AniruddhaFoundation-Maghi Ganapati Janmotsav

१) माघी गणेशजी की जानकारी :

पार्वती माता ने जिस दिन विश्व के घनप्राण को साकार किया गया वह दिन था माघ शुद्ध चौथ का, इसीलिए इस दिन गणेशजी का जो उत्सव मनाया जाता है उसे ‘माघी गणेशोत्सव’ कहते हैं।

२) माघी गणेशजी का महत्व :

ऋग्वेद में जिनका उल्लेख ‘ब्रह्मणस्पति’ किया जाता है, उनके आगेवाले दाहिने हाथ में मोदक है। बाएं हाथ में उन्हीं का टूटा हुआ दंत है तो पिछले दोनों हाथों में से एक में परशु तो दूसरे में पाश ये आयुध हैं। मूलाधार चक्र के स्वामी ‘श्रीगणपती’ हैं।

३) माघी गणेश उत्सव का महत्व :

हर वर्ष माघ शुद्ध चौथ के दिन, श्री अनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन, भारतीय भाषा संगम एवं अनिरुद्धाज्‌ हाऊस ऑफ फ्रेन्ड्स के संयुक्त सौजन्य से ‘माघी गणेश जयंती’ का उत्सव मनाया जाता है। इसका महत्व बहुत ही अनोखा है। सन २००९ से श्री अनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन यह उत्सव मनाता आया है। ’गुरु’ नाम ही गणेशजी हैं, वन्ही (अग्नि) एवं विष्णु का एक होना – पूजन करना इसीलिए अष्टविनायक तथा ब्रह्मणस्पतिजी की एकसाथ उपासना केवल ‘गुरुस्थानम्‌’ की स्थापना के बाद ही सामर्थ्य प्रदान कर सकती है। इसी वजह से श्री गुरुक्षेत्रम्‌ की स्थापना के बाद से ही श्री अनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन द्वारा माघी गणेशोत्सव मनाया जाने लगा है। (श्री अनिरुद्ध गुरुक्षेत्रम्‌ की स्थापना सन २००७ में हुई).

४) माघी गणेश उत्सव समारोह :

माघ शुद्ध चौथ के दिन जो गणेशोत्सव मनाया जाता है उसी को माघी गणेशोत्सव कहते हैं। अपनी संस्था द्वारा निम्नानुसार पूजन करके माघी गणेशोत्सव मनाया जाता है।

माघी गणेश चौथ के दिन दोपहर को ‘एक-दिन-साध्य श्रीगणेशप्रतिष्ठा याग’ किया जाता है। यज्ञ के समक्ष ब्रह्मणस्पति गणपतिजी की स्थापना की जाती है। इस याग को संपन्न करने के लिए विशेष तौर पर विशेष पुरोहित बुलाए जाते हैं।

इस उत्सव में यज्ञ के समक्ष प्रतिष्ठित की गई ब्रह्मणस्पतिजी की मूर्ति के दर्शन होते हैं। इसके अलावा उत्सव के दौरान ब्रह्मणस्पतिजी की मूर्ति पर ब्रह्मणस्पति सूक्त के पठनद्वारा अभिषेक किया जाता है। शाम के चार बजे से रात के ग्यारह बजे तक गणपती अथर्वशीर्ष का पुरश्चरण किया जाता है। तब सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापूजी के निवासस्थानस्थित मंदिर से ब्रह्मणस्पति की मूर्ति उत्सव स्थल पर लाई जाती है और उस मूर्ति का आठ नदियों के जल से अभिषेक किया जाता है।

ब्रह्मणस्पति सूक्त ऋग्वेद के इंद्र पुत्र – गृत्समद शौनक ऋषि द्वारा लिखा हुआ अत्यंत पवित्र सूक्त है। यह सूक्त केवल व्यक्ति का ही नहीं, समाज का ही नहीं बल्कि, अपने राष्ट्र का भी भला करनेवाला, राष्ट्र के, प्रत्येक नागरिक को समर्थ और निर्भय करनेवाला सूक्त है।

माघी गणेश उत्सव का एक और महत्वपूर्ण सूत्र है श्री अष्टविनायक का पूजन और दर्शन।

अष्टविनायक अर्थात गणेशजी के आठ पवित्र स्थान – तीर्थक्षेत्र। प्रत्येक जीवात्मा में परमेश्वर के अष्टबीज ऐश्वर्यों को नौं अंकुर ऐश्वर्यों में परिवर्तित करनेवाला परमात्मा बसता है। परमेश्वर की कृपा प्रत्येक जीव को प्राप्त हो इसलिए परमात्मा जो रचना, जो व्यवस्था स्थूल, सूक्ष्म एवं तरल शरीर में अर्थात भौतिक प्राणमय और मनोमय देह में उत्पन्न करते हैं, वह व्यवस्था, वह यंत्रणा ही गणेशजी हैं और उस व्यवस्था में से वे आठ महत्वपूर्ण केंद्र, स्थान ही अष्टविनायक हैं।

आम इन्सान अंतर्मुख नहीं हो सकता, अपने भीतर नहीं झांक सकता इसलिए वह साकार अष्टविनायक के दर्शन कर सके, तथा उसके देह में बसे अष्टविनायकों की कृपा उसे प्राप्त हो सके इसलिए ऋषियों ने तपस्या करके अष्टविनायकों के स्थान प्रगट किए – वे आठ महत्वपूर्ण स्थान ही अष्टविनायक हैं।

अष्टविनायक के प्रत्येक स्थान में जैसी गणेशजी की मूर्तियां हैं, वैसी ही मूर्तियां इस उत्सव में बनाकर रखी जाती है। श्रद्धावान यहां पर अष्टविनायक के दर्शन कर सकता है। प्रत्येक श्रद्धावान भक्त ब्रह्मणस्पति का पूजन लाल फूल और दुर्वा अर्पण करके कर सकता है।

सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धजी ने श्रद्धावानों के लिए ब्रह्मणस्पति का निम्नलिखित मंत्र दिया है –

‘ॐ श्रीब्रह्मणस्पतये पार्वतीपुत्राय मंगलमूर्तये गणपतये विश्वघनप्राणाय सर्वविघ्ननिवारकाय नमो नम:।’

श्रद्धावान उपरोक्त जप गणपति उत्सव के दौरान, हर मंगलवार को एवं गणेशचौथ के दिन ७२बार जपते हैं और हररोज 8 बार जपते हैं।

श्रद्धावानों पर बिनालाभ प्रेम करनेवाले श्री अनिरुद्धजी ने हम श्रद्धावानों को उनके नवअंकुर ऐश्वर्य प्राप्त हो पाएं तथा प्रत्येक के देह के आठ क्षेत्र अच्छी तरह से कार्यरत हो पाएं इसलिए माघी गणेशोत्सव का आयोजन किया है।