श्रीवर्धमान व्रताधिराज अर्थात?

‘श्रीवर्धमान व्रताधिराज’ अर्थात यच्चयावत सभी व्रतों के मुकुटशिरोमणि।

श्रीवर्धमान व्रताधिराज अर्थात मानव जन्म में आकर मानवी जन्म व्यर्थ न जाने देने की गवाही।

श्रीवर्धमान व्रताधिराज अर्थात सभी सामान्य लोगों से, संतों तक अशिक्षितों से उच्चशिक्षितों तक, महापापियों से पुण्यवानों तक हर किसी के लिए समानरूप में भगवत कृपा का आधार एवं दु:खमय प्रारब्ध का नाश करनेवाला सर्वोच्च व्रत है यह।

श्रीवर्धमान व्रताधिराज उत्पत्ति कथा :

त्तगुरु के चिंतन एवं श्रीविठ्ठल की भक्ति में सदैव रममाण होनेवाले सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धबापू के मानवी सद्‌गुरु श्रीविद्यामकरंद गोपीनाथशास्त्री पाध्ये ने एक दिन,
‘बुडती, हे जन पाहवे ना डोळा ।
म्हणून कळवळा येतो त्यांचा॥’
यह संतश्रेष्ठ तुकाराम महाराज का अत्यंत श्रेष्ठ अभंग निरूपण के लिए लिया। वह दिन कार्तिक एकादशी का था। साथ के गिने चुने लोगों के साथ गोपीनाथशास्त्री निंबगाँव गए थे। निरुपण एवं कीर्तन तो हो चुका था। परन्तु गोपीनाथशास्त्री के मन में मात्र इन शब्दों से करूणा का भावतरंग प्रवाहित होने लगा। उन्होंने विठ्ठल को विनती करनी शुरु कर दी। ‘विठ्ठल, हे भगवन इन दीनबंधू संतों की तड़प को देखकर हम कलियुगी मानवों पर कृपा करके इसके आगे आनेवाले समय में कलि के दु:खदायी प्रभाव से बचने का कोई आसान मार्ग दिखलाइए। हम ठहरें सामान्य मानव भक्ति करने के लिए उलटे-सीधे प्रयास करते हैं परन्तु इस गृहस्थी के बोझ से परेशान सामान्य मनुष्य भक्ति भी भली-भाँति नहीं कर पाता हैं।’
श्रीगोपीनाथ शास्त्री ने वह संपूर्ण रात्रि इसी तड़प में विनती करते हुए बिता दी। अपने पास की विठ्ठलमूर्ति को सीने से लगाकर पांजरा नदी के तीर पर अपने हमेशा के पसंदीदा स्थान पर वे ऐसे ही ९ दिनों तक बगैर कुछ खाये-पीये धरणा देकर वहीं पर बैठ गए। ‘वर्धमान व्रताधिराज’ यह समस्त मानववंशों के परमसुख एवं कल्याण का मार्ग उन्हें मिला एवं श्रीवर्धमान व्रताधिराज सभी मानववंशों के लिए सुलभ हो इसके लिए सहस्त्र पूर्णिमा तक अखंड रूप में वर्धमान जप उनके वंश में शुरु रखा।

श्रीवर्धमान व्रताधिराज से होनेवाले लाभ :

श्रीवर्धमान व्रताधिराज का हमारे जीवन में कम से कम चौबीस बार अथवा अठारहवे वर्ष से लेकर आजीवन वर्ष के संख्या में उससे आधी संख्या इतनी बार भी यदि इस व्रत का पालन किया तो ऐसा व्यक्ति आजीवन अधिकाधिक पुण्यवान एवं सुखी होता ही है। साथ ऐसा व्यक्ति शांति एवं तृप्ति सदैव प्राप्त करता है एवं उतना ही आनंदमय परमार्थ करने का पात्र बनता है।

पूरे जीवन में कम से कम नौ बार अथवा पूरी जिंदगी की संख्या का एक चतुर्थांश संख्या जितना व्रतपालन करनेवाले व्यक्ति के पंचमहापापों का निरसन होता है।

जिस व्यक्तिने अपने पुरे जीवन में कम से कम एक बार तो मन:पूर्वक व्रताधिराज का पालन किया है, उसके मार्ग में आनेवाली दु:खद घटनाओं का दु:ख कम हो जाता है। एक की अपेक्षा जितना अधिक बार इस सांवत्सरिक व्रताधिराज का पालन हम कर सकते हैं उतने ही अधिक प्रमाण में मनुष्य इस भूलोक में अधिकाधिक सुखप्राप्ति एवं दु:खनिवृत्ति प्राप्त करता है।

श्रीवर्धमान व्रताधिराज पुस्तिका :

इस पुस्तिका में यह व्रत कैसे करना है इस संबंध मे सविस्तर जानकारी दी गयी है। इस व्रत के कुल मिलाकर नीचे दिये गये ९ अंग हैं-
१) व्रतकाल एवं पठन
२) वर्ज्य प्रकरण
३) तिल स्नानम्‌
४) त्रिपुरारि त्रिविक्रम मंगलम
५) त्रिदोष धूपशिखा
६) त्रिपुरारि त्रिविक्रम भोग
७) इच्छादान (स्वेच्छानिधि)
८) पुरुषार्थ दर्शन
९) उदयापन / उद्यापन

इस प्रत्येक अंग का पालन कैसे करना है इस विषय की संपूर्ण जानकारी श्रीवर्धमान व्रताधिराज पुस्तिका में उपलब्ध है।