‘श्री अनिरुद्ध उपासना फाउंडेशन’, ‘भारतीय भाषा संगम’ और ‘श्री अनिरुद्धाज् हाऊस ऑफ फ्रेंड्स’ये संस्थाएँ २००९ से, माघ महीने के शुद्ध (शुक्ल) चतुर्थी के दिन ‘श्री माघी गणेश महोत्सव’ मना रही हैं । सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी के मार्गदर्शन के अनुसार, माघी गणेश चतुर्थी के दिन संपूर्ण वैदिक पद्धत्ति से ‘एक-दिन-साध्य श्रीगणेश-प्रतिष्ठा’ याग आयोजित किया जाता है ।

मानव शरीर के सप्तचक्रों में ‘मुलाधारचक्र’, के स्वामी ‘श्रीगणेशजी’, हैं जिनका मूल रूप है ’ब्रह्मणस्पति’! जिनके दाहिने हाथ में ’मोदक’, बायें हाथ में टूटा हुआ दंत और पिछले दो हाथों में, परशू और पाश ये चार आयुध हैं। ऋग्वेदों में ,ऐसे गणेशजी का, ‘ब्रह्मणस्पति’ के नाम से उल्लेख किया गया है।

‘ब्रह्मणस्पति’, माता श्रीशिवगंगागौरी और परमपिता श्रीकिरातरुद्र के / इस शिव-पार्वती रुप  के पुत्र हैं और गणेशजी परमपिता शिव तथा माता पार्वती के पुत्र हैं । ‘ब्रह्मणस्पति’ अवतार ‘घनप्राण’ हैं अर्थात द्रव्यशक्ति के उपयोग से मानव के त्रिविध देह में (मन, प्राण, प्रज्ञा) तथा प्रकृति में स्थूल स्तर पर निर्माण होनेवाली ‘कार्यशक्ति’ हैं। इसी कार्यशक्ति को अथवा घनप्राण को, ‘गणपती’  कहा जाता है ।

ब्रह्मणस्पति द्वारा धारण किये गए इन चार साधनों का संबंध मानव के मूलाधारचक्र के ‘आहार, विहार, आचार और विचार’ इन ४ दलों से जोड़ा जाता है ।

इन चार साधनों का महत्व निम्नलिखित नुसार

मोदकमूलाधार चक्र के चार दल आहार, विहार, आचार और विचार होते हैं । इनमें से ‘आहार’ दल पर गणेशजी के प्रभाव का प्रतीक है ‘मोदक’ । जो कुछ भी हम अन्न के द्वारा या मन के द्वारा ग्रहण करते हैं वह सब कुछ मंगलमय हो, इसके लिए उपयोग किया जानेवाला शस्त्र है – मोदक ।

दन्तमूलाधार चक्र के ‘विहार’ दल पर गणेशजी के प्रभाव का प्रतीक है – दन्त । मानव का मन भटकता है, बुद्धि प्रवास करती है, शरीर-प्राण कालगति का अनुसरण करते हैं और इसी से सुख-दुख का अनुभव होता है । ‘दंत’ ऐसा अस्त्र है, जो ‘विहार’ कैसा होना चाहिए, यह सिखाता है और मानव के मन-बुद्धि को भटकने से रोकता है ।

पाश‘पाश’ अर्थात बंधन । मानव के ‘आचार’ को अर्थात बर्ताव को नियंत्रित करनेवाला अस्त्र !  इसीलिए मूलाधारचक्र के ‘आचार’ दल पर गणेशजी के प्रभाव का प्रतीक ‘पाश’ है ।

परशु यह अस्त्र मानव के विचारों को उचित आकार देता है । मूलाधार चक्र के ‘विचार’ दल पर गणेशजी के प्रभाव का यह प्रतीक है ।

गणेशजी को ये सभी अधिकार आदिमाता अनसूयास्वरूप माता चण्डिका द्वारा प्राप्त हुए हैं । इस लीला के फलस्वरूप ही विश्व के घनप्राण जो गणेशजी हैं, जो मंगलमूर्ति हैं, वे विघ्नहर्ता बनते हैं।

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने श्रध्दावानों के लिए ब्रह्मणस्पति मंत्र का पठन निम्नलिखित नुसार बताया है :

श्री ब्रह्मणस्पतये पार्वतीपुत्राय मंगलमूर्तये गणपतये विश्वघनप्राणाय सर्वविघ्ननिवारकाय नमो नमः॥ 

श्रद्धावान, गणेशोत्सव में या हर मंगलवार के दिन तथा संकष्टी चतुर्थी के दिन, इस मंत्र का जप ७२ बार या प्रतिदिन १०८ बार करते हैं ।

श्री अष्टविनायक का पूजन एवं दर्शन

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने कहा है कि “हर मानव को परमेश्वर की कृपा प्राप्त करवाने के लिए मानव के त्रिविध देह में एक यंत्रप्रणाली सक्रिय होती है, जो गणेशजी के  नियंत्रण में होती है । इस प्रणाली के आठ महत्वपूर्ण स्थान हैं जो अष्टविनायक के अधिकार के अंतर्गत आते हैं । परमेश्वर की कृपा का स्वीकार करने में मनुष्य के प्रज्ञापराधों के कारण जो बाधायें उत्पन्न होती हैं, उन बाधाओं का विनाश हो, यह प्रार्थना अष्टविनायक के चरणों में की जाती है।

अष्टविनायक के मूल स्थानों पर जै्सी गणेशजी की मूर्तियां स्थापित हैं, वैसी ही सभी मूर्तियां इस उत्सव में प्रतिष्ठित की जाती हैं । हर एक श्रद्धावान ब्रह्मणस्पति को और अष्टविनायक को फूल तथा दुर्वा अर्पण कर सकता है । शाम ४:०० बजे से रात ९:४५ तक, ‘गणपती अथर्वशीर्ष’ का १०८ बार पुनश्चरण किया जाता है । ब्रम्हणस्पति के मंत्रजप के साथ-साथ अथर्वशीर्ष के पाठ में भी श्रद्धावान सहभागी हो सकते हैं।

माता शिवगंगागौरी पूजन :

ब्रह्मणस्पति, माता श्री शिवगंगागौरी के पुत्र हैं, इसीलिए‘एक-दिन-साध्य श्री गणेशप्रतिष्ठा याग’ के साथ ही माता श्री शिवगंगागौरी का भी वैदिक मंत्रोंच्चा द्वारा षोडशोपचार पूजन तथा अर्चन किया जाता है । इसके साथ ही, माता श्री शिवगंगागौरी ‘अष्टोत्तर-शतनामावली’ का अखंड पठन किया जाता है और माता श्री शिवगंगागौरी को हरिद्रा (हल्दी) अर्पण किया जाता है।

श्री ब्रह्मणस्पति और अष्टविनायक का दर्शन करने से परमेश्वर की कृपा का स्वीकार करने में जो विघ्न आते हैं, उन्हें दूर करने एवं अपने जीवन को परमेश्वर की कृपा से अधिकतम विकसित करने का  सुनहरा अवसर  सद्‍गुरु की कृपा से इस ‘माघी गणेशजन्मोत्सव ‘ द्वारा श्रध्दावानों को प्राप्त होता है और इसीलिए श्रद्धावान हर वर्ष ‘श्री माघी गणेश का जन्मोत्सव’ उत्साह से मनाते हैं ।