१) सच्चिदानंद उत्सव का क्या अर्थ है?

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“मासानां मार्गशीर्षोहम्” यानि सभी महीनों में मार्गशीर्ष महीना यह अत्यंत शुभ, पवित्र और श्रेष्ठ मास माना जाता है। मार्गशीर्ष मास यानि संपूर्ण महाविष्णु। ऐसे इस पवित्र मार्गशीर्ष मास में, सदगुरु श्री अनिरूध्द बापू ने सभी श्रध्दावानों को “सच्चिदानंद उत्सव” अपने घर में देढ़ दिन या पांच दिन मनाने का अवसर प्रदान किया हैं। इस उत्सव में सभी श्रध्दावान रामनाम बही के अत्यंत पवित्र कागज के लुगदी से बनाई गयी सदगुरु के पादुकाओं का पूजन अत्यंत आनंद और जोश से करतें हैं।

२) पादुकापूजन का महत्त्व –

भरत को श्रीराम के चरणों से जुदा (दूर) करना मुमकीन नहीं यह बात परम दयालु लक्ष्मण और वात्सल्य मूर्ति जानकी भली भांति जानतें थे। इसीलिए वे भरत को श्रीराम की पादुका अपने साथ ले जाने के लिए कहतें हैं। यही था विश्व में परमात्मा के पादुकाओं का पहला (प्रथम) पादुकापूजन!

इस तरह से यह पादुकापूजन यानि श्रद्धावानों को अपने सद्‌गुरु के प्रति होनेवाले कृतज्ञता, अंबज्ञता के भाव को जाहिर (व्यक्त) करने का सुनहरा योग है।

३) सच्चिदानंद उत्सव कैसें मनाया जाता हैं ?

मार्गशीर्ष महीने के दूसरे शनिवार को इस उत्सव की शुरुआत होती है।

सच्चिदानंद उत्सव में प्रथम दिन पादुकाओं की प्रतिष्ठापना पूजा होती है। उसके पश्चात उस दिन शाम को और जब तक पादुका घर में हैं तब तक (देढ़ या ५ दिन) नित्य पूजा करतें हैं। जिस दिन पादुकाओं का विसर्जन करतें हैं, उस दिन “पुनर्मिलाप आवाहन” किया जाता है यानि श्री अनिरूध्द का अस्तित्त्व अगले पूरे वर्ष तक (साल भर) अपने घर में रहें इसीलिए विसर्जन के लिए निकलने से पहले पूजन किया जाता है।   इस के बारे में सारी जानकारी “सच्चिदानंदोत्सव” इस पुस्तक में दी गयी है।

४) सच्चिदानंद उत्सव का लाभ –

जब मैं पादुका घर लाकर उनका पूजन करता हूं, तब मेरे मन में सदगुरु के प्रति प्रेमभाव, कृतज्ञताभाव सक्रिय हो जाता है।जो पादुका पूजन हम करतें हैं, उससे हमारा सदगुरु के प्राप्ति का मार्ग, सदगुरु के तरफ प्रेमप्रवास का मार्ग आसान बन जाता है।जब हम प्रेम से पादुका पूजन करतें हैं तब हमारे देह में मन, प्राण, प्रज्ञा इन तीनों स्तरों पर होनेवाली अनुचितता दूर होकर हमारा समग्र जीवन विकास होने में सहायता मिलती हैं अर्थात जीवन में सच्चिदानंद उत्सव नित्य रूप से मनाया जाता है ऐसी श्रद्धावानों की भावना है।सच्चिदानंद उत्सव में जो अथर्व स्तोत्र है उससे हमारी चंचलता का नाश करके, हमें गुरु तेज प्रदान किया जाता है। प्रपंच और परमार्थ एक ही वक्त में सुखदायी होता है ऐसा श्रद्धावानों का मानना है।

यह उत्सव हमारे जिंदगी में कायापलट कर देता है और हमें देवयान पंथ पर दृढ करता है।