उड़ीसा के पुरी का जगन्नाथ मंदिर भारत के चारों तीर्थधामों में से एक है। भगवन श्रीकृष्ण का जगन्नाथ के रूप में विराजमान यह एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर में श्री जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ हैं। हर आषाढ़ माह में यहाँ पर जगन्नाथ उत्सव मनाया जाता है। इस दिव्य उत्सव को देखने के लिए सिर्फ भारत देश से ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से लाखों श्रद्धावान यहाँ दाखिल होते हैं। जो भक्त दर्शन के लिये यहाँ आते हैं उनपर श्री जगन्नाथ प्रेमवर्षा करते हैं और वे उन्हें उत्साह आनंद तथा शांति प्रदान करते हैं। ऐसा इस तीर्थधाम की यात्रा करनेवाले भक्तों का ढृढ़ विश्वास है।

परन्तु हर कोई इस उत्सव में शामिल नहीं हो पाता है। ऐसे श्रद्धावानों को इस दिव्य उत्सव का लाभ मिले इसी उद्देश्य से सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापूजी के मार्गदर्शन से ‘श्री जगन्नाथ अष्टतीर्थधाम महोत्सव’ का आयोजन किया गया था। यह महोत्सव ‘सदगुरु श्री अनिरुद्ध उपासना ट्रस्ट’ और ‘सद्‌गुरु अनिरुद्ध समर्पण पथक’ इनके संयुक्त कार्य से ३ मई से १२ मई २००३ तक सोमैया कॉलेज, सायन, मुंबई यहाँ पर सम्पन्न हुआ। भारत देश की अध्यात्मिक उन्नत्ति होकर हर स्तर पर प्रगति होनी चाहिए, भारत की अपनी पहचान एक सामर्थ्यशाली देश के रूप में होनी चाहिए साथ ही हर एक श्रद्धावान को मंत्र पठन की सहायता से सकारात्मक उर्जा प्राप्त हो ऐसा इस महोत्सव का मुख्य उद्देश्य था।

सद्गुरु का हमारे जीवन में आना यही हमारे जीवन की सार्थकता है। उनके सान्निध्य में अष्टतीर्थ यात्रा तो अपने-आप होती ही रहती है। श्री जगन्नाथ अष्टतीर्थधाम यह उत्सव भी सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापूजी के मार्गदर्शन के अनुसार बहुत ही सुन्दर तरीके से सम्पन्न हुआ। और श्रद्धावान भी अत्यन्त आनंद से इस उत्सव में शामिल हुए।

पुरी में जो जगन्नाथ उत्सव मनाया जाता है वहाँ श्री जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां लकड़ी से बनाई जाती है। ‘पाद अंगुली नहीं है हाथ, दारुब्रह्मा जगन्नाथ’– आरती की इस पंक्ति से श्री जगन्नाथ जी का वर्णन किया जाता है। इस मूर्ति के लिए ब्रह्मवृक्ष अर्थात ‘दारुब्रह्मा’ नाम के एक विशिष्ट प्रकार की लकड़ी का इस्तेमाल होता है। ‘दारुब्रह्मा’ का अर्थ है श्रेष्ठ वृक्ष से मिलने वाली श्रेष्ठ लकड़ी में रहनेवाले ब्रम्ह मतलब ‘दारुब्रह्म’। और ये तीनों मूर्तियाँ इसी बुंधे से बनायीं जाती हैं। हर तीस साल बाद ये बदल दी जाती हैं। श्री जगन्नाथ अष्टतीर्थ धाम महोत्सव में भी जगन्नाथ पुरी की मूर्तियों जैसी ही हुबहू मूर्तियाँ बनायीं गयी थी। इस महोत्सव में इन मूर्तियों की सजावट के लिए २७ प्रकार के पोशाक खास तैयार किये गये थे। ऐसा माना जाता है कि श्री जगन्नाथ जी के परम भक्त श्री गौरांग चैतैन्य प्रभु इन्होंने ‘ॐ रामाय जगन्नाथाय नमः‘ यह सिद्ध मंत्र दिया।

सद्गुरु श्री अनिरुद्ध जी के मार्गदर्शन के अनुसार इस सिद्ध मंत्र का जाप श्रद्धावानों ने १२ करोड़ बार किया। इस पठन के लिए अभूतपूर्व संख्या में श्रद्धावान शामिल हुए थे। उत्सव काल में नित्यदिन सबुह ९ बजे से रात ९ बजे तक मंत्र पठन चलता रहा। तय किये गए समय से पहले ही इस मंत्र जप की १२ करोड़ यह संख्या पूरी हो गयी। जगन्नाथ पुरी का आकार जिस तरह शंखाकृति है, बिलकुल उसी तरह शंखाकृति आकार की श्री जगन्नाथ पुरी बनयी गयी थी। और वैदिक पद्धति के अनुसार वहाँ पर सभी विशिष्ठ पूजाविधियाँ, जगन्नाथ मंदिर के रीतीरिवाज के अनुसार ही पावित्र्य का जतन करके की गईं थी। इस धाम में हर एक घंटे बाद, ‘पाद अंगुली नहीं है हाथ, दारूब्रह्मा जगन्नाथ’ यह श्री जगन्नाथ जी की आरती की जाती थी। मूर्ति के पारंपरिक वस्त्र दिन में ३ बार बदले जाते थे। इसके अलावा सद्गुरु श्री अनिरुद्ध जी की उपस्थिति में हर रोज रात 9 बजे सत्संग होता था। लाखों श्रद्धावान इस सत्संग का आनंद लूटते थे। 

श्री जगन्नाथ अष्ठतीर्थधाम महोत्सव में

श्री जगन्नाथ क्षेत्र, इसके साथ श्री संतपुरी, यज्ञपुरी और मोक्षपुरी ऐसे तीन पुरी और श्री पतितपावन, श्री हयग्रीव, श्री सावित्री, पितृ, और अनिरुद्ध ऐसे पाँच धाम और बनाये गये थे। इन सभी धामों की जानकारी एवं उनका वैशिष्ठ्य हम जान लेते हैं।

श्री संतपुरी धाम ‘श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वसुदेवा राधे… ‘ इस गजर के रंग में पूरी तरह से डूबने का अवसर यहां संत पुरी में ही मिलता था। श्री कृष्ण का अखंड जाप शुरु रहने के कारण यह संतपुरी सर्व संतों का निवास स्थान लग रही थी। ऐसा लग रहा था श्री गौरांग चैतन्य महाप्रभु के अस्तित्व का लाभ संतपुरी में हर एक को मिल रहा है।

यज्ञपुरीअग्नि, दीप, आरती, धूनी व पवित्र ज्योति यह यज्ञ पुरुष के पाँच मूलभूत घटक माने जाते हैं। यज्ञ आचारसंहिता के अनुसार यज्ञपुरी में पाँच प्रकार के यज्ञ चल रहे थे। श्री दत्तगुरु, श्री जगन्नाथ, श्री राम श्री परब्रम्ह और श्री चतुर्व्युह इनके मंत्रो का पठन वहां निरंतर चल रहा था।

श्री पतितपावन धाम इस धाम में एक भव्य जल कुंड में सात पवित्र नदियों का जल इकठ्ठा किया था। अन्दर की ओर बरगद, पीपल एवं औदुम्बर इन तीन पेड़ों की डालियाँ लगायी थी। गंगोत्री और जमनोत्री की पवित्र मिटटी एवं गंगा- यमुना नदियों के जल का इस्तेमाल करके बनायीं गयी श्री दत्त दिगंबर की मूर्ति इस जलकुंड में स्थापित की गयी थी। इस जलकुंड की सभी श्रद्धावान प्रदक्षिणा कर रहे थे। सद्गुरु श्री अनिरुद्ध जी के सुचना के अनुसार इस पवित्र धाम का स्थान व रचना बहुत ही सुन्दर व वैशिष्ठ्य पूर्ण ढंग से की गई थी। वहां का वातावरण बहुत ही पवित्र और मन को स्फूर्ति देनेवाला था।

मोक्षपुरी धामभारतीय मन को मोक्ष के बारे में रहने वाला आकर्षण बहुत ज्यादा है। इस मोक्षपुरी में जैन धर्म के पहले तीर्थकार श्रीभगवान ऋषभनाथजी की मूर्ति स्थापित की गयी थी। उनको विष्णु जी का अवतार भी माना जाता है। यहाँ पर सद्गुरु श्री अनिरुद्ध जी ने नवकार मंत्र का जाप १ करोड़ बार करने का संकल्प किया था। मात्र श्रद्धावानों ने इस मंत्र का कई गुना अधिक जाप किया। यह नवकार मंत्र बहुत पवित्र माना जाता है।

श्री हयग्रीव धामहयग्रीव अर्थात घोड़े के मुख के आकार के महाविष्णु का अवतार। शक्ति का प्रतीक रहनेवाले हयग्रीव के साथ अकसर ‘बला’  व ‘अतिबला’ ये देवता रहते हैं। ज्यादा से ज्यादा सकारत्मक उर्जा प्राप्ति के लिए इस धाम में सिर्फ पुरुष भक्तो को ही प्रवेश था। इसके पुरुष भक्तों को अपने कर्तव्य की, कुटुंब और समाज की जिम्मेदारियों का एहसास दिलाना यह उद्देश्य था। चाव्य मुनि, पराशर ऋषि, अगस्त्य ऋषि व अर्जुन ये हयग्रीव इस महाविष्णु के अवतार के परम भक्त थे।

श्री सावित्री धामआदिमाता सावित्री ये स्त्रियों की शक्ति का प्रतीक हैं। सत्यवान राजा की पत्नी सावित्री यही सुलक्षणा सावित्री हैं। इस सावित्री का रूप भक्ति और निष्ठां का प्रतीक है। ‘आदिमाता सावित्री’ और ‘सुलक्षणा सावित्री’ ये दोनों मूर्तियाँ सावित्रि धाम में स्थापित थीं। माता और पत्नी इस दोनों रूप की जिम्मेदारियां हर स्त्री बाखूबी निभा सके इसीलिए भक्ति, शक्ति एवं निष्ठा उनके अंत:करण में विलीन हो, यही सवित्री धाम बनाने का उद्येश्य था। जो सावित्री मृत्यु के मुँख से अपने पति के प्राण खींच लायी उसका पूजन रोज़ इस धाम में किया जाता था। यहाँ पर कुँआरी, विधवा, अविवाहित, वृद्ध, स्त्रियों को इस धाम में प्रवेश था।

पितृधामपूर्वजों के लिए कुछ क्रिया कर्म करने का कर्तव्य, निभाने की इच्छा हर एक को होती है। श्री शंकर का ‘परमहंस बाण लिंग’ रूप जो मृत्यु के बाद आत्मा को शांति देता है, उस रूप के प्रतिकात्मकमूर्ति पर बेलपत्र अर्पण करने का अवसर हर एक श्रद्धावान को इस धाम में प्राप्त हो रहा था। वहाँ निरंतर मंत्र पठन हुआ करता था।

अनिरुद्ध धामयह नौवा धाम सद्गुरु श्री अनिरुद्ध जी के श्रद्धावानों ने अपने सद्गुरु के प्रति प्रेमवश बनाया था।

यहाँ पर सद्गुरु श्री अनिरुद्ध जी के मार्गदर्शन पर चलनेवाली, जो भक्ति सेवा’ श्री अनिरुद्ध उपासना फाउंडेशन’ की तरफ से दी जाती है। उसकी जानकारी और सद्गुरु श्री अनिरुद्ध के विविध कार्यों की जानकारी श्रद्धावानों को दी जाती थी।

इस उत्सव में नित्यप्रति श्री जगन्नाथ को महाभोग अर्पण किया जाता था। और वह प्रसाद वृद्धाश्रम एवं अनाथाश्रम में बाँटा जाता था। इस उत्सव का मह्त्वपूर्ण अंग यह था कि वहाँ दर्शन विनामूल्य था। दान के लिए दान पेटियाँ या और कुछ भी नहीं था। श्री जगन्नाथ जी को सिर्फ नारियल और तुलसीपत्र चढ़ाने की अनुमति थी।

सभी श्रद्धावानों ने श्री जगन्नाथ अष्टतीर्थधाम महोत्सव अधिक से अधिक यशस्वी हो इसके लिए काफ़ी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।