श्रीश्वासम् उत्सव

सोमवार, 4 मई 2015 से रविवार, 10 मई 2015 के दौरान मुम्बई स्थित श्रीहरिगुरुग्राम, बान्द्रा (पूर्व) में सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध बापूजी की उपस्थिती में श्रीश्वासम्‌महोत्सव बहुत ही शानदार रुप में (तरीके से ) धूमधाम से श्रद्धावान भक्तों के प्रचंड उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। बापूजी के कहने के अनुसार श्रीश्वासम्‌जिस जिस श्रद्धावान को चाहिए, हर उस श्रद्धावान तक, श्रद्धावान की क्षमतानुसार, स्थितिनुसार उस तक पहुंचाने हेतु 8 नवम्बर 2013 से सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी ने एक व्रत आरंभ किया था। उन्होंने यह व्रत यथावकाश पूरा किया और 4 मई 2015 से मानव समूह को ’आरोग्यम्‌सुखसंपदा’ बहाल करनेवाली जीवनपद्धति पुन: प्राप्त करवा दी।

श्रीश्वासम् अर्थात

सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी कहते हैं, ’श्रीश्वासम्‌ का अर्थ है – ‘दी युनिव्हर्सल हीलिंग कोड’ अर्थात मानव को शरीर, मन, प्राण एवं प्रज्ञा के स्तरों पर जिस जिस चीज की कमतरता है, उसका जो कुछ बिगड़ा हुआ है, वह सबकुछ दुरुस्त करने वाली विश्व में सर्वोच्च एवं सर्वोत्कृष्ट निरोगीकरण शक्ति है श्रीश्वासम्‌।’ श्रीश्वासम्‌ श्रीअनिरुद्धजी द्वारा किया गया सत्यसंकल्प है। आदिमाता की यह अरुला अर्थात करुणाघन अनुग्रहशक्ति ही इस विश्व में सर्वोच्च एवं सर्वोत्कृष्ट निरोगीकरण शक्ति है। आदिमाता की यह शक्ति एवं पुरुषार्थ प्रत्येक श्रद्धावान को प्राप्त कराने के लिए सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी ने आसान से आसान व्युहरचना की। ’श्रीश्वासम्‌’ की महिमा व्यक्त करते हुए सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी कहते हैं, “श्रीश्वासम्‌ आदिमाता का श्वसन है। यह हमें अनुभव करना है। श्रीश्वासम्‌ हमारे आध्यात्मिक जीवन की सांस बन जाए तो जीवन अपनेआप सुन्दर बनता चला  जाएगा। श्रीश्वासम्‌ से जिस तरह से हमारा अपना स्वास्थ्य सुधारना है, उसी तरह अपने भारतवर्ष का स्वास्थ्य सुधारने के लिए आदिमाता को पुकारना है कि, ’ऐ मेरी मां, इस भारतवर्ष का बिगडा हुआ स्वास्थ्य तुम सुधारो।’ यह श्रीश्वासम्‌ व्यक्तिगत तो है ही, साथ ही साथ वह अपने परिवार के लिए, अपने गांव के लिए और खास तौर पर अपने देश के लिए, मातृभूमि के लिए भी है। इसी तरह यह विश्व के प्रत्येक अच्छे इन्सान के लिए भी है।”

श्रीश्वासम् महोत्सव देवता स्थापना

अंजनामाता को प्रार्थना करने के बाद बापूजी, नंदामाता, सुचितदादा ने परिक्रमा कक्ष में रखे हुए 25 तस्वीरों का पूजन करके उन तस्वीरों का अनावरण किया। वे 25 तस्वीरें हैं –

१) मूलार्क गणपती, २) आदिमाता महिषासुरमर्दिनी ३) अवधूत दत्तात्रेय ४) पंचमुखी हनुमान ५) आदिमाता नारायणी ६) आदिमाता अंबाबाई ७) आदिमाता बालात्रिपुरा ८) आदिमाता श्रीविद्या ९) आदिमाता रणदुर्गा १०) आदिमाता शारदांबा ११) आदिमाता भुवनेश्वरी १२) आदिमाता दंडनाथा १३) आदिमाता तुलजाभवानी १४) आदिमाता निसर्गमालिनी १५) आदिमाता रेणुका १६) आदिमाता महागौरी १७) आदिमाता महासिद्धेश्‍वरी १८) आदिमाता मीनाक्षी १९) आदिमाता अष्टभुजा २०) आदिमाता महायोगेश्वरी २१) आदिमाता आदिती अर्थात श्री शून्यानां शून्यसाक्षिणी २२) आदिमाता अनसूया-दुर्गा २३) आदिमाता सप्तश्रृंगी २४) श्रीत्रिविक्रम २५) महाविष्णु की पीठ पर बनी हुई कूर्मपीठ की तस्वीर। यह कूर्मपीठ की मूर्ति भी मुख्य स्टेज पर चण्डिकाकुल में आदिमाता के चरणों के पास रखी गई थी।

इस उत्सव में पंचमुख हनुमंत एवं अश्विनीकुमार परिक्रमा कक्ष था। इन पंचमुख हनुमंत एवं अश्विनीकुमारों की मूर्तियों की स्थापना एवं पूजन बापूजी ने किया। पुष्करणी कुंड के पास आदिमाता उषादेवी की तस्वीर का भी पूजन किया गया और पुष्करणी तीर्थकुंड में त्रिविक्रम की पंचधातु की मूर्ति रखी गई। इस पर निरंतर पवित्र जल से अभिषेक किया जा रहा था। पास ही हॉल में महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा की स्थापना एवं पूजन किया गया।

श्रीश्वासम उत्सव का प्रारंभ – 

१) श्रीमूलार्क गणेशमंत्र, २) श्रीदत्तात्रेय स्तोत्रम्, ३) श्रीसूक्तम्, ४) पंचमुख हनुमंत स्तोत्र, ५) श्रीअश्विनीकुमार सूक्त, ६) उषा सूक्त और ७) त्रिविक्रम गायत्री मंत्र

उपरोक्त सात मंत्र-स्तोत्रों की मंगलध्वनि श्रद्धावानों के कानों में पड़ते ही श्रद्धावान परिक्रमा करने लगे। सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी द्वारा वैशाख पूर्णिमा के शुभ दिन श्रीश्वासम्‌ के साथ ही श्रद्धावानों को दी गई यह अपूर्व भेंट थी। त्रिविक्रम गायत्री मंत्र का एक एक शब्द श्रद्धावानों को संतुष्ट कर गया। वह सिद्ध मंत्र था,

‘ॐ मातृवेदाय विद्महे। श्रीश्वासाय धीमही। तन्नो त्रिविक्रम प्रचोदयात्॥

प्रत्येक श्रद्धावान के हाथ में मूषक के चित्रवाला एक कागज दिया गया था। श्रद्धावानों को उस कागज पर मूषकों के तीन चित्र बनाने थे। तदुपरांत आदिमाता को अर्पण करने के लिए दिए गए सूप को लेकर वे परिक्रमा करने गए। सूप में दो कटोरियों में दाल और चावल, तीन केले और पत्री (पत्ते) दिए गए थे। परिक्रमा करते हुए श्रद्धावानों को कुल 24 प्रतिमाओं का दर्शन होता था।

सूप में रखी हुए पत्री जलकुंड में अर्पण करनी थी तथा सूप में से श्रद्धावानों को प्राप्त चावल और दाल एवं दो केले आदिमाता को अर्पण करने थे। बाद में दाल और चावल संस्था के ‘अन्नपूर्णा’ योजना में इस्तेमाल किए जाने थे। तीन केलों में से एक केला प्रसाद स्वरूप श्रद्धावान को दिया जा रहा था। इस तरह से यह परिक्रमा पूरी हो रही थी। तत्पश्चात श्रद्धावान मुख्य स्टेज पर चण्डिकाकुल के पास स्थित आदिमाता शताक्षी शाकंभरी तथा आदिमाता अंजनामाता के दर्शन करके तृप्त हो रहे थे। शताक्षी शाकंभरी की फल एवं सब्जियों से की गई लुभावनी सजावट थी! उत्सव के सातों दिन, हर दिन नए नए तरीकों से की गई सजावट श्रद्धावानों का ध्यान आकर्षित करती रही। आकर्षक रंगों के फलों और सब्जियों से गूँधी गई मालाएं और उनकी भिन्न भिन्न रचनाएं देखकर, इस निरंतर अन्न की पूरती करनेवाली, सूखे की परिस्थिति में भी जरुरतमंद, भूखों को भूखा न रहनेदेनेवाली शताक्षी शाकंभरी देवी के दर्शन करते हुए आदिमाता के प्रेम से श्रद्धावानों के कण्ठ रुंध जाते थे।

मुख्य स्टेज के दर्शन के लिए स्टेज के पास जाते हुए

मुख्य स्टेज के पास दर्शन के लिए स्टेज के पास जाते समय तथा दर्शन करके बाहर निकलते समय श्रद्धावान वहां पर उभारी हुई ‘झालरियों’ (छत्र) के नीचे से गुजरते थे। परमपूज्य बापूजी ने त्रिविक्रम के अल्गोरिदम्स के बारे में प्रवचन में समझाया था कि, इन झालरियों पर शुभ चिन्हों का समावेश था। मानो वह ’झालर’ अपनी बड़ी मां का पल्लू ही था और मां के पल्लू का सहारा प्रत्येक श्रद्धावान को मिल रहा था।

गुह्यसूक्तम्

तीर्थजल से भरा हुआ कुंभ हाथ में लिए श्रीपंचमुख हनुमानजी और श्रीअश्विनीकुमारों की आकर्षक, सुन्दर मूर्तियां स्थापन किए गए कक्ष में परिक्रमा करते हुए गुह्यसूक्तम्‌ श्रद्धावानों को सुनाई दे रहा था। कुंभ में दिया गया तीर्थजल तापी, इंद्रायणी व पांजरा नदियों से लाया गया था। श्रद्धावानों को तीर्थजल कुंभ अपनी बाईं हथेली पर रखकर उस पर अपनी दाईं हथेली रखकर गुह्यसूक्तम्‌ सुनते हुए परिक्रमा करनी थी। यह गुह्यसूक्तम्‌ था ’द हीलिंग कोड’ जो अपने शरीर, मन की किसी भी बीमारी के इलाज हेतु आवश्यक शक्ति प्रदान करता है।

पंचमुख हनुंमत से अश्विनीकुमारों से पंचमुख हनुमंत तक कम से कम तीन परिक्रमाएं पूरी करने पर श्रद्धावान जलकुंभ लिए पुष्करिणी तीर्थ तक आ पहुंचते थे और उषादेवी तथा त्रिविक्रम की ओर देखते हुए कुंभ में से तीर्थजल पुषकरिणी तीर्थ में अर्पण कर देते थे।

सप्तचक्रस्वामिनी महापूजन

इसी तरह श्रीहरिगुरुग्राम के पास स्थित उत्तर भारतीय संघ हॉल में बड़ी मां की भव्य प्रतिमा के समक्ष श्रद्धावानों द्वारा किया गया सप्तचक्र-स्वामिनी महापूजन भी सारे श्रद्धावानों के लिए आनंददाई था। महापूजन करनेवाले श्रद्धावान श्रीहरिगुरुग्राम में जाकर मुख्य स्टेज पर शताक्षी शाकंभरी देवी के समक्ष साग-सब्जियां एवं फल, तथा अंजनामाता के समक्ष ब्लाऊजपीस (वस्त्र) अर्पण करते थे। दिनभर मुख्य स्टेज पर चल रहा पूजन और भोग अर्पण समारोह भी बहुत सुन्दर अनुभव कराता था। संपूर्ण 7 दिन मुख्य स्टेज के समक्ष बैठकर रात्रिपठन के लिए भी श्रद्धावान बड़े उत्साह से शामिल होते थे। सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी ने ‘विश्वार्पण कलश’ समारोह से यह उत्सव संपन्न किया। तब अनिरुद्धजी ने श्रद्धावानों से कहा कि, “मेरी सांसे मैंने आपको हमेशा के लिए दे दी हैं, इन सांसों का हमेशा स्मरण रहे।”