AniruddhaFoundation-Shree Venkatesh Saptakoti Jap-Revised

विठ्ठल एवं व्यंकटेश ये दोनो ही महाविष्णु के ही रुप हैं। लगभग ३०० वर्षो पूर्व रामानुजाचार्य ने अपने इस महाविष्णु की, व्यंकटेश की उपासना एक अत्यन्त ही निराले एवं सुंदर तरीके से की थी।

ॐ व्यंकटेशाय नम:। इस अष्टाक्षरी मंत्र से ‘सप्तकोटी अर्चनम’ यह विधि करके उन्होंने इस उपासना को पूर्णत्व प्रदान किया।

यही उपासना अपने सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने वैशाख शुद्ध विनायक चतुर्थी दिनांक ७ मई २००० से लेकर मोहिनी एकादशी दिनांक १४ मई २००० इस कालावधि के अन्तर्गत अपने श्रद्धावानों से पूर्ण करवाया।

श्री व्यंकटेश सप्तकोटी जप की घोषणा होते ही हजारों श्रद्धावानों का समूह इस समारोह के तैयारी हेतु उद्युक्त हो गया। श्री व्यंकटेश की सात फूट उँची मूर्ति बनाई गई और मूर्ति बनाते समय ही ‘सप्तचक्र’ की स्थापना इस मूर्ति में की गई थी। ४९ श्रद्धावानों से सातों ही चक्रों के विविध मंत्रों का पठन वैसे ही अन्य सात श्रद्धावानों से विशिष्ठ मंत्रों का एक करोड़ बार पठन करवा कर ही ये सप्तचक्र सिद्ध किया गया, और इसके पश्‍चात्‌ ही इस चक्र की स्थापना मूर्ति में की गई। प्रतिदिन १४०० श्रद्धावान नियोजित रुप में उन्हें चुनकर दिए गए स्थानोंपर बैठकर संपूर्ण दिवस ‘ॐ व्यंकटेशाय नम:।’ यह मंत्र जप प्रतिदिन बारह घंटो तक इसी नियमानुसार सात दिनों तक अत्यन्त भक्तिभाव के साथ करते थे। सातवे दिन प्रात: बेला में ही यह सात करोड़ जप पूर्ण हुआ। पर फिर भी डॉ. अनिरुद्ध जोशी (सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू) का जप रात्रि तक चलताही रहा। प्रत्यक्ष रुप में इन १४०० नियोजित श्रद्धावानों के साथ सातों दिन लाखों श्रद्धावानों ने यह जप किया। जिनकी संख्या की गणना तो की ही नहीं जा सकती थी। बिल्कुल नियमबद्ध, रुपरेखाबद्ध तरीके से एवं शिष्टाचार बद्ध पद्धति से यह जप चल रहा था। पुरुष श्रद्धावानों ने तिरुपती की परंपरानुसार किया हुआ केश अर्पण एवं उसी प्रकार की विशिष्ट वेशभूषा अष्टगंध से रेखांकित किया गया नाम। इससे वातावरण भक्तिभाव के अत्यंत सुंदर धरातल पर पहुँच गया था।

पापमोचन कुंड नामक पवित्र कुंड बनाया गया था। उसके चहुँ ओर हर एक श्रद्धावान द्वारा सिर पर पवित्र इष्टिका रखकर प्रदक्षिणा करने का उपक्रम चल रहा था। प्रदक्षिणा के दौरान ‘गोविंदा, गोविंदा – जय व्यंकटेश गोपाला’ यह जप कहना था। वे इष्टिकाएँ भी अत्यंत पवित्र ऐसे पद्म सरोवर, पुष्करिणी तीर्थ एवं पापमोचन सरोवर इन स्थानों से पवित्र मृत्तिका एवं पवित्र जल लाकर उससे ही तैयार की गई थी। प्रदक्षिणा करते समय जप के साथ ही मन में प्रार्थना करनी थी, ‘‘हे भगवान, आजतक मैने बहुत बार गलतियाँ की हैं, परंतु इसके आगे मेरे हाथों से कम से कम गलती हो, यह प्रार्थना एवं जप करते हुए श्रद्धावान कितनी ही बार इस प्रदक्षिणा का लाभ उठा सकता था। कारण सभी श्रद्धावानों के लिए इस उपक्रम की रचना विनामूल्य की गई थी।

व्यंकटेश की मूर्ति को प्रतिदिन विशिष्ट प्रकार के आभूषणों से अलंकृत किया जाता था। तथा महापुष्पम हार पहनाये जाते थे। इनकी शोभा अवर्णनीय थी। अर्पण किया जानेवाला महाभोग भी काफी अद्भुत एवं भव्य प्रकार का था। पहले एवं पाँचवे दिन फलों का, दूसरे एवं छठे दिन लड्डुओंका, तिसरे एवं सातवे दिन कुरमुरे के लड्डुओं का भोग, चौथे एवं आठवे दिन दहि भात (चावल) इस प्रकार का महाभोग अर्पण किया गया था। इस महाभोग का प्रसाद तथा श्रद्धावानों द्वारा लाया गया प्रसाद अनाथालायों में विद्यार्थियों, वृद्धों एवं जरूरातमंदो में बाँट दिया गया।

महाभोग अर्पण करते समय ‘‘रमया रमणाय व्यंकटेशाय मंगलम। सर्व लोकनिवासाय श्रीनिवासाय मंगलम।” नित्यप्रति की आरती में संतश्रेष्ठ पुरंदरदास की कन्नड भाषाकी रचना एवं तामिलनाडू की संत कवियित्री देवी अंडाल की रचना अत्यन्त भक्तिभाव के साथ कहते थे। उत्सव के पहले ही दिन सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने उस रचना का अर्थ श्रद्धावानों को समझा दिया था। भक्तिप्रेम में सराबोर तथा श्रद्धावान परमेश्‍वर के बीच के अप्रतिम, प्रेममय नाते को दर्शानेवाली आरती बहुतही लयबद्ध एवं सुंदर मनमोहक थी।

इस तरह से यह संपूर्ण उत्सव अत्यन्त ही पवित्र वातावरण में संपन्न हुआ। हर एक श्रद्धावान अत्यन्त उत्साह के साथ इस उत्सव में सहभागी हुआ था। सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध बापू ने इस उत्सव के माध्यम से सभी श्रद्धावानों को अपनी अपनी गलतियों को सुधारने एवं पाप मुक्ति का पवित्र अवसर प्रदान किया था।

श्री व्यंकटेश की अत्यंत रसमय एवं सुमधुर उत्कट भक्तिपूर्ण आरतीं भक्तों के मन पर अपनी विशेष छाप छोडने वाली थीं। हर एक श्रद्धावान ने इस उत्सव में एक महत्त्वपूर्ण बात सिखी और वह यह कि जो बात हमारे सद्गुरु को पसंद नहीं उसे हमें नहीं करनी चाहिए तथा अत्यन्त प्रेममय, विश्‍वास युक्त शारण्य अपने इस प्यारे सद्गुरु को अर्पण करना चाहिए।