AniruddhaFoundation-Dassera Utsav

दशहरे के (विजयादशमी) उत्सव का महत्त्व:

सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापूने अपने २४ अक्तूबर २०१२ के प्रवचन में दशहरे के सच्चे महत्त्व को बतलाते हुए कहा कि सीमोल्लंघन अर्थात अपनी सीमा से आगे बढ़ना अर्थात अपनी मर्यादा की सीमा का विस्तार करना, अपनी क्षमता अपनी मर्यादा को कायम रखते हुए सामर्थ्य बढ़ाना, बुराईयों को पिछे छोड़ देना है। अपनी क्षमता एवं सामर्थ्य को बढा़ने के लिये यह दिवस अतिशय महत्वपूर्ण हैं।

इस दिन सुबह सरस्वतीदेवी की और शाम को शस्त्रों की पूजा की जाती है। यानि ज्ञान और विज्ञान की पूजा इस दिन की जाती है। यह सब किस लिये? स्वयं का कौशल्य तथा सुसंगतता इन्हें बढा़वा देने के लिये। विजयादशमी याने यशप्राप्त करने का दिन दशहरा इसी अर्थ से यह वैशिष्टपूर्ण दिन है और इसीलिये श्री अनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन इस दिन को अत्यंत उत्साहपूर्ण रूप में /(तरीके से ) मनाता है।

दशहरा उत्सव कार्यक्रम :

इस दिन सभी श्रद्धावान भक्तजन सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध के मार्गदर्शनानुसार ‘विजयोपासना’ करते हैं। इसी दिन श्रीअनिरुद्ध द्वारा पुनर्जीवित किए हुए भारतीय प्राच्यविद्या प्रशिक्षण में अंतर्भूत होनेवाले आयुधों का पूजन किया जाता है। इनमें मुद्‌गल, तलवार, फरी, गदा, जोड़काठी, लठ्ठ, कठ्ठ आदि का समावेश होता है।

 

दशहरे के (विजयादशमी) दिन घरेलू तौर पर किया जानेवाला पूजन:

सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापू के कहेनुसार दशहरा अर्थात विजयादशमी के दिन श्रद्धावानों श्रीमहासरस्वती एवं सरस्वती का पूजन करना सुखदायी होता है। पूजन के लिए स्लेट (पाटी) पर श्रीमहासरस्वती एवं सरस्वती की प्रतिमाएँ बनायी जाती है और अत्यन्त प्रेमपूर्वक उनका पूजन किया जाता है। यह दोनों प्रतिमाएँ एक दुसरे के साथ में हि बनायी जाती हैं।

हमारे जीवन का भाग्य हम स्वयं ही बनाते है। इसके लिये आवश्यक होनेवाली उर्जा इन प्रतिकों के सहायता से हमे प्राप्त होती है। ज्ञान से प्रेम की पूजा और प्रेम से ज्ञान की पूजा इनका एकत्रितकरण यानि इन दो प्रतिकों की पूजा।