संतश्रेष्ठ श्रीतुलसीदासजीद्वारा लिखे गये रामायण का पठन संपूर्ण भारत में होता है। कलियुग में रामनाम और रामभक्ति का प्रसार तुलसीदासजी द्वारा लिखे गये इस रामायण के माध्यम से हर तरफ फैला। ‘वाल्मिकी रामायण’ तो रामजन्म से कई वर्ष पहले ही लिखा गया था। वाल्मिकी रामायण के हजारों साल बाद ‘तुलसी रामायण’ लिखा गया। ’तुलसीदासजी की प्रत्येक साँस रामनाम से जुड़ गयी थी और जिस पल उनके हॄदय की प्रत्येक धड़कन रामनाम से जुड़ गयी उसी पल साक्षात हनुमानजी ने तुलसीदासजी को दर्शन दिया। प्रभू हनुमानजी ने तुलसीदासजी के नजरों के समक्ष प्रत्यक्ष संपूर्ण रामकथा जीवित कर दी और यह जीवित कथा देखते हुए तुलसीदासजी ने ‘रामचरितमानस’ नामक रामकथा लिखकर पूरी की।’ ऐसा सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धजी (बापू) ने तुलसीदासजी के महानता का गुणगान करते हुए कहा था।

इसी तुलसी रामायण के ‘सुन्दरकाण्ड’ का पठन, पारायण समूचे भारत में किया जाता है। भारत में अनेक भाषाएँ हैं, फिर भी तुलसीदासजी द्वारा हिन्दी भाषा में लिखे गए ‘सुन्दरकाण्ड’ का पठन संपूर्ण भारत में जगह-जगह पर होता है।

बापूजी सभी श्रद्धावानों को जोर देकर सुंदरकाण्ड का पठन करने के लिए कहते हैं। बापूजी समय समय पर ‘सुंदरकाण्ड’ पठन का महत्त्व अपने प्रवचन में बताते रहते हैं।

१७ मई से २१ मई २०१६ के दौरान ‘श्री अनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन’ द्वारा सुंदरकाण्ड पठन, पूजन और अभिषेक उत्सव आयोजित किया गया। सुबह ९.०० से शाम ७.०० बजे तक संपूर्ण वैदिक पद्धति अनुसार पूजन और निरंतर पठन किया गया। इस उत्सवकाल में प्रतिदिन १०८ बार ‘सुंदरकाण्ड’ का पठन होता था। प्रपाठकों के साथ हजारों भक्त इस पठन में हर दिन शामिल होते थे। अत: उत्सव स्थल पर अनगिनत बार ‘सुंदरकाण्ड’ का पाठ होता था। उस वर्ष जनवरी महीने में गुरुक्षेत्रम्‌ में भी निरंतर ‘सुंदरकाण्ड’ पठन का अयोजन किया गया था। यहाँ पर १२०० बार ‘सुंदरकाण्ड’ का पठन हुआ। बापूजी के निवासस्थान पर मंदिर में जो रामपंचायतन की मूर्तियाँ हैं, उनका विधि से पूजन एवं अर्चना करके यह पठन ‘गुरुक्षेत्रम्‌’ में किया गया।

‘रामायण की सबसे श्रेष्ठ बात कौनसी है’, तो वह ‘सुंदरकाण्ड।’ रामायण के प्रत्येक अध्याय की घटना अनुसार शीर्षक दिए गए हैं। मात्र इसमें एक अध्याय अपवाद है, और वह है ‘सुंदरकाण्ड’। रामकथा का अवकाश है ‘सुंदरकाण्ड।’ इसीलिए महर्षि वाल्मिकी ने इस अध्याय का नाम ही ‘सुंदरकाण्ड’ रखा, ऐसा बापूजी बताते हैं। इस ‘सुंदरकाण्ड’ में श्रीरामजी की आज्ञानुसार, सीतामाता को खोजने, भारत के दक्षिण कोने तक पहुंचे हनुमानजी ने, रावण की लंका की ओर आकाश मार्ग से की गई उड़ान और सितामैय्या से मिलकर उन्हें, रामजी का संदेश देने के बाद, लंकादहन करके लौटने की कथा है।

श्रीरामकथा का एक भाग यह ‘सुंदरकाण्ड’ यानी रामायण का बहुत ही शुभ, सुंदर, तेजोमय और दिव्यता से परिपूर्ण ऊँची चोटी है। श्रीरामकथा सभी विघ्नों का, सभी पापों का, दु:खों का और दुविधाओं का नाश करती है, साथ ही साथ विशुद्ध भक्ति का उदय भी करती है। श्रीराम कथा सर्व श्रद्धावानों के जीवन से सभी बुराईयों का नाश करती है इसलिए संत तुलसीदासजी इसे मंगलभवन अमंगलहारी ऐसे कहते हैं।

’इस सुंदरकाण्ड में क्या नहीं है? मानव जीवन के विकास के लिए, सांसारिक जीवन और परमार्थ के लिए संपूर्ण मार्गदर्शन सुंदरकाण्ड में जगह जगह पर मिलता है। इतना ही नहीं तो इस मार्गदर्शन का लाभ उठाकर संपूर्ण जीवन उत्कृष्ट बनाने के लिए, सुख, शान्ति एवं तृप्ति की प्राप्ति के लिए आवश्यक सामर्थ्य भी देने की क्षमता सुंदरकाण्ड में है। ऐसे श्री अनिरुद्धजी ने दैनिक ’प्रत्यक्ष’ में सुंदरकाण्ड पर लिखे गये अपने पहले अग्रलेख में कहा है।

सन २००७ के नारद जयंती (३ मई २००७) से बापू ‘सुंदरकाण्ड’ पर अग्रलेख लिख रहे हैं। ‘तुलसीपत्र’ नामक शीर्षक पर बापू द्वारा लिखे जा रहे इन  अग्रलेखों में तुलसीदासजी के सुंदरकाण्ड की प्रत्येक चैपाई और उसका अर्थ बताते हुए बापूजी ने अब तक अनेक कथाएँ बताईं। विश्व इतिहास भी इस माध्यम से बापूजी ने लिखा। इस ‘तुलसीपत्र’ अग्रलेख श्रुंखला के अब तक १५०० से अधिक अग्रलेख हो चुके हैं।

बापूजी ने श्रद्धावानों को अनेक बार प्रवचन में बताए अनुसार तुलसीरामायण रचित ‘सुंदरकाण्ड’ में विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना एवं आशीर्वाद है। महाप्रान हनुमानजी सितामैय्या की भेंट लेकर उन्हें रामजी का संदेश देते हैं और अशोकवन में बैठी हुई सीतामाता का शोकहरण करते हैं। तब सीताजी द्वारा की गई प्रार्थना और हनुमानजी द्वारा श्रीराम को भेजा गया संदेश, यह इस विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना है, ऐसे बापूजी कहते हैं।

दीन दयाल बिरिदु संभारी हरहु नाथ मम संकट भारी॥

बापूजी के मार्गदर्शन अनुसार हजारों भक्त ’सुंदरकाण्ड’ का नित्य पाठ करते हैं।