AniruddhaFoundation-Shree Ram Navami

श्रीरामनवमी उत्सव :

चैत्र शुद नवमी की तिथि को पूर्ण मध्यान्ह बेला में श्रीराम ने जनम लिया।

सन्‌ १९९६ से प्रत्येक वर्ष श्रीअनिरुद्ध उपासना फाऊंडेशन की ओर से श्रीरामनवमी उत्सव अत्यंत आनंद एवं उत्साह के साथ संपूर्ण भक्तिमय वातावरण में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस पवित्र दिन अनेक भक्तिमय उपक्रमों में श्रद्धावान बड़े ही उत्साह से भाग लेते हैं।

श्रीरामनवमी के विविध उपक्रम :

१) श्रीसाईराम सहस्त्र यज्ञ :

प्रात:काल से श्रीसाईराम सहस्त्र यज्ञ की शुरूआत होती है। साईनिवास से दिपशिखा उत्सवस्थल तक लायी जाती है। इस यज्ञ में श्रद्धावानों को पवित्र आपत्ति निवारक समिधा अर्पित करने का सुअवसर प्राप्त होता है व उस समय तारक मंत्र का जाप भी निरंतर चलता रहता है।

२) श्रीरामवरदायिनी महिषासुरमर्दिनी  पूजन :

सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्धजी ने अपने मातृवात्सल्यविन्दानम्‌ ग्रंथ में श्रीराम-रावण युद्ध का अत्यन्त उचित एवं विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। मध्यरात्रि के समय रणांगण में वे आदिमाता त्रिपुराम्बा स्वयं अष्टादशभुजाधारी महिषासुरमर्दिनी के रूप में प्रगट होकर श्रीराम को ‘रामो राजमणि सदा विजयते।’ का वरदान देकर अन्तर्धान हो गईं। इसीलिए श्रीराम को राम-रावण युद्ध में विजयश्री प्राप्त हुई और ‘रामोराजमणि सदा विजयते।’ आदिमाता के वरदान के कारण तारकमंत्र बन गया और महिषासुरमर्दिनी इस अवतार को ‘रामवरदायिनी’ नामाभिधान प्राप्त हुआ। इसीलिए रामनवमी के उत्सव में इनका पूजन किया जाता है। इस वरदान को कारण रामनाम तारकमंत्र बना व महिषासुरमर्दिनी के इस अवतार को रामवरदायिनी नाम प्राप्त हुआ। इसलिए रामवरदायिनी आदिमाता महिषासुरमर्दिनी का पूजन रामनवमी उत्सव में किया जाता है।

३) श्रीरेणुकामाता पूजन :

रामनवमी के दिन उत्सवस्थल पर रेणुकामाता मुखौटामूर्ति के रुप में रेणुकामाता का आगमन जयजयकार के साथ होता है। रेणुकामाता की नजर उतारकर मंगलवाद्य बजाते हुए गजर के साथ बड़े ही उत्साह से उनका स्वागत किया जाता है।  यहाँ पर षोड्‍शोपचार पद्धति से पूजन कर अभिषेक किया जाता है। ये एक पवित्र दर्शनीय सोहळा होता है। बापू रेणुकामाता की आरती करते हैं। उनके दर्शन का लाभ हमें लेना चाहिए और आगे भी हर एक श्रद्धावान को ऐसी ही प्रार्थना करनी चाहिए कि, ‘हे माते, हे मातेश्वरी रेणुका आप हमारे जीवन विश्व में अपने पुत्र इस परमात्मा को प्रगट किजिए।

४) श्रीरामजन्म :

परमपूज्य सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापू, नंदाई व सुचितदादा की उपस्थिती में १२ बजे श्रीरामजन्म को पारंपारिक रूप से मनाया जाता है। श्रीराम को जिस पालने में रखा व झूलाया जाता है उसका वैशिष्ठ यानि इस पालने को स्वयं बालस्वरूप बापू के लिये इस्तेमाल किया गया था। “कोई गोंविद लिजिए, कोई गोपाल लिजिए” इस गजर और श्रीराम के पालने के गीत गाने में सभी श्रद्धावानों के साथ स्वयं बापू, आई व दादा सहभागी होते हैं। इस कार्यक्रम के इस उपक्रम को भी अति उत्साह के साथ मनाते हैं। रामजन्म के इस उपक्रम से सभी धन्य धन्य हो जाते हैं। उसके बाद श्रीराम का नामकरणविधि (यानि पालने में रखकर किया जानेवाला संस्कार) होता है और पारंपारिक रूप से सौंठ का प्रसाद वितरित किया जाता है। ये पालना व बाल श्रीराम की प्रतिमा को स्टेज पर रखा जाता है।

५) श्रीसाई सत्‌पूजन :

रुद्राक्षमाला, त्रिशूल व शालीग्राम इन तीनों वस्तुओं का वर्णन श्रीहेमाडपंत ने श्रीसाईसत्‌चरित्र में किया है उनके अनुसार श्रीसाईनाथ द्वारा दिये इन चीजों को साईनिवास से पूजनस्थली लाया जाता है और उनका पूजन किया जाता है। इस समय श्रीघोरकष्टोद्धरण स्तोत्र का पाठ श्रद्धावान पूरे दिन करते हैं।

६) श्रीसाईनाथ महिम्नाभिषेक :

श्रीसाईनाथ की मूर्ति जिसे सदाशिवमूर्ति कहा जाता है उस पर साईनाथ महिम्नाभिषेक किया जाता है।

७) तळीभरण :

 सद्‌गुरु बापू, नंदामाता व सुचितदादा ने इस तळीभरण की शुरुआत करते है। वाद्य व गजर के साथ “साईनाथ-साईनाथ रक्ष, रक्ष साईनाथ” इस तरह से श्रीसाईराम का जाप किया जाता है। श्रद्धावान प्रतिवर्ष इस तळीभरण में सहभागी होते हैं।

८) अखंड जाप :

 

‘ॐ रामाय रामभद्राय रामचंद्राय नम:।’ ये जप अखंड रूप से पूरे दिन चलता है। परमपूज्य सद्‌गुरु अनिरुद्ध बापू, नंदाई व सुचितदादा इनकी उपस्थिती में ये धार्मिक कार्यक्रम होता है। इस पठन के दरमियान श्रद्धावान एक-दूसरे के माथे पर अबीर-बुक्का लगातें हैं व एक-दूसरे को नमस्कार कर सदिच्छा देते हैं।

९) श्रीसाईसचरित्र अध्ययन कक्ष :


रामनवमी उत्सव स्थल में एक अनूठे प्रकार का कक्ष आद्यपिपा के नाम पर होता है। इस कक्ष में श्रीसाईसच्चरित्‌ के अध्याय का अखंड पठन चलता रहता है। आद्यपिपा यानि श्रीसुरेशचंद्र पांडुरंग दत्तोपाध्ये। ये साईनाथ के अटूट श्रद्धावान और अनिरुद्ध बापू के श्रेष्ठ अनुयायी थे। हर वर्ष रामनवमी, गुरुपूर्णिमा, कृष्णजन्माष्टमी एवं दशहरे के पावन पर्वों पर श्रीसाईचरित्र का पारायण करना उनका अपने पूरे जीवन के साठ वर्षों में क्रमबद्ध तरीके से बनाया गया नियम था। उनका श्रीसाईसचरित्र का पारायण इन चारों पर्वों के अवसर पर दोपहर के समय तक उस सप्ताह का पारायण पूर्ण होता था। ये उनके पूरे जीवन का साईनाथ से किया गया आत्मनिवेदन था और सच में साईचरित्र के ११वें अध्याय में वर्णन कियेनुसार उन्हें अखंड राम प्राप्त हुए। ये पंक्ति उनके जीवन में सत्य साबित हुई। हर एक श्रद्धावान जो इस कक्ष में प्रवेश करता है वह आद्यपिपा जैसा श्रद्धावान बनने का निर्णय कर साईसचरित्र अध्ययन का पाठ शुरु करता है।

१०) श्रीअनिरुद्ध हंडीप्रसाद :

इस शुभदिन हंडी प्रसाद बनाते समय स्वयं परमपूज्य बापू सहभाग लेते हैं। इसलिए प्रत्येक श्रद्धावान को मिलनेवला प्रसाद यानि बापू के हस्तस्पर्श से और आशीर्वाद से परिपूर्ण होता है। इस प्रसाद में लगनेवाली सभी विविध सामग्री स्वत: बापू मिलाते हैं, ये इस प्रसाद की पवित्र बात है। यह हर एक को श्रीसाईचरित्र के साईबाबा के हंडी-प्रसाद की याद दिलाती है। इसलिए सच में इसका जायका स्वादिष्ट अविस्मरणीय होता है। इस प्रसाद को ग्रहण करने के सिवाय कोई भी श्रद्धावान उत्सवस्थल को छोडता नहीं है।

श्रीसाईराम सहस्त्रयाग की पूर्णता और महाआरती होने पर रामनवमी उत्सव पूर्ण होता है।