प्रत्येक मनुष्य की भक्तिमार्ग की यात्रा, उसके भक्तिमार्ग का प्रत्येक कदम हनुमानजी के मार्गदर्शनानुसार ही आगे बढ़ाया जाता है। श्रीहनुमानजी ही ऊंगली पकड़कर श्रद्धावान को भक्तिमार्ग पर आगे ले जाते हैं, इसीलिए हनुमानजी की भक्ति आवश्यक मानी जाती है।हनुमानजी, मेरे पंचगुरुओं में से एक हैं। वे मेरेरक्षक गुरुहैं

सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध बापू

संतश्रेष्ठ श्रीतुलसीदासजी ने हनुमान चलिसा में ‘नासै रोग हरे सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलवीरा।’ ऐसे जिनका वर्णन किया है, उन संकटमोचन हनुमानजी की भक्ति करने का बल्कि, उनकी ऊंगली पकड़कर भक्तिमार्ग पर कदम बढ़ाने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग है ‘श्री अश्वत्थ मारुती पूजन।’ भारतीय वैदिक संस्कृति में ‘व्रतपूजन’ के लिए अत्यन्त पवित्र माने जानेवाले सावन महीने में आयोजित किया जानेवाला यह पूजन अर्थात भक्त को भक्तिमार्ग पर यात्रा करवानेवाले हनुमानजी को किया गया वंदन होता है। गुरुस्थान पर स्थित श्रीहनुमानजी को वंदन करते समय ‘अश्वत्थ’ वृक्ष का मिलनेवाला साथ एक वरदान ही है। इसका मूल इस वृक्ष के महात्म्य में छिपा हुआ है।

‘अश्वत्थ’ यानी पीपल का वृक्ष। भारतीय शास्त्रों में इस वृक्ष का स्थान असाधारण है। ‘ऊर्ध्व (ऊपरी) दिशा में इसकी जड़ें तथा अधो (निचली) दिशा में ड़ालियाँ’ ऐसे संसाररुपी अश्वत्थ वृक्ष का वर्णन किया गया है। इसलिए ‘अश्वत्थवृक्ष’ परमात्मा एवं संपूर्ण विश्व का संबंध स्पष्ट करनेवाला माना गया है। (अर्थात: मूल परमात्मा की दिशा ऊपर और उनकी छत्रछाया नीचे संपूर्ण विश्व पर होती है)। भगवान श्रीकृष्ण ने भी भगवद्‌गीता में अपना वर्णन करते हुए ‘वृक्षों में मैं अश्वत्थ हूँ’ कहकर इस वृक्ष का महत्त्व अप्रत्यक्ष रूप से रेखांकित किया है। इसीलिए पूजन में ‘अश्वत्थ वृक्ष का समावेश है।

अपने पास आनेवाले हरएक को ‘श्रीहनुमानजी’ एवं ‘अश्वत्थ’ वृक्ष का महत्त्व तथा पावित्र्य एवं उसके पूजन की जानकारी प्राप्त हो, इस सुंदर हेतु से सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापूजी ने सन १९९७ में ‘अश्वत्थ मारुती पूजन’ आरम्भ किया। ‘सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध बापूजी द्वारा एकचट्टानी शिला को कुरेदकर बनाई श्रीहनुमानजी की ‘एकमात्र अद्वितीय’ आकर्षक मूर्ति इस ‘पूजन’ उत्सव के केन्द्रस्थान पर है। प्रतिवर्ष यह उत्सव सावन महीने के हर शनिवार के दिन ‘श्रीक्षेत्र सद्‌गुरु निवास-गुरुकुल, जुईनगर’ में मनाया जाता है। सावन महीने के अंतिम शनिवार के दिन ‘श्री अनिरुद्ध गुरुक्षेत्रम्‌, खार, मुम्बई में ‘अश्वत्थ मारुती पूजन’ समारोह संपन्न होता है।

पूजन का प्रस्तुतिकरण, पूजन विधि एवं दर्शन समारोह इस तरह से क्रमबद्ध तरीके से ‘अश्वत्थ मारुती’ पूजन उत्सव का भली-भाँति आयोजन किया जाता है।

सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धजी द्वारा पाषाण को कुरेदकर (पाषाण पर रेखांकित की गयी) श्रीहनुमानजी की शिल्पाकृति के पिछे अश्वत्थ वृक्ष की (पिपल) एक डाली प्रतीक के रूप में रखी जाती है। इस शिल्पकृति के समक्ष तांबे की परात में श्रीहनुमानजी की धातु की आकर्षक मूर्ति रखी जाती है। सजावट के लिए उसके पिछली ओर गन्ने के कंड़ों से बनाया गया महिरप तैयार किया जाता है। प्रपाठकों का एक समूह अखंड पठन करते रहता है।

सर्व प्रथम अश्वत्थ की ड़ाली (पिपल की टहनी) की पूजा की जाती है। अश्वत्थ पूजन के दरमियान ‘ॐ अश्वत्थाय नम:।’ ‘ॐ ऊध्वमुखाय नम:।’ ‘ॐ वनस्पतये नम:।’ इस प्रकार के मंत्रोच्चार के साथ वैदिक पद्धति से पूजा होती है। इस समय ‘श्रीपंचमुखहनुमत्कवच’, संकटमोचन श्रीहनुमान स्तोत्र एवं ॐ श्रीरामदूताय हनुमंताय महाप्राणाय महाबलाय नमो नम:।’ इस मंत्र का (५४ बार) पठन होता है।

 

इस समय पाँच अविवाहित पुरुष श्रद्धावानों द्वारा सिंदूर अर्चन किया जाता है। सामने रखी गई परात में रखी गई हनुमानजी की छोटी मूर्ति पर नियोजित दाम्पत्यों द्वारा दूध का अभिषेक किया जाता है। इसके साथ ही पंचमुखी हनुमानजी के मूर्ति पर भी अभिषेक किया जाता है। इस समय इच्छुक श्रद्धावानों के लिए सुपारी पर प्रतिकात्मक अभिषेक करने की सुविधा की गई होती है (इच्छुक श्रद्धावान सुपारी पर प्रतिकात्मक अभिषेक कर सकते हैं)। सभी श्रद्धावानों को शिल्पाकृति हनुमानजी की मूर्ति पर सिंदूर लगाकर दर्शन करने की भी सुविधा होती है। ‘भीमरुपी महारुद्रा’ नामक इस मारुती स्तोत्र से एवं पूर्णाहुती से पूजन समाप्त होता है।

श्रीहनुमानजी की माँ अर्थात अंजनीमाता। उनके प्रतीक स्वरूप हनुमानजी के मूर्ति के समक्ष धूनीमाता की निर्मिती की गई होती है। साथ ही उनकी भी पूजा की जाती है। धूनी माता के पूजन में प्रज्वलित धूनी में लावा (लाह्या), कपूर, समिधा अर्पित की जाती है। धूनीमाता को हल्दी-कुमकुम अर्पण कर उनकी ओटी भरी जाती है। रात्रि के समय धूनीमाता को शांत कर दिया जाता है। रामरक्षा, हनुमान चालिसा एवं अनिरुद्ध चालिसा के साथ उत्सव का समापन होता है।

एक ही समय पर परमात्मा के ‘महाप्राण’ स्वरुप एवं प्रभु श्रीरामचंद्र के भक्तोत्तम ऐसे दो अनोखे रूपों का मिलाजुला रूप होनेवाले ‘श्रीहनुमानजी’ के पवित्र पूजन के रूप में जाने पहचाने जानेवाले ‘श्री अश्वत्थमारुती पूजन’ उत्सव का लाभ अतिशय महत्त्वपूर्ण एवं जीवन में आमूलाग्र परिवर्तन की शुरुआत है। इस पूजन से जीवन में होनेवाली गलतियों को सुधारने के लिए शक्ति एवं युक्ति इनका स्तोत्र श्रीहनुमंत की ओर से ही प्रवाहित होता है।