतपूर्व संख्या में भक्त सहभागी हो गए थे।

इस महोत्सव में श्री जगन्नाथ का क्षेत्र शंख के आकार में बनाया गया था। और वहाँ की सभी विधियाँ, विशिष्ट पूजा पद्धतियाँ जगन्नाथ मंदिर के प्रथानुसार ही पावित्र्य का जतन करते हुए पूरी की गईं थीं। हर एक घंटे के पश्चात्‌ आरती हो रही थी। हर एक आरती भक्तिपूर्ण वैशिष्टयपूर्ण, रसमय एवं भक्तिपूर्ण ही थी। मूर्ति के पोषाख पारंपारिक थे और दिन में उन्हें बदल दिया जाता था। प्रतिदिन रात्रि ९ बजे सत्संग का आरंभ होता था। लाखों लोगों ने इस सत्संग का आनंद लूटा|

मोक्षपुरी –

श्रीवृषभनाथ यह महाविष्णु का प्रथम मानवी अवतार माना जाता है। उनकी ३.५ फुट ऊँचाई की संगमरमर की मूर्ति मोक्षपुरी में स्थापित की गई थी। सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापू ने नवाकार मंत्र का एक करोड़ बार पठन करवाया था। यह नवाकार मंत्र ‘गायत्रीमंत्र’ के समान ही पवित्र मंत्र माना जाता है।

जो कोई भी इस मोक्षपुरी में प्रवेश करेगा। उसके षड्‌रिपुओं का हरण श्रीवृषभनाथ जी करेंगे ही। इस तरह से श्रीवृषभनाथजी के भक्तों के जीवन का अस्तित्व अर्थात मानो भक्त को मोक्षप्राप्ति के चिरंतन आनंद की धरोहर का ही मिल जाना!

श्रीपतीतपावनधाम –

इस धाम में एक भव्य जलकुंड में सात पवित्र नदियों के जल का संग्रह किया गया था। उसी के अंदर बरगद, पीपल एवं औंदुबर इन तीन वृक्षों का रोपण किया गया था। गंगोत्री एवं जमनोत्री की पवित्र मृत्तिका एवं जल का उपयोग करके श्री दत्त दिगंबर की बनाई गई मूर्ति इसी जलकुंड में प्रतिष्ठित थी।

इस जलकुंड को सभि श्रद्धावान प्रदक्षिणा करते थे। इस धाम का स्थान एवं वहाँ का वातावरण अत्यन्त सुंदर एवं पवित्र था। सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापू के सूचनानुसार उस धाम की रचना वैशिष्ट्यपूर्ण थी। उसका कारण यह था कि भक्तों को वहाँ के प्रदक्षिणा के कारण साथ ही मन:पूर्वक गजर करने से अधिक से अधिक मुक्ति प्राप्त हो।

श्रीह्यग्रीवधाम –

‘ह्यग्रीव’ अर्थात अश्व का मुख्य धारण किए हुए महाविष्णु का अवतार। शक्ति का प्रतीक होनेवाले ह्यग्रीव को भक्त शक्ति के लिए ही वंदन करते हैं। ह्यग्रीव के साथ अकसर बला एवं महाबला ये देवता होते हैं। अधिक से अधिक सकारात्मक उर्जा प्राप्ति हेतु इस धाम में केवल पुरुष भक्तों के लिए ही प्रवेश करने की अनुमति थी। चाव्य मुनि, पराशर ऋषि, अगस्त्य ऋषि एवं अर्जुन ये ह्यग्रीव अर्थात इसी महाविष्णु के अवतार के श्रेष्ठ भक्त थे।

श्रीसावित्रीधाम –

सावित्री राजा सत्यवान की पत्नी हैं। आदिमाता सावित्री स्त्रियों के शक्ति का प्रतीक हैं। सुलक्षणा सावित्री यह उनका रूप भी भक्ति एवं निष्ठा का प्रतीक है। ‘आदिमाता सावित्री’ एवं ‘सुलक्षणा सावित्री’ ये दोनों ही मूर्तियाँ सावित्रीधाम में प्रतिष्ठित थीं।

जो आदिमाता सावित्री मृत्यु के जबड़े से भी अपने पति के प्राण वापस लौटाकर ले आई थी, उन्हीं का पूजन प्रतिदिन इस धाम में किया जाता था। यहाँ पर केवल स्त्रियों को ही प्रवेश करने की अनुमति थी जैसे कुँआरी लड़कियाँ, अविवाहित औरतें, वृद्धाएँ आदि।

श्रीसंतपुरी –

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव। राधे…राधे…राधे।

इस गजर में पूर्णरूपेण रंग जाने का मानों सुनहरा अवसर केवल इस संतपुरी में ही प्राप्त हो रहा था। गौरांग चैतन्य प्रभु के अस्तित्व का अहसास इस संतपुरी में आनेवाले हर किसी को हो रहा था। यहाँ पर निरंतर श्रीकृष्ण का जप चलते रहने के कारण यह सभी संतों का मानों निवास स्थान ही बन गया था।

पितृधाम –

हर किसी की यह इच्छा होती है कि वह अपने पूर्वजों के लिए कुछ न कुछ क्रियाकर्म करे, उनके प्रति होनेवाले कर्तव्य का पालन करे। श्रीशिवजी का ‘परमहंस बनलिंग’ रूप जो मृत्यु पश्चात्‌ आत्मा को शांति प्रदान करता है। उन्हें बेलपत्र अर्पण करने का सुनहरा अवसर हर एक भक्त को इस धाम में मिल रहा था। वहाँ पर दर्शन के लिए जानेवाले हर एक भक्त को पूर्वजों के आत्मा को शांति एवं समाधान प्राप्त हो इस हेतु से किये जानेवाले मंत्र का पठन वहाँ पर निरंतर चल रहा था।

यज्ञपुरी –

अग्नि, दीप, आरती, धुनी एवं पवित्र ज्योति ये यज्ञपुरुष के पाँच मूलभूत तत्त्व! यज्ञ आचारसहिंतानुसार यज्ञपुरी में पाँच प्रकार के यज्ञ हो रहे थे। श्रीदत्तगुरु, श्रीजगन्नाथ, श्रीराम, श्रीपरब्रह्म एवं श्रीचतुर्व्युह इनके मंत्रों का पठन वहाँ पर निरंतर चल रहा था। तथा पवित्र अग्नि में विशिष्ठ प्रकार के द्रव्य से हवन किया जा रहा था। किसी भी प्रकार के अनाज आदि की नुकसानी करनेवाले किसी भी द्रव्य का उपयोग इस यज्ञ में नहीं किया गया था।

अनिरुद्धधाम –

नौवा धाम इस धाम की निर्मिती सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापू के भक्तों ने अपने सद्‌गुरु के प्रेमवश की थी। यहाँ पर सद्‌गुरु बापू के पवित्र मार्गदर्शन के अनुसार श्रीअनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन की ओर से जो भक्ति सेवाएँ दी जाती हैं उनसे संबंधित एवं बापूजी द्वारा दिये जानेवाले मार्गदर्शन से संबंधित सभी जानकारी आनेवाले भक्तों को दी जा रही थी।

सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात तो यह थी कि यहाँ पर दर्शन विनामूल्य था। स्वैच्छानिधि के लिए किसी प्रकार की दान पेटियाँ नहीं थी। पूजन एवं अभिषेक के मूल्यों की रसीद दी जाती थी। फल, फूल, मिठाई आदि का स्वीकार नहीं किया जाता था। केवल श्रीजगन्नाथ को नारियल एवं तुलसीपत्र अर्पण करने की अनुमति थी।

नियमित रूप से चढा़या जानेवाला प्रतिदिन का महाभोग जो चढा़या जाता था वह प्रसाद रूप में वृद्धाश्रम एवं अनाथआश्रम में ले जाकर बाँट दिया जाता था। इस महोत्सव में कहीं पर भी धार्मिक रुढी़वादिता निर्माण नहीं हुई थी। श्री जगन्नाथ अष्टतीर्थधाम महोत्सव में अनेक श्रद्धावानोंने एकत्रित होकर यह महोत्सव पूर्णरूपसे यशस्वी होने के लिये अपनी-अपनी ओर से काफी योगदान दिया।