AniruddhaFoundation-Shree Ashwattha Maruti Poojan

१९९६ में सदगुरु श्री अनिरूध्द बापू ने ‘रामनवमी’ उत्सव शुरु किया और बाद में १९९७ से हर साल अश्वत्थ मारुती पूजन उत्सव श्रीक्षेत्र सद्‌गुरु निवास – गुरुकुल जुईनगर इस जगह पर मनाने की शुरुआत हुई।

परमपूज्य बापू कहतें हैं कि, ‘हर मानव का भक्तिमार्गपर का प्रवास और उसके भक्तिमार्ग पर का हर कदम यह हनुमंत के ही मार्गदर्शन से आगे बढ़ता है। श्रीहनुमंत ही श्रध्दावान की उंगली थामकर भक्तिमार्गपर आगे चलाते हैं। इसीलिए हनुमंत की भक्ति, उनका पूजन आवश्यक है।

संत तुलसीदासजीभी हनुमान चलिसा में लिखतें हैं कि

‘नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा।’

इसका अर्थ जो हनुमंत का सदैव नामसुमिरन करता है, उसकी विविध पिड़ाओं से, दु:खों से और संकटों से मुक्ति होती है ।

ऐसे ये हनुमंत हम श्रध्दावानों के लिए रक्षक देवता भी हैं और वे प्रभुरामचंद्र के भक्त भी हैं। इसीलिए इस महाप्राण हनुमंत को अपने जीवन में लाने की नितांत आवश्यकता है और इसी का सुवर्ण अवसर यानि ‘अश्वत्थ मारुती पूजन’।

श्रीअश्वत्थमारुती पूजनविधि और दर्शन सोहला :

सावन महिने में हर शनिचर को श्रीअश्वत्थ मारुती के षोडश उपचारों से पूजन के साथ स्तोत्र, जाप के आवर्तन होतें हैं।

परमपूज्य अनिरुद्ध बापूने स्वहस्त से पाषाणमें अंकित की हुई हनुमंत के शिल्पाकृति की पिछली ओर अश्वत्थ (पिपल) वृक्ष की एक दहनी / ड़ाली अश्वत्थ वृक्ष के प्रतीक के रुप में रखी होती है।

इस शिल्पाकृति के सामने ताँबे के परात में हनुमंत की धातु की रेखीव मूर्ति रखी होती है।

श्रीहनुमंत की माता यानि अंजनामाता। इनके प्रतीक स्वरूप हनुमंत की मूर्ति के सामने जो धुनी माता बनायी जाती है, उसकी पूजा की जाती है।

प्रपाठकों का एक समूह श्रीहनुमानचलिसा का अखंड पठण करता है।

पूजन :

सबसे पहले अश्वत्थ के टहनी का पूजन होता है । अश्वत्थ वृक्ष के नीचे की ओर रहनेवाली शाखा और ऊपर की दिशा में होनेवाले मूल परमात्मा और संपूर्ण विश्व के बीच का रिश्ता दर्शातें है । इस अश्वत्थ पूजन के समय मंत्रो के उच्चारण से वृक्ष का विधिवत पूजन होता है और नैवेद्य अर्पण किया जाता है। उसके बाद में श्रीहनुमंत का षोडश उपचारों से पूजन करतें हैं। उस समय श्रीपंचमुखहनुमत्कवच, संकटमोचन श्रीहनुमानस्तोत्र और इसके पश्चात्‌ ‘ॐ श्री रामदूताय हनुमंताय महाप्राणाय महाबलाय नमो नम:।’ इस मंत्र  का जाप किया जाता हैं।

इसके पश्चात्‌ सेंदूर-अर्चन करवाया जाता है और लाह्या अर्पण किया जाता है। परमपूज्य बापू के पंचमुखी हनुमंतकी मूर्ति और परात में रखी छोटी हनुमंत मूर्ति के ऊपर दूध का अभिषेक किया जाता है। हर एक श्रध्दावान को इस मूर्ति को सेंदूर लगाने का लाभ मिलता है। भीमरुपी महारुद्रा…. इस स्तोत्र से और पूर्णाहुती से पूजा का समापन होता है।

उसके पश्चात धुनी माता का पूजन किया जाता है इस पूजन में प्रज्वलित धुनी में लाह्या, कपूर, समिधा, अगरबत्ति अर्पण की जाती हैं। धुनीमाता को हल्दी-कुंकूम अर्पण करके उसकी पूरी तरह से गोद भरी जाती है। बाद में धुनीमाता को शांत किया जाता है।

हनुमंत को अभिषेक का समापन करते हुए लाह्या अर्पण किए जातें हैं, बाद में सब प्रणाम करतें हैं और रामरक्षा, हनुमान चलिसा और अनिरूध्द चलिसा के पठण से उत्सव का समापन होता है।

अश्वत्थमारुतीके पूजन से श्रद्धावानों को निश्चित ही बहुत लाभ मिलतें हैं ऐसी ही उनकी भावना हैं

 

१. भक्तों को जीवन में कि गयी हुयी गलतीयों को सुधारने के लिये शक्ति एवं युक्ति का स्त्रोत श्रीहनुमानजी द्वारा प्रवाहित होता हैं।

२. पापविमोचन व संकटविमोचन का मार्ग प्राप्त होता है।

३. मानसिक एवं शारिरीक सामर्थ्य प्राप्त होकर आनेवाला जीवन अधिक आनंददायी होता है।

४. शनि के साडेसाती का ताप नष्ट होता है क्योंकि हनुमानजी के सामने शनि शारण्य है।

५. कोई भी ग्रह का अनिष्ट परिणाम हनुमानजी के शक्ति से रोका जा सकता है।

६. क्रोध एवं भय का प्राबल्य कम होता है।