भगवान श्रीराम की कथा एवं उनका नाम संपूर्ण भारत वर्ष की आत्मा हैं। त्रेतायुग के श्रीरामजन्म की कथा से लेकर लंका में रावणवध तक की रामकथा के हरएक भाग का श्रवण एवं गुणसंकीर्तन भारत के कोने-कोने में किया जाता है। मर्यादा पुरुषार्थ! मूर्तिमंत संयम! मानवों के लिए अति उत्तम आदर्श के धनी कहलानेवाले श्रीराम करोड़ों भारतीयों के देवता हैं और उनकी कथाएँ मानो मार्गदर्शक संजीवनी ही हैं।

‘श्रीरामावतार’ के वर्णन से परिपूर्ण ‘रामायण’ वैदिक धर्मग्रंथ केवल भारत में ही नहीं बल्कि दक्षिण एवं आग्नेय एशिया खंड की संस्कृति में भी महत्त्वपूर्ण साबित हुआ है। भारतीय उपखंड में श्रीलंका, म्यानमार इन देशों समेत उपखंड के उस पार इंडोनेशिया, थायलैंड, कंबोडिया, मलेशिया, लाओस, फिलिपाईन्स में भी राम कथा सुनी जाती है, उनके आधार पर ही नाटक एवं नृत्य, आदि की रचना की जाती है। इटली के अनेक प्राचीन वस्तुओं में भगवान श्रीराम, जानकी एवं लक्ष्मण के चित्र रेखांकित किए गए हैं।

रामनाम से नाश न हो ऐसा कोई भी पाप नहीं और रामनाम से जिसका उद्धार न हो ऐसा कोई भी पापी नहीं, इन शब्दों में सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध (बापू) रामनाम की महिमा बताते हैं। रामनाम सहज है और उच्चारण में आसान है। परिक्षा में आसान प्रश्नों के उत्तर पहले लिखना जैसे मूलमंत्र है उसी तरह परमार्थ में सहज आसान रामनाम से शुरुआत करनी चाहिए, इसकी वजह से प्राणायाम होगा और रामनाम अधिक दृढ होता जाएगा, ऐसा सद्गुरु बापू ने सन २००५ में एक प्रवचन में कहा था। बापू द्वारा लिखे हुए ‘रामरसायन’ ग्रंथद्वारा भगवान श्रीराम का चरित्र श्रद्धावानों के समक्ष बिलकुल जीता-जागता दिखाई देता है और रामायण एवं रामनाम का महत्त्व भी स्पष्ट हो जाता है। ‘रामरसायन’ ग्रंथ लिखकर श्री अनिरुद्धजी ने श्रद्धावानों को रामचरित्र का महत्त्व भी समझाया है। परमात्मा के मानवीय रुप वाले श्रीराम का जन्म चैत्र शुद्ध नवमी को हुआ। चैत्र शुभंकरा नवरात्रि का नौंवा दिन ‘श्रीरामनवमी’ अत्यन्त पवित्र माना जाता है।

जिस पवित्र भूमि पर भगवान श्रीराम ने जन्म लिया ऐसे भारत देश में यह उत्सव बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध उपासना ट्रस्ट, श्री अनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन एवं संलग्न संस्थाओं की ओर एस भी यह उत्सव भक्तिमय वातावरण में हर साल मनाया जाता है। इसमें लाखों श्रद्धावान सहभागी होते हैं।

श्रीरामनवमी उत्सव की शुरुआत साईनिवास से सुबह ८.०० बजे उत्सव स्थल पर लाई जानेवाली ‘दीपशिखा’ के आगमन से होती है।

दीपशिखा द्वारा ‘श्रीसाईराम-सहस्त्र-यज्ञ’ की अग्नि प्रज्वलित की जाती है। ‘आपत्तिनिवारक समिधा’ श्रद्धावानों द्वारा यज्ञ में अर्पण की जा सकती हैं। इस समय तारक मंत्र का पठन होता रहता है। इस हवन के कारण हरएक श्रद्धावान के मन एवं प्राण को सकारात्मक उर्जा प्राप्त होती है तथा पूर्व जन्म के पापों का भंजन होता है ऐसा श्रद्धावानों का विश्वास है।

श्रीरामवरदायिनी आदिमाता महिषासुरमर्दिनी का पूजन रामनवमी उत्सव में किया जाता है। ‘रामवरदायिनी दुर्गा’ यह नामाभिधान आदिमाता महिषासुरमर्दिनी को कैसे प्राप्त हुआ, यह कथा रामायण में है। सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध द्वारा रचित ‘मातृवात्सलविन्दानम्‌’  नामक ग्रंथ में भी इस संदर्भ का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। श्रीराम-रावण युद्ध अधिकाधिक भयावह रूप धारण कर लेने पर, प्रलयाग्नि के समान प्रतीत होने लगा तब हनुमानजी द्वारा कहे जाने पर प्रभु श्रीरामचंद्र ने आदिमाता का ‘अशुभनाशिनी स्तवन’ नामक स्तोत्र का पठन करने लगे। मध्यरात्रि की बेला में युद्धभूमि पर अष्टदशभुजा महिषासुरमर्दिनी प्रकट हुईं और उन्होंने ‘श्रीराम को विजय प्राप्त होगी’ यह आशीर्वाद दिया। स्वाभाविक है कि, रावण का वध करके श्रीराम ही विजयी हुए; तब आदिमाता त्रिपुराम्बा महिषासुरमर्दिनी स्वरूप में प्रकट हुईं और वे ‘रामो राजमणि: सदा विजयते।’ यह वर देकर वे अन्तर्धान हो गई। इसी वर के कारण ‘रामनाम’ तारक मंत्र बन गया और महिषासुरमर्दिनी के इस अवतार को ‘रामवरदायिनी दुर्गा’ नाम प्राप्त हुआ।

रामनवमी उत्सव के दिन उत्सव स्थल पर ही ’रेणुकामाता पूजन’ भी किया जाता है। तांदल के (रेणुकामाता का मुख) के रूप में आगमन होते ही माता का जयजयकार किया जाता है। रेणुकामाता का औक्षण कर मंगलवाद्यों के जयघोष में उत्साहपूर्वक स्वागत किया जाता है। उनका षोड्शोपचार पूजन करके सहस्त्रधारा अभिषेक किया जाता है। अभिषेक का पात्र गोमाता के थन की रचनानुसार होने के कारण अभिषेक ‘अनेक’ धाराओं से बरसता है इसीलिए इसे ‘सहस्त्रधारा अभिषेक’ कहते हैं।

इसके पश्चात्‌ रेणुकामाता की आरती करते हैं। ‘माता रेणुका का वात्सल्य जैसे भगवान श्रीपरशुराम को प्राप्त हुआ वैसे हम सभी को उनके वात्सल्य का सौभाग्य प्राप्त हो’ यही प्रार्थना हर कोई उनके चरणों में करता है।

श्रीरामनवमी का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण अंग है रामजन्म समारोह। परमपूज्य सद्‌गुरु अनिरुद्ध के मार्गदर्शन अनुसार दोपहर को श्रीराम जन्म पारंपारिक तरीके से मनाया जाता है। सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध के शैशवावस्था में जिस झूले का उपयोग किया गया था उसी झूले का उपयोग श्रीराम जन्म के समय पालना के रूप में किया जाता है। ‘कोई गोविन्द लो, कोई गोपाल लो’ के जयघोष एवं श्रीराम के झूले के गीत में सभी श्रद्धावान सहभागी होते हैं। इसके पश्चात्‌ रामचंद्र का ‘श्रीराम’ कहकर नामकरण किया जाता है साथ ही ‘सुठंवडा’ भी प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है। इस झूले एवं उसमें होनेवाले प्रतीक स्वरूप श्रीराम के दर्शन का सौभाग्य श्रद्धावानों को प्राप्त होता है।

उत्सव में श्रीसाई ‘साईसत्पूजन’ किया जाता है। साईसच्चरित्रकार हेमाडपंतजी को श्रीसाईनाथ ने १) रुद्राक्षमाला, २) त्रिशूल एवं ३) शालीग्राम यह तीन वस्तूएँ दी थीं। यह तीनों वस्तुएँ साईनिवास (link) से उत्सव स्थल पर लाकर उनका भक्ति-भाव से पूजन किया जाता है। पूजन के पश्चात्‌ वहाँ पर अखंड रूप में ‘श्रीघोरकष्टोद्धरण स्तोत्र’ का पठन किया जाता है।

इसके अलावा श्रीसाई सदाशिव मूर्ति पर ‘श्रीसाईनाथ महिम्नाभिषेक’ किया जाता है। प्रत्येक भक्त इस समय प्रतिकात्मक पूजाभिषेक कर सकता है। यह अभिषेक परिवार के सभी सदस्यों के आरोग्य के लिए लाभदायी होता है और परिवार के छोटे बच्चों के लिए भी उपयोगी साबित होता है, ऐसा श्रद्धावानों का विश्वास है।

मंगलवाद्य के जयघोष में ‘रक्ष-रक्ष साईनाथ, श्री साईराम’ जप करते-करते जब कोई भी श्रद्धावान तलीभरण करता है तब उस श्रद्धावान को अन्नदान का पुण्य एवं आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसीलिए श्रद्धावान इस विधि में आनंदपूर्वक सहभागी होते हैं।

उत्सव स्थल पर ‘ॐ रामाय रामभद्राय रामचंद्राय नम:।’ यह जाप दिनभर अखंड चलता रहता है। जो श्रद्धावान पठन में रहते हैं वे एक-दूसरे के माथे पर अबीर (काला टीका) लगाकर प्रणाम करते हैं। जिसके माथे पर यह टीका स्वरूपी अबीर लगाया जाता है वह भक्तश्रेष्ठ पुंडलिक स्वरूप माना जाता है और जो यह टीका स्वरूपी अबीर लगाता है उसके हाथ मानो भक्तश्रेष्ठ पुंडलिक के होते हैं, ऐसी भक्तों की श्रद्धा है और इसी अनुसार भक्तिभाव पूर्वक सभी पठन करते हैं।

रामनवमी उत्सव स्थल पर एक कक्ष में श्रीसाईसच्चरित्र के एक अध्याय का सामूहिक रूप में अखंड पाठ चलता है। इसे ‘श्रीसाईसच्चरित अध्ययन कक्ष’ अथवा ‘आद्यपिपा कक्ष’ भी कहते हैं। ‘आद्यपिपादादा’ अर्थात ‘श्रीसुरेशचंद्र पांडुरंग दत्तोपाध्ये’ जो श्रीसाईनाथ के असीम भक्त एवं सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्धजी के श्रेष्ठ श्रद्धावान थे। श्रीसाईसच्चरित में कहेनुसार हर साल ‘रामनवमी’, ‘गुरुपूर्णिमा’, ‘जन्माष्टमी’ एवं ‘दशहरा’ इन चारों पवित्र दिनों में उनका श्रीसाईसच्चरित्र के सप्ताह का समापन होता था। ऐसा उनका ६० वर्षों से नियम था। वास्तव में श्रीसाईसच्चरित्र के ११वे अध्याय के वर्णनानुसार ‘अखंड राम पाओगे!’ यह पंक्ति उनके जीवन में सत्य साबित हुई। हरएक श्रद्धावान जो इस कक्ष में प्रवेश करता है वह आद्यपिपा के समान पूर्ण श्रद्धावान बनने का निश्चय करके ही श्रीसाईसच्चरित के अध्याय का पठन शुरु करता है।

सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धजी ने अपने पंचगुरुओं के संबंध में विवेचन करते समय यह स्पष्ट किया है कि, ‘श्रीराम’ उनके कर्ता गुरु हैं। वे ही उनके नियोजित कार्य के यशदाता हैं ।

श्रद्धावानों के मन में रामभक्ति सदैव जागृत रहे, तथा अधिकाधिक बढ़ती रहे यही सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धजी की तड़प है। इसके लिए ‘रामजन्मोत्सव’ तो है ही परन्तु इसके साथ ही उन्होंने अन्य अनेक महत्त्वपूर्ण बातें श्रद्धावानों को बताई हैं। इसीलिए संस्था की ओर से ’सुंदरकाण्ड’ पठन सप्ताह’ का आयोजन किया गया था।

दैनिक ‘प्रत्यक्ष’  में सुंदरकाण्ड के महाप्राण हनुमानजी एवं श्रीराम की पंक्तियों का संदर्भ देकर सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धजी ‘मानवीय जीवन को भक्तिमय कैसे बनाना है’ इस संबंध में सुबोध एवं रसमय ‘तुलसीपत्र’ नामक अग्रलेख के माध्यम से हमें मार्गदर्शन कर रहे हैं। यह अग्रलेख शृंखला पिछले कई वर्षों से चलती आ रही है।

कलिकाल पर मात करने के लिए एवं प्रारब्ध के लपेट से बाहर निकलने के लिए सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्धजी ने रामबाण उपाय रामनाम बही के रूप में श्रद्धावानों को दिया है। इस रामनाम बही में दिए गए विभिन्न जपों को लिखकर पूरा करने पर ‘अनिरुद्धाज्‌ युनिव्हर्सल बैंक ऑफ रामनाम’ में श्रद्धावानों को जमा करनी होती है । यह बैंक ही सही मायने में हमारे जीवन को समृद्ध बनाती है। श्रद्धावान जब रामनाम बही लिखता है तब उसके जन्मजन्मांतर की यात्रा के अनेक सुंदर सेतु सहज ही महाप्राण हनुमानजी बंधवा लेते हैं, यह श्रद्धावानों का भाव है। अब यह रामनाम बही ऐपस्वरूप में भी  गुगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध है।

इस तरह से सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धजी श्रद्धावानों के मन में स्थित रामभक्ति को सदैव जागृत रखते हैं। रामनवमी उत्सव के दिन रात्रि के समय पूर्णाहुति के पश्चात्‌ साईराम सहस्त्रयज्ञ की समाप्ति होती है तथा महाआरती के पश्चात्‌ रामनवमी उत्सव का समापन होता है। रामनवमी उत्सव में सहभागी होनेवाला हरएक श्रद्धावान आगे दिए गए। ‘अनिरुद्ध महावाक्यम्‌’ को अपने जीवन में उतारने का निर्धार करते हुए अपने-अपने घर लौट जाता है।

युद्ध करेंगे मेरे श्रीराम। समर्थ दत्तगुरु मूल आधार॥ मैं सैनिक वानर साचार। रावण मरेगा निश्चित ही॥